B.Ed 1st Year Contemporary India and Education Previous question Paper with solution
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Toggle| TOPIC | Magadh University B.Ed 1st Year Paper -1 Contemporary India and Education Previous question Paper with solution |
| COURSE | B.Ed 1st YEAR |
| UNIERSITY | MAGADH UNIVERSITY |
| PAPER | 02 Contemporary India and Education |
| SESSION | 2022-24 , Exam-2023 |
| FULL MARKS | 80+20=100 |
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Magadh University B.Ed 1st Year Paper -1 Contemporary India and Education Previous question Paper with solution















Section – A
खण्ड – अ
(Long answer type questions)
(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)
1. Answer any five questions of the following:
निम्नलिखित में से किन्हीं पाँच प्रश्नों के उत्तर दें । 10×5 = 50
1(a) Explain the concept and causes of social diversity and inequality.
प्रश्न – सामाजिक विभिन्नता और असमानता की संकल्पना एवं कारण स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर –
(1) भूमिका
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह समाज में विभिन्न व्यक्तियों एवं समूहों के साथ अंतःक्रिया करते हुए जीवन व्यतीत करता है। प्रत्येक समाज में लोगों के बीच जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति, लिंग, क्षेत्र और आर्थिक स्थिति आदि के आधार पर भिन्नताएँ पाई जाती हैं। ये भिन्नताएँ समाज की विविधता को दर्शाती हैं। परंतु जब यही भिन्नताएँ अवसरों, संसाधनों और अधिकारों के असमान वितरण का कारण बनती हैं, तब सामाजिक असमानता उत्पन्न होती है। अतः सामाजिक विभिन्नता और असमानता की अवधारणाओं को समझना समाजशास्त्रीय दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है।
(2) सामाजिक विभिन्नता और असमानता की संकल्पना एवं कारण –
(क) सामाजिक विभिन्नता (Social Diversity) की संकल्पना
सामाजिक विभिन्नता से आशय समाज में व्यक्तियों एवं समूहों के बीच पाई जाने वाली प्राकृतिक, सांस्कृतिक एवं संरचनात्मक भिन्नताओं से है। यह विविधता समाज की विशेषता होती है और इसे सकारात्मक रूप में भी देखा जाता है।
उदाहरण: भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में अनेक धर्म, भाषाएँ और परंपराएँ विद्यमान हैं, जो सामाजिक विभिन्नता को दर्शाती हैं।
सामाजिक विभिन्नता के कारण:
- जाति एवं वर्ग व्यवस्था
- धार्मिक विविधता
- भाषाई भिन्नता
- क्षेत्रीयता
- सांस्कृतिक परंपराएँ
- लिंग भेद
(ख) सामाजिक असमानता (Social Inequality) की संकल्पना
सामाजिक असमानता से अभिप्राय समाज में संसाधनों, अवसरों, अधिकारों और सम्मान के असमान वितरण से है। जब कुछ वर्गों को अधिक सुविधाएँ और शक्ति प्राप्त होती हैं तथा अन्य वर्ग वंचित रह जाते हैं, तो यह असमानता कहलाती है।
सामाजिक असमानता के कारण:
- आर्थिक असमानता (धन का असमान वितरण)
- जातिगत ऊँच-नीच
- शैक्षिक असमान अवसर
- लैंगिक भेदभाव
- राजनीतिक शक्ति का केंद्रीकरण
- सामाजिक रूढ़ियाँ और अंधविश्वास
इस प्रकार सामाजिक विभिन्नता प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक अंतर को दर्शाती है, जबकि सामाजिक असमानता उन अंतरों के आधार पर उत्पन्न अन्यायपूर्ण व्यवस्था को प्रकट करती है।
(3) निष्कर्ष
सामाजिक विभिन्नता किसी भी समाज की स्वाभाविक विशेषता है और यह उसकी सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है। परंतु जब यही विविधता भेदभाव और असमान अवसरों का रूप ले लेती है, तो सामाजिक असमानता उत्पन्न होती है, जो सामाजिक न्याय और समरसता के लिए बाधक है। अतः आवश्यक है कि समाज में समान अवसर, शिक्षा का प्रसार और न्यायपूर्ण नीतियों के माध्यम से असमानताओं को कम किया जाए, ताकि विविधता के साथ-साथ समानता भी सुनिश्चित की जा सके।
(b) Write down concept of marginalization? Throw light on the the impact of marginalization on education in contemporary India.
