VBSPU B.Ed. Educational Technology & ICT PREVIOUS YEAR QUESTION PAPER & SYLLABUS WITH NOTES
Table of Contents
Toggle| विषय | Educational Technology & ICT Premium Notes |
| पेपर | 202 |
| विश्वविद्यालय | वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय |
| सेमेस्टर | द्वितीय सेमेस्टर |
वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय बी.एड द्वितीय सेमेस्टर के पेपर – 202 शैक्षिक तकनीकी तथा सूचना एवं संप्रेषण तकनीकी ( Educational Technology & ICT Notes) दिया गया है |
VBSPU B.Ed. 2nd SEMESTER EDUCATIONAL TECHNOLOGY & ICT PREVIOUS YEAR QUESTION PAPER WITH SOLUTION |
- बी.एड. प्रथम वर्ष (द्वितीय सेमेस्टर)
- द्वितीय प्रश्न-पत्र (202)
- समय : 3 घण्टे ]
- शैक्षिक तकनीकी तथा सूचना एवं सम्प्रेषण तकनीकी [
- पूर्णांक : 90
- खण्ड ‘अ’ : अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (10 x 2 = 20 अंक)
प्रश्न 1. इस प्रश्न के सभी भागों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक भाग का उत्तर लगभग 50 शब्दों में दीजिए।
(i) सम्प्रेषण के कौन-कौन से तत्व हैं?
(ii) कम्प्यूटर की विशेषताएँ बताइए।
(iii) सूक्ष्म शिक्षण की परिभाषाएँ दीजिए।
(iv) व्यावहारिक तकनीकी की विशेषताएँ बताइए।
(v) शैक्षिक तकनीकी का महत्त्व बताइए।
(vi) प्रत्यय निष्पत्ति प्रतिमान क्या है ?
(vii)कम्प्यूटर वायरस के प्रकार बताइए।
(viii) शैक्षिक तकनीक की उपयोगिता लिखिए।
(ix)’विशिष्ट से सामान्य की ओर’ शिक्षण सूत्र को स्पष्ट कीजिए।
(x) शिक्षण विधि और शिक्षण आव्यूह में अन्तर लिखिए।
खण्ड ‘ब’: लघु उत्तरीय प्रश्न (5×8 = 40 अंक)
नोट- सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 200 शब्दों में दीजिए।
प्रश्न 2.शिक्षण प्रतिमान की उपयोगिता बताइए।
अथवा शैक्षिक तकनीक के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
प्रश्न 3. प्रणाली उपागम (विश्लेषण) की उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
अथवा सूक्ष्म शिक्षण के सम्प्रत्यय एवं महत्त्व की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
प्रश्न 4. पृच्छा शिक्षण प्रतिमान का वर्णन कीजिए।
अथवा सेल्युलर फोन्स क्या है? इसके लाभ व हानि बताइए।
प्रश्न 5. इलेक्ट्रॉनिक मेल क्या है?
अथवा शिक्षण में बहु इन्द्रिय अनुदेशन की उपयोगिता लिखिए।
प्रश्न 6. अभिक्रमित अनुदेशन से आप क्या समझते हैं?
अथवा शिक्षा में इण्टरनेट से आप क्या समझते हैं?
खण्ड ‘स’ : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (2 x 15 = 30 अंक)
नोट : किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 500 शब्दों में दीजिए।
प्रश्न 07.भाषा-प्रयोगशाला के बारे में विस्तार से उल्लेख कीजिए।
प्रश्न 08.शैक्षिक तकनीकी की विशेषताओं को बताइए।
प्रश्न 09. शिक्षण प्रतिमान से क्या आशय है? फ्लैण्डर के अन्तर्क्रिया विश्लेषण पर प्रकाश डालिए।
प्रश्न 10. सूक्ष्म शिक्षण से आप क्या समझते हैं? इसकी विशेषताएँ बताइये ।
प्रश्न 11. शैक्षिक उद्देश्य और शिक्षण उद्देश्यों में क्या अन्तर है? शैक्षिक उद्देश्यों के वर्गीकरण की संक्षिप्त विवेचना कीजिए
।
प्रश्न (i) सम्प्रेषण के कौन-कौन से तत्व हैं?
