प्रश्न–1. बाल्यावस्था, वृद्धि एवं विकास से आप क्या समझते हैं? इनका अर्थ एवं परिभाषा स्पष्ट करते हुए वृद्धि एवं विकास में अंतर लिखिए।?
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भूमिका
बाल्यावस्था मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। इसी अवस्था में बच्चे के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक तथा नैतिक गुणों की नींव रखी जाती है। बालक के व्यक्तित्व का समग्र विकास इसी अवधि में प्रारम्भ होता है। शिक्षा के क्षेत्र में बाल्यावस्था, वृद्धि तथा विकास की सही समझ प्रत्येक शिक्षक के लिए आवश्यक है, क्योंकि इन्हीं के आधार पर प्रभावी शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का निर्माण किया जाता है।
बाल्यावस्था का अर्थ एवं परिभाषा
बाल्यावस्था का अर्थ
बाल्यावस्था मानव जीवन की प्रारम्भिक अवस्था है। सामान्यतः जन्म से लगभग 12 वर्ष की आयु तक की अवधि को बाल्यावस्था कहा जाता है। इस समय बालक तेजी से सीखता है, नई-नई बातें जानने का प्रयास करता है और अपने आसपास के वातावरण से अनेक अनुभव प्राप्त करता है। यही अनुभव उसके भविष्य के व्यक्तित्व को आकार देते हैं।
बाल्यावस्था में बच्चे के शरीर, भाषा, सोच, भावनाओं और सामाजिक व्यवहार में निरंतर परिवर्तन होते हैं। वह खेल-खेल में सीखता है, प्रश्न पूछता है और दूसरों का अनुकरण करके अपने व्यवहार का निर्माण करता है। इसलिए इस अवस्था को सीखने और व्यक्तित्व निर्माण की सबसे उपयुक्त अवस्था माना जाता है।
बाल्यावस्था की परिभाषा
क्रो एवं क्रो (Crow and Crow) के अनुसार—
“बाल्यावस्था जीवन की वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति के व्यक्तित्व की आधारशिला रखी जाती है।”
अर्थात् बाल्यावस्था वह समय है जिसमें भविष्य के व्यक्तित्व, आदतों और व्यवहार का निर्माण प्रारम्भ होता है।
उदाहरण: यदि किसी बच्चे को बचपन में अच्छा वातावरण, उचित शिक्षा और अच्छे संस्कार मिलते हैं, तो उसका व्यक्तित्व संतुलित एवं जिम्मेदार बनता है।
वृद्धि का अर्थ एवं परिभाषा
वृद्धि का अर्थ
वृद्धि का अर्थ है शरीर के आकार, लंबाई, वजन तथा अंगों में होने वाली बढ़ोतरी। यह मुख्यतः शारीरिक परिवर्तन को दर्शाती है। वृद्धि को आसानी से मापा जा सकता है, जैसे किसी बच्चे की ऊँचाई बढ़ना, वजन बढ़ना या शरीर का आकार विकसित होना।
वृद्धि एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जो आनुवंशिकता, पोषण, स्वास्थ्य और वातावरण से प्रभावित होती है। सामान्यतः वृद्धि एक निश्चित आयु तक अधिक तीव्र होती है और बाद में धीरे-धीरे स्थिर हो जाती है।
वृद्धि की परिभाषा
हरलॉक (Hurlock) के अनुसार—
“वृद्धि शरीर के आकार, लंबाई, वजन तथा अंगों में होने वाला मात्रात्मक परिवर्तन है।”
इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि वृद्धि केवल बाहरी या शारीरिक परिवर्तनों से संबंधित है।
उदाहरण: यदि किसी बच्चे की लंबाई एक वर्ष में 5 सेंटीमीटर बढ़ जाती है या उसका वजन बढ़ता है, तो यह वृद्धि का उदाहरण है।
विकास का अर्थ एवं परिभाषा
विकास का अर्थ
विकास वृद्धि की तुलना में अधिक व्यापक अवधारणा है। विकास केवल शरीर में होने वाले परिवर्तन तक सीमित नहीं होता, बल्कि व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक, संवेगात्मक, नैतिक तथा भाषाई पक्षों में होने वाले क्रमिक और सकारात्मक परिवर्तनों को भी शामिल करता है।
विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जो जन्म से प्रारम्भ होकर जीवनभर चलती रहती है। जैसे-जैसे व्यक्ति अनुभव प्राप्त करता है, उसका ज्ञान, व्यवहार, सोचने की क्षमता और निर्णय लेने की योग्यता भी विकसित होती जाती है।
विकास की परिभाषा
एलिज़ाबेथ बी. हरलॉक (Elizabeth B. Hurlock) के अनुसार—
“विकास केवल आकार में वृद्धि नहीं है, बल्कि यह एक क्रमबद्ध और प्रगतिशील परिवर्तन की प्रक्रिया है, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति परिपक्वता की ओर बढ़ता है।”
इस परिभाषा से स्पष्ट है कि विकास व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व से जुड़ी हुई प्रक्रिया है।
उदाहरण: एक बच्चा पहले केवल शब्द बोलता है, फिर छोटे-छोटे वाक्य बनाता है और बाद में अपने विचार स्पष्ट रूप से व्यक्त करने लगता है। यह भाषा विकास का उदाहरण है। इसी प्रकार दूसरों के साथ मिलकर कार्य करना सीखना सामाजिक विकास का उदाहरण है।
वृद्धि एवं विकास में अंतर
- वृद्धि (Growth) विकास (Development)
- वृद्धि का संबंध मुख्यतः शरीर के आकार और वजन से होता है। विकास का संबंध व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व से होता है।
- यह मात्रात्मक (Quantitative) परिवर्तन है। यह गुणात्मक (Qualitative) तथा मात्रात्मक दोनों प्रकार का परिवर्तन है।
- इसे ऊँचाई, वजन आदि के माध्यम से मापा जा सकता है। इसे प्रत्यक्ष रूप से नहीं मापा जा सकता, बल्कि व्यवहार और क्षमता के आधार पर समझा जाता है।
- वृद्धि एक निश्चित आयु तक अधिक होती है। विकास जीवनभर चलता रहता है।
- वृद्धि विकास का एक भाग है। विकास एक व्यापक प्रक्रिया है, जिसमें वृद्धि भी सम्मिलित होती है।
शैक्षिक महत्त्व
एक शिक्षक के लिए बाल्यावस्था, वृद्धि और विकास का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। इससे वह बच्चों की आयु, रुचि, क्षमता और विकास स्तर के अनुसार उपयुक्त शिक्षण विधियों का चयन कर सकता है। साथ ही, यदि किसी बच्चे का विकास सामान्य गति से नहीं हो रहा हो, तो शिक्षक समय रहते उसकी पहचान कर उचित मार्गदर्शन और सहायता प्रदान कर सकता है। बाल-केंद्रित शिक्षा का आधार भी इन्हीं अवधारणाओं पर आधारित है।
निष्कर्ष-
बाल्यावस्था मानव जीवन की वह महत्वपूर्ण अवस्था है जिसमें व्यक्तित्व की नींव रखी जाती है। वृद्धि शरीर में होने वाले मात्रात्मक परिवर्तनों को दर्शाती है, जबकि विकास व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व में होने वाले क्रमिक, सकारात्मक एवं आजीवन परिवर्तनों की व्यापक प्रक्रिया है। इसलिए एक प्रभावी शिक्षक के लिए इन तीनों अवधारणाओं का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है, ताकि वह प्रत्येक बालक के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखते हुए प्रभावी एवं बाल-केंद्रित शिक्षण प्रदान कर सके।