1(b)प्रश्न- वचितता की अवधारणा लिखें। समकालीन भारत में शिक्षा पर वंचितता के प्रभाव पर प्रकाश डालें ।
उत्तर –
(1) भूमिका
समाज में सभी व्यक्तियों को समान अवसर प्राप्त नहीं होते। आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा शैक्षिक संसाधनों की असमान उपलब्धता के कारण कुछ वर्ग मूलभूत सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। यही स्थिति वंचितता कहलाती है। समकालीन भारत में शिक्षा के क्षेत्र में वंचितता एक गंभीर सामाजिक-शैक्षिक समस्या है, जो समानता और न्याय के संवैधानिक आदर्शों को प्रभावित करती है।
(2) वंचितता की अवधारणा
वंचितता (Deprivation) से आशय ऐसी स्थिति से है, जिसमें व्यक्ति या समूह समाज में उपलब्ध आवश्यक संसाधनों, अवसरों और अधिकारों से वंचित रह जाता है।
वंचितता के प्रमुख आयाम –
आर्थिक वंचितता – गरीबी, बेरोजगारी, निम्न आय।
सामाजिक वंचितता – जाति, लिंग, धर्म, जनजाति आदि के आधार पर भेदभाव।
शैक्षिक वंचितता – विद्यालय, शिक्षक, संसाधन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी।
सांस्कृतिक वंचितता – भाषा, परंपरा या सांस्कृतिक पूँजी का अभाव।
भौगोलिक वंचितता – ग्रामीण, आदिवासी या दूरस्थ क्षेत्रों में सुविधाओं की कमी।
भारत में वंचित वर्गों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अल्पसंख्यक, महिलाएँ, दिव्यांगजन एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) प्रमुख हैं।
(3) समकालीन भारत में शिक्षा पर वंचितता के प्रभाव
1. नामांकन और उपस्थिति में असमानता
वंचित वर्गों के बच्चों का विद्यालय में नामांकन कम होता है तथा ड्रॉप-आउट दर अधिक होती है। विशेषकर बालिकाएँ और आदिवासी बच्चे अधिक प्रभावित होते हैं।
2. शैक्षिक गुणवत्ता में अंतर
संसाधनों की कमी, प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव तथा डिजिटल सुविधाओं की अनुपलब्धता के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त नहीं हो पाती।
3. डिजिटल विभाजन
ऑनलाइन शिक्षा के दौर में इंटरनेट, स्मार्टफोन और तकनीकी साधनों की कमी ने वंचित वर्गों को और पीछे कर दिया। यह समस्या कोविड-19 काल में स्पष्ट रूप से सामने आई।
4. भाषा एवं सांस्कृतिक अवरोध
आदिवासी एवं अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों को मातृभाषा और विद्यालयी भाषा के अंतर के कारण सीखने में कठिनाई होती है।
5. आत्मविश्वास एवं प्रेरणा में कमी
लगातार सामाजिक भेदभाव और असमान व्यवहार के कारण विद्यार्थियों में हीन भावना उत्पन्न होती है, जिससे उनकी शैक्षिक उपलब्धि प्रभावित होती है।
6. उच्च शिक्षा में कम प्रतिनिधित्व
यद्यपि आरक्षण नीति और छात्रवृत्तियाँ लागू हैं, फिर भी उच्च शिक्षा संस्थानों में वंचित वर्गों की भागीदारी अपेक्षाकृत कम है।
(4) निष्कर्ष
वंचितता केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि बहुआयामी सामाजिक चुनौती है। समकालीन भारत में शिक्षा पर इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। समान और समावेशी शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकारी योजनाएँ—जैसे सर्व शिक्षा अभियान, समग्र शिक्षा अभियान, छात्रवृत्ति योजनाएँ एवं आरक्षण नीति—महत्वपूर्ण कदम हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में वास्तविक समानता तभी संभव है जब समाज के सभी वर्गों को समान अवसर, संसाधन और सम्मान प्राप्त हो। अतः वंचितता के उन्मूलन हेतु समन्वित सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक प्रयास आवश्यक हैं।
1(c) How RTE, Act play an important far deprived class children education?
प्रश्न – वंचित वर्गों के बच्चों की शिक्षा के लिये RTE, एक्ट किस प्रकार एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है ?
उत्तर –
(1) भूमिका
भारत में शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा देने हेतु Right of Children to Free and Compulsory Education Act (RTE Act, 2009) लागू किया गया। यह अधिनियम 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की संवैधानिक व्यवस्था है, जो संविधान के अनुच्छेद 21A के अंतर्गत आता है। वंचित एवं कमजोर वर्गों के बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने में यह अधिनियम अत्यंत महत्वपूर्ण है।
(2) वंचित वर्गों के लिए RTE एक्ट की प्रमुख भूमिकाएँ
1. निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की गारंटी
RTE अधिनियम के अंतर्गत 6–14 वर्ष के प्रत्येक बच्चे को बिना किसी शुल्क के शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। इससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को विद्यालय जाने का अवसर मिलता है।
2. 25% आरक्षण प्रावधान
इस अधिनियम की धारा 12(1)(c) के अंतर्गत निजी, गैर-सहायता प्राप्त विद्यालयों में प्रवेश स्तर पर 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित समूह के बच्चों के लिए आरक्षित की गई हैं। इससे सामाजिक समावेशन (Social Inclusion) को बढ़ावा मिलता है।
3. भेदभाव-निषेध और समानता
विद्यालयों में जाति, लिंग, धर्म, भाषा या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित किया गया है। यह प्रावधान वंचित वर्गों के बच्चों में आत्मसम्मान और सुरक्षा की भावना विकसित करता है।