उत्तर-
सम्प्रेषण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से विचारों, सूचनाओं तथा भावनाओं का आदान-प्रदान किया जाता है। इसके प्रमुख तत्व प्रेषक, संदेश, माध्यम, प्राप्तकर्ता तथा प्रतिपुष्टि हैं। प्रेषक संदेश भेजता है, संदेश वह जानकारी होती है जिसे भेजा जाता है। माध्यम संदेश पहुँचाने का साधन होता है, जैसे भाषा, पत्र या इंटरनेट। प्राप्तकर्ता संदेश को ग्रहण कर उसका अर्थ समझता है। इसके बाद प्राप्तकर्ता अपनी प्रतिक्रिया देता है, जिसे प्रतिपुष्टि कहते हैं। सम्प्रेषण तभी प्रभावी माना जाता है जब संदेश स्पष्ट रूप से समझ लिया जाए और उचित प्रतिक्रिया प्राप्त हो।
प्रश्न (ii) कम्प्यूटर की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-
कम्प्यूटर एक आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है जो तेजी से कार्य करता है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ गति, शुद्धता, संग्रहण क्षमता, बहुउद्देशीयता तथा स्वचालन हैं। कम्प्यूटर बहुत कम समय में जटिल गणनाएँ कर सकता है। यह बिना गलती के सही परिणाम प्रदान करता है। इसमें बड़ी मात्रा में सूचनाएँ संग्रहित की जा सकती हैं। कम्प्यूटर विभिन्न क्षेत्रों जैसे शिक्षा, बैंक, चिकित्सा तथा व्यापार में उपयोगी है। यह लगातार कार्य करने में सक्षम होता है और थकान महसूस नहीं करता। इन विशेषताओं के कारण कम्प्यूटर आधुनिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग बन गया है।
प्रश्न (iii) सूक्ष्म शिक्षण की परिभाषाएँ दीजिए।
उत्तर-
सूक्ष्म शिक्षण एक ऐसी प्रशिक्षण प्रक्रिया है जिसमें शिक्षक कम समय तथा सीमित विद्यार्थियों के बीच शिक्षण कौशल का अभ्यास करता है। इसमें शिक्षण को सरल और प्रभावी बनाने के लिए छोटे-छोटे चरणों में अभ्यास कराया जाता है। डी. एलन के अनुसार, “सूक्ष्म शिक्षण शिक्षक प्रशिक्षण की ऐसी तकनीक है जिसमें शिक्षक अपनी शिक्षण क्षमता का विकास करता है।” इसमें शिक्षक एक समय में केवल एक कौशल पर ध्यान देता है। शिक्षण के बाद प्रतिक्रिया प्राप्त कर सुधार किया जाता है। इस प्रकार सूक्ष्म शिक्षण शिक्षक को कुशल, आत्मविश्वासी तथा प्रभावी बनाने में सहायता करता है।
प्रश्न (iv) व्यावहारिक तकनीकी की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-
व्यावहारिक तकनीकी शिक्षा को उपयोगी और क्रियात्मक बनाने पर बल देती है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण, उद्देश्यपूर्ण शिक्षण, सरलता तथा क्रियात्मकता हैं। इसमें शिक्षण को अधिक प्रभावी बनाने के लिए आधुनिक साधनों और विधियों का उपयोग किया जाता है। यह विद्यार्थियों की आवश्यकताओं तथा रुचियों के अनुसार कार्य करती है। व्यावहारिक तकनीकी में प्रयोग, अभ्यास तथा अनुभव को विशेष महत्व दिया जाता है। इसके माध्यम से शिक्षा को जीवनोपयोगी बनाया जाता है। यह विद्यार्थियों में समस्या समाधान क्षमता तथा रचनात्मक सोच का विकास करती है।
प्रश्न (v) शैक्षिक तकनीकी का महत्त्व बताइए।
उत्तर-
शैक्षिक तकनीकी शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी और सरल बनाती है। इसके माध्यम से शिक्षा को रुचिकर, स्पष्ट तथा स्थायी बनाया जाता है। यह शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण विधियों तथा उपकरणों के उपयोग में सहायता प्रदान करती है। शैक्षिक तकनीकी के कारण विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी बढ़ती है तथा उनकी सीखने की गति में सुधार होता है। इससे समय और श्रम की बचत होती है। दूरस्थ शिक्षा, ऑनलाइन कक्षाएँ तथा डिजिटल सामग्री का विकास भी शैक्षिक तकनीकी के कारण संभव हुआ है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में इसका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
प्रश्न (vi) प्रत्यय निष्पत्ति प्रतिमान क्या है ?