4. ड्रॉप-आउट रोकथाम
यदि कोई बच्चा किसी कारणवश विद्यालय छोड़ देता है, तो उसे उसकी आयु के अनुरूप कक्षा में पुनः प्रवेश देने और विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था करने का प्रावधान है। इससे वंचित बच्चों की शिक्षा निरंतर बनी रहती है।
5. आधारभूत सुविधाओं की अनिवार्यता
RTE अधिनियम विद्यालयों में आवश्यक बुनियादी सुविधाएँ—जैसे कक्षाएँ, शौचालय, पेयजल, योग्य शिक्षक और उचित छात्र-शिक्षक अनुपात—सुनिश्चित करता है। इससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का वातावरण तैयार होता है।
6. शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीड़न पर रोक
वंचित वर्गों के बच्चों के साथ अक्सर कठोर व्यवहार की शिकायतें मिलती थीं। RTE अधिनियम शारीरिक दंड और मानसिक प्रताड़ना पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है।
7. सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE)
पारंपरिक परीक्षा-केन्द्रित व्यवस्था के स्थान पर समग्र मूल्यांकन की व्यवस्था से कमजोर पृष्ठभूमि के बच्चों पर अनावश्यक परीक्षा-दबाव कम हुआ है।
(3) समकालीन संदर्भ में महत्व
समकालीन भारत में सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के बीच RTE अधिनियम शिक्षा में समान अवसर (Equal Opportunity) सुनिश्चित करने का एक प्रभावी उपकरण है। यह केवल विद्यालय में प्रवेश ही नहीं, बल्कि समान, गुणवत्तापूर्ण और सम्मानजनक शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है।
(4) निष्कर्ष
RTE एक्ट वंचित वर्गों के बच्चों के लिए शिक्षा का द्वार खोलने वाला एक ऐतिहासिक कदम है। यह सामाजिक न्याय, समानता और समावेशन के सिद्धांतों को साकार करने का माध्यम है। हालांकि इसके प्रभावी क्रियान्वयन, निगरानी और जागरूकता की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है।
अतः कहा जा सकता है कि RTE अधिनियम वंचित वर्गों के शैक्षिक सशक्तिकरण का आधार स्तंभ है।
1(d) Explain the constitutional provisions for ensuring equity.
प्रश्न- समता की सुरक्षा हेतु संवैधानिक प्रावधान की व्याख्या करें।
उत्तर –
(1) भूमिका
भारतीय लोकतंत्र का मूल आधार समानता (Equality) है। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना के लिए भारतीय संविधान में समता की सुरक्षा हेतु विशेष प्रावधान किए गए हैं। इन प्रावधानों का उद्देश्य समाज में व्याप्त असमानताओं को समाप्त कर सभी नागरिकों को समान अधिकार और अवसर प्रदान करना है।
(2) समता की सुरक्षा हेतु प्रमुख संवैधानिक प्रावधान
1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14–18)
भारतीय संविधान के भाग-III (मौलिक अधिकार) में समानता से संबंधित प्रावधान निहित हैं।
(i) अनुच्छेद 14 – विधि के समक्ष समानता
सभी नागरिक कानून की दृष्टि में समान हैं। राज्य किसी भी व्यक्ति के साथ मनमाना भेदभाव नहीं कर सकता।
(ii) अनुच्छेद 15 – भेदभाव का निषेध
धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर राज्य किसी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं करेगा।
साथ ही, महिलाओं, बच्चों, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) एवं अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति दी गई है।
(iii) अनुच्छेद 16 – सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर
सरकारी नौकरियों में सभी नागरिकों को समान अवसर प्राप्त होगा। पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था भी इसी अनुच्छेद के अंतर्गत है।
(iv) अनुच्छेद 17 – अस्पृश्यता का उन्मूलन
अस्पृश्यता को समाप्त कर उसे दंडनीय अपराध घोषित किया गया है। यह सामाजिक समता की दिशा में ऐतिहासिक कदम है।
(v) अनुच्छेद 18 – उपाधियों का अंत
राज्य द्वारा किसी भी प्रकार की उपाधि (Titles) प्रदान करने पर रोक लगाई गई है, जिससे सामाजिक भेदभाव कम हो।
2. शिक्षा में समानता
संविधान का अनुच्छेद 21A, जो Right of Children to Free and Compulsory Education Act से संबंधित है, 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है। यह शैक्षिक समता सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
3. सामाजिक न्याय से संबंधित अन्य प्रावधान
- अनुच्छेद 38 – राज्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को बढ़ावा देगा।
- अनुच्छेद 39 – समान कार्य के लिए समान वेतन।
- अनुच्छेद 46 – अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक एवं आर्थिक हितों की विशेष सुरक्षा।
(3) समता की स्थापना हेतु आरक्षण नीति
संविधान में आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए की गई है। यह सकारात्मक भेदभाव (Positive Discrimination) का उदाहरण है, जिसका उद्देश्य वास्तविक समानता स्थापित करना है।
(4) निष्कर्ष
भारतीय संविधान ने समता की सुरक्षा हेतु व्यापक और ठोस प्रावधान किए हैं। मौलिक अधिकारों, नीति-निर्देशक तत्वों और विशेष आरक्षण व्यवस्था के माध्यम से सामाजिक न्याय और समान अवसर सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है।
अतः स्पष्ट है कि संविधान समता की रक्षा का सशक्त आधार प्रदान करता है, जो भारतीय लोकतंत्र की मूल आत्मा है।
1(e) What do you mean by the concept of quality education? State the indicators of quality.
प्रश्न- गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा से आप क्या समझते हैं? गुणवता के सूचक क्या हैं?
उत्तर –
(1) भूमिका
वर्तमान वैश्वीकरण और ज्ञान-आधारित समाज में केवल साक्षरता पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसी शिक्षा आवश्यक है जो व्यक्तित्व का समग्र विकास करे। इस संदर्भ में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा (Quality Education) की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
(2) गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा का अर्थ
गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा से आशय ऐसी शिक्षा से है जो –
- विद्यार्थियों के समग्र विकास (शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक एवं नैतिक) को सुनिश्चित करे,
- सीखने के स्पष्ट परिणाम (Learning Outcomes) प्राप्त करे,
- जीवनोपयोगी कौशल (Life Skills) विकसित करे,
- समानता और समावेशन (Inclusion) को बढ़ावा दे,
- तथा समाज और राष्ट्र के विकास में योगदान दे।
यह केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करने तक सीमित नहीं, बल्कि ज्ञान, कौशल, मूल्यों और दृष्टिकोण के विकास पर केंद्रित होती है।
(3) गुणवत्ता के प्रमुख सूचक (Indicators of Quality Education)
1. उपयुक्त पाठ्यक्रम (Relevant Curriculum)
पाठ्यक्रम जीवन से जुड़ा, लचीला और समसामयिक होना चाहिए। यह बाल-केंद्रित एवं अनुभवात्मक अधिगम पर आधारित हो।
2. प्रशिक्षित एवं दक्ष शिक्षक
योग्य, प्रशिक्षित और प्रेरित शिक्षक गुणवत्ता का मुख्य आधार हैं। शिक्षक की विषय-विशेषज्ञता और शिक्षण-कौशल महत्वपूर्ण सूचक है।
3. अधिगम परिणाम (Learning Outcomes)
विद्यार्थियों द्वारा निर्धारित अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति—जैसे समझ, विश्लेषण, सृजनात्मकता और समस्या-समाधान क्षमता।
4. समावेशिता (Inclusiveness)
जाति, लिंग, भाषा, धर्म, दिव्यांगता या आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न हो। सभी को समान अवसर मिले।
5. आधारभूत संरचना (Infrastructure)
स्वच्छ कक्षाएँ, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, शौचालय, पेयजल, डिजिटल संसाधन आदि की उपलब्धता।
6. सतत एवं व्यापक मूल्यांकन
मूल्यांकन केवल वार्षिक परीक्षा तक सीमित न होकर सतत, समग्र और रचनात्मक होना चाहिए।
7. सुरक्षित एवं सकारात्मक वातावरण
विद्यालय का वातावरण भयमुक्त, प्रोत्साहनकारी और नैतिक मूल्यों से युक्त हो।
8. समुदाय की भागीदारी
अभिभावकों और समुदाय की सक्रिय सहभागिता शिक्षा की गुणवत्ता को सुदृढ़ बनाती है।
(4) समकालीन संदर्भ
भारत में National Education Policy 2020 ने गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा पर विशेष बल दिया है। इसमें बहुआयामी अधिगम, कौशल विकास, डिजिटल साक्षरता और समावेशी शिक्षा को प्रमुख स्थान दिया गया है।
(5) निष्कर्ष
गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा वह है जो विद्यार्थियों को केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन के लिए आवश्यक कौशल, मूल्य और दृष्टिकोण प्रदान करे। इसके सूचक—जैसे प्रशिक्षित शिक्षक, उपयुक्त पाठ्यक्रम, अधिगम परिणाम, समावेशिता और आधारभूत सुविधाएँ—शिक्षा की वास्तविक गुणवत्ता को निर्धारित करते हैं।
अतः गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा ही राष्ट्र की प्रगति और सतत विकास का आधार है।
1(f) How the coordination between Liberalization and Globalization is important for a developing nation?
प्रश्न – एक विकासशील देश के लिये उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के मध्य समन्वय कैसे महत्त्वपूर्ण हैं ?