उत्तर-
प्रत्यय निष्पत्ति प्रतिमान एक शिक्षण मॉडल है जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों में किसी अवधारणा या प्रत्यय को स्पष्ट रूप से विकसित करना होता है। इस प्रतिमान में उदाहरणों तथा अनुभवों के माध्यम से विद्यार्थियों को किसी विषय की सही समझ प्रदान की जाती है। शिक्षक पहले विभिन्न उदाहरण प्रस्तुत करता है, फिर उनमें समानताओं और भिन्नताओं को स्पष्ट करता है। इसके बाद विद्यार्थी स्वयं निष्कर्ष निकालते हैं और प्रत्यय का निर्माण करते हैं। यह प्रतिमान विद्यार्थियों में तार्किक सोच, विश्लेषण क्षमता तथा समझ विकसित करने में सहायक होता है। शिक्षा में इसका प्रयोग अवधारणाओं को स्थायी रूप से समझाने के लिए किया जाता है।
प्रश्न (vii) कम्प्यूटर वायरस के प्रकार बताइए।
उत्तर-
कम्प्यूटर वायरस ऐसे हानिकारक प्रोग्राम होते हैं जो कम्प्यूटर की कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं। इनके प्रमुख प्रकार बूट सेक्टर वायरस, फाइल वायरस, मैक्रो वायरस, नेटवर्क वायरस तथा ट्रोजन हॉर्स हैं। बूट सेक्टर वायरस कम्प्यूटर के प्रारंभिक भाग को प्रभावित करता है। फाइल वायरस प्रोग्राम फाइलों को नुकसान पहुँचाता है। मैक्रो वायरस दस्तावेज़ों में फैलता है। नेटवर्क वायरस इंटरनेट तथा नेटवर्क के माध्यम से फैलता है। ट्रोजन हॉर्स देखने में उपयोगी लगता है लेकिन यह कम्प्यूटर को नुकसान पहुँचाता है। वायरस से बचाव के लिए एंटीवायरस सॉफ्टवेयर का उपयोग आवश्यक है।
प्रश्न (viii) शैक्षिक तकनीक की उपयोगिता लिखिए।
उत्तर-
शैक्षिक तकनीक शिक्षा को प्रभावी, सरल और रुचिकर बनाती है। इसके माध्यम से कठिन विषयों को चित्र, ध्वनि तथा वीडियो के द्वारा आसानी से समझाया जा सकता है। यह विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी बढ़ाती है तथा सीखने की गति में सुधार करती है। शैक्षिक तकनीक शिक्षक को योजनाबद्ध शिक्षण में सहायता देती है। ऑनलाइन शिक्षा, स्मार्ट कक्षा तथा ई-लर्निंग इसके महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। इससे समय और श्रम की बचत होती है तथा शिक्षा का विस्तार दूर-दराज क्षेत्रों तक संभव होता है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में शैक्षिक तकनीक की उपयोगिता अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
प्रश्न (ix) ‘विशिष्ट से सामान्य की ओर’ शिक्षण सूत्र को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
‘विशिष्ट से सामान्य की ओर’ शिक्षण सूत्र का अर्थ है कि शिक्षण की शुरुआत विशेष उदाहरणों से की जाए और बाद में सामान्य नियम या सिद्धांत तक पहुँचा जाए। इस विधि में पहले विद्यार्थियों को उदाहरण, तथ्य या घटनाएँ बताई जाती हैं। फिर उन उदाहरणों के आधार पर सामान्य निष्कर्ष निकाला जाता है। यह विधि विद्यार्थियों में तार्किक सोच तथा विश्लेषण क्षमता का विकास करती है। विज्ञान और गणित के शिक्षण में इसका विशेष महत्व है। इससे विद्यार्थी स्वयं अनुभव के आधार पर नियमों को समझते हैं, जिससे ज्ञान अधिक स्थायी बनता है।
प्रश्न (x) शिक्षण विधि और शिक्षण आव्यूह में अन्तर लिखिए।
उत्तर-
शिक्षण विधि शिक्षण कार्य को पूरा करने का सामान्य तरीका है, जबकि शिक्षण आव्यूह शिक्षण की संगठित योजना और संरचना को दर्शाता है। शिक्षण विधि में व्याख्यान, चर्चा, प्रश्नोत्तर आदि आते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य विषयवस्तु को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना होता है। दूसरी ओर, शिक्षण आव्यूह में उद्देश्यों, सामग्री, क्रियाओं तथा मूल्यांकन का क्रमबद्ध संगठन किया जाता है। शिक्षण विधि केवल पढ़ाने की प्रक्रिया पर बल देती है, जबकि शिक्षण आव्यूह सम्पूर्ण शिक्षण व्यवस्था को व्यवस्थित बनाता है। दोनों मिलकर शिक्षण को प्रभावी तथा सफल बनाने में सहायता करते हैं।
खण्ड ‘ब’: लघु उत्तरीय प्रश्न (5×8 = 40 अंक)
नोट- सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 200 शब्दों में दीजिए।
प्रश्न 2. शिक्षण प्रतिमान की उपयोगिता बताइए।
उत्तर –
भूमिका