उत्तर-
(1) भूमिका
आधुनिक विश्व अर्थव्यवस्था परस्पर निर्भरता, मुक्त व्यापार और तकनीकी प्रगति पर आधारित है। ऐसे परिप्रेक्ष्य में उदारीकरण (Liberalization) और वैश्वीकरण (Globalization) विकासशील देशों के आर्थिक विकास के दो महत्वपूर्ण आयाम हैं। इन दोनों के मध्य संतुलित समन्वय किसी भी विकासशील देश की सतत प्रगति के लिए आवश्यक है।
(2) उदारीकरण एवं वैश्वीकरण का अर्थ
1. उदारीकरण (Liberalization)
उदारीकरण से आशय है—सरकारी नियंत्रणों, लाइसेंस प्रणाली, करों एवं व्यापार प्रतिबंधों में कमी कर अर्थव्यवस्था को अधिक खुला और प्रतिस्पर्धी बनाना।
भारत में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया 1991 में प्रारंभ हुई, जिसका नेतृत्व तत्कालीन प्रधानमंत्री P. V. Narasimha Rao और वित्त मंत्री Manmohan Singh ने किया।
2. वैश्वीकरण (Globalization)
वैश्वीकरण से आशय है—विश्व की अर्थव्यवस्थाओं का परस्पर जुड़ाव, जिसमें वस्तुओं, सेवाओं, पूँजी, तकनीक और विचारों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आदान-प्रदान होता है। इसमें अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं जैसे World Trade Organization की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
(3) विकासशील देश के लिये दोनों के मध्य समन्वय का महत्व
1. आर्थिक विकास को गति
उदारीकरण घरेलू उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाता है, जबकि वैश्वीकरण उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार उपलब्ध कराता है। दोनों का समन्वय निर्यात वृद्धि और GDP में वृद्धि को प्रोत्साहित करता है।
2. विदेशी निवेश और तकनीकी हस्तांतरण
उदारीकरण के माध्यम से विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित किया जाता है, और वैश्वीकरण के माध्यम से नई तकनीक एवं प्रबंधन कौशल का प्रवेश होता है।
3. रोजगार सृजन
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन और व्यापार विस्तार से रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, विशेषकर सेवा और विनिर्माण क्षेत्रों में।
4. प्रतिस्पर्धा एवं गुणवत्ता सुधार
अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा से घरेलू उद्योगों को अपनी गुणवत्ता, उत्पादकता और नवाचार क्षमता बढ़ानी पड़ती है।
5. गरीबी उन्मूलन में सहायक
यदि समुचित नीतियाँ अपनाई जाएँ, तो आर्थिक विकास के लाभ समाज के निचले वर्गों तक पहुँच सकते हैं।
(4) सावधानियाँ और चुनौतियाँ
- स्थानीय उद्योगों पर दबाव
- आय असमानता में वृद्धि
- सांस्कृतिक प्रभाव
- आर्थिक निर्भरता का जोखिम
अतः समन्वय का अर्थ अंधाधुंध खुलापन नहीं, बल्कि नियंत्रित एवं संतुलित नीति अपनाना है।
(5) निष्कर्ष
एक विकासशील देश के लिए उदारीकरण और वैश्वीकरण के मध्य समन्वय अत्यंत महत्वपूर्ण है। उदारीकरण आंतरिक संरचना को सुदृढ़ करता है, जबकि वैश्वीकरण बाह्य अवसर प्रदान करता है। यदि दोनों के बीच संतुलित नीति अपनाई जाए, तो यह आर्थिक वृद्धि, रोजगार सृजन और सामाजिक विकास को गति प्रदान कर सकता है।
इस प्रकार, समन्वित दृष्टिकोण ही विकासशील राष्ट्रों के सतत एवं समावेशी विकास का आधार है।
1(g) What are the main challenges of Universalization of education in Indian context.
प्रश्न- भारतीय, परिप्रेक्ष्य में शिक्षा के सार्वभौमीकरण की मुख्य चुनौतियाँ क्या है ?
उत्तर –
(1) भूमिका
शिक्षा का सार्वभौमीकरण (Universalization of Education) से आशय है—निर्धारित आयु वर्ग के प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क, अनिवार्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना। भारत में 6–14 वर्ष के बच्चों के लिए यह अधिकार Right of Children to Free and Compulsory Education Act के माध्यम से सुनिश्चित किया गया है। इसके बावजूद शिक्षा का पूर्ण सार्वभौमीकरण अभी भी अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है।
(2) शिक्षा के सार्वभौमीकरण की मुख्य चुनौतियाँ
1. आर्थिक विषमता और गरीबी
गरीबी के कारण अनेक बच्चे बाल-श्रम, घरेलू कार्य या पारिवारिक व्यवसाय में संलग्न हो जाते हैं, जिससे विद्यालयी शिक्षा बाधित होती है।
2. सामाजिक असमानता
जाति, लिंग, धर्म और जनजातीय आधार पर भेदभाव अब भी शिक्षा की पहुँच को प्रभावित करता है। बालिकाओं और अनुसूचित जाति/जनजाति के बच्चों की ड्रॉप-आउट दर अपेक्षाकृत अधिक है।
3. भौगोलिक असंतुलन
दूरस्थ ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में विद्यालय, शिक्षक और आधारभूत सुविधाओं की कमी शिक्षा के प्रसार में बाधा बनती है।
4. आधारभूत संरचना की कमी
कई विद्यालयों में पर्याप्त कक्षाएँ, शौचालय, पेयजल, पुस्तकालय और डिजिटल संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
5. शिक्षक की कमी और प्रशिक्षण का अभाव
योग्य एवं प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी तथा छात्र-शिक्षक अनुपात में असंतुलन अधिगम परिणामों को कमजोर करता है।
6. गुणवत्ता की समस्या
सार्वभौमिक नामांकन के बावजूद अधिगम स्तर (Learning Outcomes) अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाते। केवल प्रवेश सुनिश्चित करना पर्याप्त नहीं है; गुणवत्ता भी आवश्यक है।
7. डिजिटल विभाजन
तकनीकी संसाधनों की असमान उपलब्धता के कारण ऑनलाइन एवं डिजिटल शिक्षा में समानता नहीं बन पाई है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
8. अभिभावकों की जागरूकता का अभाव
कुछ क्षेत्रों में शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूकता की कमी भी सार्वभौमीकरण में बाधा उत्पन्न करती है।
(3) समकालीन नीतिगत प्रयास
भारत में National Education Policy 2020 के माध्यम से समावेशी, बहुभाषिक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर बल दिया गया है। साथ ही, समग्र शिक्षा अभियान, मध्याह्न भोजन योजना एवं छात्रवृत्ति योजनाएँ भी शिक्षा के सार्वभौमीकरण को सुदृढ़ करने का प्रयास कर रही हैं।
(4) निष्कर्ष
भारतीय परिप्रेक्ष्य में शिक्षा का सार्वभौमीकरण केवल विद्यालयों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समान अवसर और गुणवत्तापूर्ण अधिगम सुनिश्चित करने की व्यापक प्रक्रिया है।
अतः आर्थिक, सामाजिक और संरचनात्मक बाधाओं को दूर कर तथा प्रभावी नीतियों के समुचित क्रियान्वयन से ही शिक्षा का वास्तविक सार्वभौमीकरण संभव है।
1(h) State the aims of education related to constitutional values.
प्रश्न – शिक्षा के उद्देश्यों से संबंधित प्रमुख संवैधानिक मूल्यों को लिखें।
उत्तर –
(1) भूमिका
शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि ऐसे नागरिकों का निर्माण करना है जो राष्ट्र के संवैधानिक आदर्शों को समझें और उनका पालन करें। भारतीय संविधान में निहित मूल्य शिक्षा के उद्देश्यों को दिशा प्रदान करते हैं।
(2) शिक्षा के उद्देश्यों से संबंधित प्रमुख संवैधानिक मूल्य
1. न्याय (Justice)
संविधान सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय की स्थापना पर बल देता है। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों में समानता एवं न्याय के प्रति चेतना विकसित करना है।
2. स्वतंत्रता (Liberty)
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता संवैधानिक मूल्य हैं। शिक्षा विद्यार्थियों को स्वतंत्र चिंतन एवं अभिव्यक्ति की क्षमता प्रदान करती है।
3. समानता (Equality)
सभी नागरिकों को समान अवसर प्राप्त हों, यह संविधान का मूल सिद्धांत है। शिक्षा का उद्देश्य भेदभाव को समाप्त कर समान अवसर प्रदान करना है।
4. बंधुता (Fraternity)
राष्ट्रीय एकता एवं भाईचारे की भावना का विकास शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य है, जिससे सामाजिक समरसता बनी रहे।
5. धर्मनिरपेक्षता (Secularism)
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। शिक्षा सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान एवं सहिष्णुता की भावना विकसित करती है।
6. लोकतंत्र (Democracy)
लोकतांत्रिक मूल्यों—जैसे सहभागिता, सहिष्णुता, सहमति और उत्तरदायित्व—का विकास शिक्षा के माध्यम से किया जाता है।
7. समाजवाद (Socialism)
समाज में संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण एवं सामाजिक कल्याण की भावना को बढ़ावा देना शिक्षा का उद्देश्य है।
8. मानव गरिमा (Dignity of the Individual)
संविधान प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है। शिक्षा विद्यार्थियों में आत्मसम्मान और दूसरों के प्रति सम्मान की भावना उत्पन्न करती है।
(3) निष्कर्ष
शिक्षा के उद्देश्य सीधे तौर पर संवैधानिक मूल्यों से जुड़े हुए हैं। इन मूल्यों के माध्यम से शिक्षा न केवल बौद्धिक विकास करती है, बल्कि जिम्मेदार, नैतिक एवं जागरूक नागरिकों का निर्माण भी करती है। अतः शिक्षा का अंतिम लक्ष्य संवैधानिक आदर्शों पर आधारित समाज की स्थापना करना है।
1(i) What are the quality education indicators presented by school management and organization?
प्रश्न- विद्यालय प्रबंधन एवं संस्थान द्वारा गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा प्रदान करने के मुख्य सूचक क्या है ?
उत्तर –
(1) भूमिका
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा किसी भी विद्यालय की सफलता का प्रमुख मानदंड है। प्रभावी विद्यालय प्रबंधन, सुव्यवस्थित संसाधन, प्रशिक्षित शिक्षक तथा अनुकूल शिक्षण वातावरण गुणवत्ता सुनिश्चित करते हैं। अतः विद्यालय द्वारा प्रदान की जा रही शिक्षा की गुणवत्ता का मूल्यांकन कुछ प्रमुख सूचकों के आधार पर किया जाता है।
(2) गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मुख्य सूचक
1. स्पष्ट शैक्षिक उद्देश्य एवं दृष्टि (Vision & Mission)
विद्यालय के लक्ष्य स्पष्ट, यथार्थवादी एवं विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर केंद्रित होने चाहिए।
2. योग्य एवं प्रशिक्षित शिक्षक
शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता, व्यावसायिक प्रशिक्षण, नवाचारपूर्ण शिक्षण विधियों का प्रयोग तथा सतत् व्यावसायिक विकास गुणवत्ता का प्रमुख सूचक है।
3. प्रभावी विद्यालय नेतृत्व
प्रधानाचार्य एवं प्रबंधन का कुशल नेतृत्व, पारदर्शिता, निर्णय क्षमता तथा टीम वर्क विद्यालय की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
4. शिक्षण–अधिगम प्रक्रिया की गुणवत्ता
- छात्र-केंद्रित शिक्षण
- सक्रिय अधिगम पद्धतियाँ
- ICT का उपयोग
- निरंतर मूल्यांकन प्रणाली
5. अधोसंरचना एवं संसाधन
- पर्याप्त कक्षाएँ
- पुस्तकालय, प्रयोगशाला
- स्वच्छ पेयजल एवं शौचालय
- खेल एवं सह-शैक्षिक सुविधाएँ
6. छात्र उपलब्धि एवं अधिगम परिणाम
विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि, परीक्षा परिणाम, प्रतियोगिताओं में भागीदारी एवं व्यवहारिक कौशल गुणवत्ता के संकेतक हैं।
7. समावेशी शिक्षा (Inclusive Education)
सभी वर्गों—विशेष आवश्यकता वाले बच्चों सहित—को समान अवसर प्रदान करना।
8. अभिभावक एवं समुदाय की सहभागिता
विद्यालय की गतिविधियों में अभिभावकों एवं समुदाय की सक्रिय भागीदारी।
9. अनुशासन एवं सकारात्मक वातावरण
सुरक्षित, सहयोगात्मक एवं प्रेरणादायक वातावरण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का आधार है।
10. निरंतर निगरानी एवं मूल्यांकन
विद्यालय द्वारा आत्ममूल्यांकन, फीडबैक प्रणाली एवं सुधारात्मक कदम उठाना।
(3) निष्कर्ष
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल अच्छे परिणामों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रभावी प्रबंधन, सक्षम शिक्षक, समुचित संसाधन और सकारात्मक शिक्षण वातावरण का समन्वय है। जब विद्यालय इन सभी सूचकों पर संतुलित ध्यान देता है, तभी वह विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित कर सकता है।
1(i) What is meant by Privatization ? Write down the impact of Privatization on school education?
प्रश्न – निजीकरण से क्या समझते हैं? विद्यालयी शिक्षा पर निजीकरण के पड़ने वाले प्रभाव लिखें ।
उत्तर –
(1) भूमिका
आधुनिक समय में शिक्षा के क्षेत्र में कई संरचनात्मक परिवर्तन हुए हैं, जिनमें निजीकरण एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति है। विशेषतः भारत में शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थानों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। निजीकरण ने विद्यालयी शिक्षा की संरचना, गुणवत्ता और पहुँच पर व्यापक प्रभाव डाला है।
(2) निजीकरण का अर्थ
निजीकरण (Privatization) से आशय है—शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की भूमिका को सीमित करते हुए निजी व्यक्तियों, संगठनों या संस्थाओं को विद्यालयों की स्थापना, संचालन एवं प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपना।
अर्थात् जब शिक्षा का संचालन मुख्यतः निजी क्षेत्र द्वारा किया जाता है और वह अपनी नीतियाँ, शुल्क संरचना एवं प्रबंधन स्वयं निर्धारित करता है, तो उसे शिक्षा का निजीकरण कहा जाता है।
(3) विद्यालयी शिक्षा पर निजीकरण के प्रभाव
(क) सकारात्मक प्रभाव
- शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार – आधुनिक संसाधन, स्मार्ट कक्षाएँ, प्रशिक्षित शिक्षक एवं नवीन शिक्षण विधियों का उपयोग।
- प्रतिस्पर्धा में वृद्धि – सरकारी और निजी विद्यालयों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से सुधार की संभावना।
- अधोसंरचना का विकास – बेहतर भवन, प्रयोगशाला, पुस्तकालय एवं खेल सुविधाएँ।
- प्रबंधन की दक्षता – त्वरित निर्णय, उत्तरदायित्व एवं परिणाम-उन्मुख कार्यप्रणाली।
(ख) नकारात्मक प्रभाव
- शिक्षा का व्यापारीकरण – शिक्षा सेवा के स्थान पर लाभ कमाने का साधन बन सकती है।
- शुल्क वृद्धि – उच्च फीस के कारण गरीब एवं मध्यम वर्ग के विद्यार्थियों के लिए कठिनाई।
- सामाजिक असमानता में वृद्धि – आर्थिक आधार पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक असमान पहुँच।
- मूल्य शिक्षा की उपेक्षा – कभी-कभी केवल परीक्षा परिणामों पर अधिक ध्यान।
- ग्रामीण क्षेत्रों की उपेक्षा – निजी संस्थान प्रायः लाभकारी शहरी क्षेत्रों में स्थापित होते हैं।
(4) निष्कर्ष
निजीकरण ने विद्यालयी शिक्षा में गुणवत्ता, संसाधन एवं प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया है, किंतु इसके कारण शिक्षा में असमानता और व्यापारीकरण की समस्या भी उत्पन्न हुई है। अतः आवश्यक है कि सरकार प्रभावी नियमन और संतुलित नीति के माध्यम से निजीकरण के सकारात्मक पहलुओं को प्रोत्साहित करे तथा नकारात्मक प्रभावों को नियंत्रित करे।
Section-B (Short answer type questions)
खण्ड – ब (लघु उत्तरीय प्रश्न)
2. Answer any four questions of the following:
निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दें । 5×4 = 20
(a) Discuss the role of education for the upliftment of tribal people.
जनजातीय लोगों के उत्थान के लिये शिक्षा की भूमिका की व्याख्या करें ।
(b) What is common school system?
सामान्य विद्यालय व्यवस्था क्या है ?
(e) Main elements of Democracy.
लोकतंत्र के मुख्य तत्त्व ।
(d) What should be the role of teachers for the betterment of students ?
छात्रों की भलाई के लिये शिक्षकों की भूमिका कैसी होनी चाहिए ?
(e) Recommendations of Kothari Commission for higher education.
उच्च शिक्षा के लिये कोठारी आयोग की सिफारिशें ।
(f) Impact of UEE on secondary education in India.
भारत में माध्यमिक शिक्षा पर UEE का प्रभाव ।
Section – C
खण्ड -स
(Objective type questions)
(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)
3. Choose the correct answer of the following : 1 × 10 = 10
निम्नलिखित में से सही उत्तर का चयन करें :
(a) The first stage of compulsory education is :
अनिवार्य शिक्षा का पहला चरण है :
(i) Kindergarten – किन्डरगार्टेन
(ii) Elementary education – प्रारंभिक शिक्षा
(iii) Secondary education – माध्यमिक शिक्षा
(iv) Higher education – उच्च शिक्षा
(b) Free and compulsory education is laid down by :
निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा किसके द्वारा निर्धारित है :
(i) Article 21 -अनुच्छेद 21
(ii) Article 21 (A) -अनुच्छेद 21 (A)
(iii) Article 45 – अनुच्छेद 45
(iv) Article 42 -अनुच्छेद 42
(c) Universalization of elementary education is a :
प्रारंभिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण है
(i) Constitution provision – संवैधानिक अधिकार
(ii) Fundamental right – मौलिक अधिकार
(iii) Both of the above – उपरोक्त दोनों
(iv) None of the above -उपर्युक्त में कोई नहीं
(d) National Council for Teacher Education was constituted on the recommendation of :
राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद का गठन किसकी सिफारिश पर हुआ है :
(i) University education Commission, 1948-49
विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग 1948-49
(ii) Secondary Education Commission, 1952-53
माध्यमिक शिक्षा आयोग 1952-53
(iii) Kothari commission, 1964-66
कोठारी आयोग, 1964-66
(iv) National Policy of Education, 1986
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986
(e) Wood’s Despatch is also known as :
वुड डिस्पैच माना जाता है :
(i) Magna Carta – भैरना कार्टा
(ii) National Policy – राष्ट्रीय नीति
(iii) Fundamental right – मौलिक अधिकार
(iv) None of the above – उपर्युक्त में कोई नहीं
(f) Right to Education, Act-2009 is in implementation for children of which age group ?
शिक्षा का अधिकार अधिनियम किस आयु वर्ग के बच्चों के लिये लागू है?
(i) 6-12 years – 6-12 वर्ष
(ii) 6-14 years – 6-14 वर्ष
(iii) 7-13 years – 7–13 वर्ष
(iv) 5-11 years – 5-11 वर्ष
(g) Who was the the chairman Kothari Commission ?
कोठारी आयोग के अध्यक्ष कौन थे ?
(i) Dr. D.S. Kothari
डॉ. डी. एस. कोठारी
(ii) Dr. D.P. Kothari
डॉ. डी. पी. कोठारी
(iii) Dr. S P Kothari
डॉ. एस. पी. कोठारी
(iv) Dr. T. H. Kothari
डॉ. टी. एच. कोठारी
(h) The king pin in institutional planning is the :
संस्थागत नियोजन में किंग पिन है :
(i) Teacher – शिक्षक
(ii) Principal – प्रिंसिपल
(iii) Head – हेड
(iv) None of the above – उपरोक्त में कोई नहीं
(i) What is the biggest challenge to Democracy ?
लोकतंत्र के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती क्या है ?
(i) Higher education system
उच्च शिक्षा व्यवस्था
(ii) Food arrangement
खाने की व्यवस्था
(iii) Strengthening of democracy
लोकतंत्र का विस्तार
(iv) Population control
जनसंख्या नियंत्रण
6) Issue regarding establishment of common school system in India is related to :
भारत में समान विद्यालय प्रणाली की स्थापना से संबंधित मुद्दा किससे संबंधित है ?
(i) Problem of education and modernization
शिक्षा और आधुनिकीकरण की समस्या
(ii) Social equity
सामाजिक समानता
(iii) Politics and educational
राजनैतिक और शैक्षिक परिवर्तन
(iv) Education of backward section
पिछड़े वर्ग की शिक्षा
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