शिक्षण प्रतिमान शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावी, व्यवस्थित तथा उद्देश्यपूर्ण बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। यह शिक्षक को शिक्षण कार्य को वैज्ञानिक ढंग से संचालित करने में सहायता प्रदान करता है। शिक्षण प्रतिमान के माध्यम से विद्यार्थियों के ज्ञान, कौशल तथा व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन लाया जाता है। आधुनिक शिक्षा में इसका विशेष महत्व है।
शिक्षण प्रतिमान की उपयोगिता निम्नलिखित है—
(i) शिक्षण को व्यवस्थित बनाना –
शिक्षण प्रतिमान शिक्षण कार्य को क्रमबद्ध तथा योजनाबद्ध बनाता है, जिससे शिक्षक आसानी से शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति कर सकता है।
(ii) विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी –
यह विद्यार्थियों को शिक्षण प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित करता है, जिससे उनका अधिगम अधिक प्रभावी बनता है।
(iii) मानसिक विकास में सहायक –
शिक्षण प्रतिमान विद्यार्थियों की सोचने, समझने तथा समस्या समाधान करने की क्षमता का विकास करता है।
(iv) शिक्षण विधियों के चयन में सहायता –
इसके माध्यम से शिक्षक विषय तथा परिस्थिति के अनुसार उचित शिक्षण विधि का चयन कर सकता है।
(v) व्यक्तिगत भिन्नताओं का ध्यान –
यह विद्यार्थियों की रुचि, क्षमता तथा आवश्यकता के अनुसार शिक्षण करने में सहायता करता है।
(vi) मूल्यांकन को प्रभावी बनाना –
शिक्षण प्रतिमान शिक्षण के साथ-साथ मूल्यांकन प्रक्रिया को भी अधिक प्रभावी एवं उद्देश्यपूर्ण बनाता है।
निष्कर्ष
अतः स्पष्ट है कि शिक्षण प्रतिमान शिक्षा प्रक्रिया का एक आवश्यक अंग है। यह शिक्षण को वैज्ञानिक, सरल तथा प्रभावी बनाकर विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अथवा
प्रश्न. शैक्षिक तकनीक के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर –
भूमिका
शैक्षिक तकनीक आधुनिक शिक्षा का महत्वपूर्ण भाग है। इसके माध्यम से शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को सरल, प्रभावी तथा रुचिकर बनाया जाता है। यह शिक्षा को वैज्ञानिक आधार प्रदान करती है तथा विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण करने में सहायता करती है।
शैक्षिक तकनीक के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं—
(i) हार्डवेयर तकनीक –
इस तकनीक में मशीनों तथा उपकरणों का उपयोग किया जाता है। जैसे— प्रोजेक्टर, रेडियो, टेलीविजन, कम्प्यूटर, स्मार्ट बोर्ड आदि। ये उपकरण शिक्षण को आकर्षक तथा प्रभावी बनाते हैं।
(ii) सॉफ्टवेयर तकनीक –
इसका संबंध शिक्षण विधियों, मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों तथा शिक्षण रणनीतियों से होता है। इसमें पाठ योजना, अधिगम सामग्री तथा मूल्यांकन तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य प्रभावी अधिगम उत्पन्न करना है।
(iii) प्रणाली उपागम तकनीक –
इस तकनीक में सम्पूर्ण शिक्षण प्रक्रिया को एक प्रणाली के रूप में देखा जाता है। इसमें उद्देश्यों का निर्धारण, सामग्री चयन, शिक्षण प्रक्रिया तथा मूल्यांकन को क्रमबद्ध ढंग से संगठित किया जाता है।
(iv) व्यवहार तकनीक –
यह तकनीक विद्यार्थियों के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन लाने पर बल देती है। इसमें पुनर्बलन, अभ्यास तथा प्रेरणा का विशेष महत्व होता है।
निष्कर्ष
इस प्रकार शैक्षिक तकनीक के विभिन्न प्रकार शिक्षा को आधुनिक, प्रभावी तथा विद्यार्थी-केंद्रित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके प्रयोग से शिक्षण प्रक्रिया अधिक सरल, वैज्ञानिक तथा उपयोगी बनती है।
प्रश्न 3. प्रणाली उपागम (विश्लेषण) की उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
भूमिका
प्रणाली उपागम शिक्षा एवं शिक्षण को एक संगठित प्रणाली के रूप में देखने की प्रक्रिया है। इसमें शिक्षण के सभी घटकों— उद्देश्य, सामग्री, शिक्षण विधि, साधन तथा मूल्यांकन— को आपस में जोड़कर कार्य किया जाता है। यह शिक्षण को अधिक प्रभावी, योजनाबद्ध तथा वैज्ञानिक बनाता है। आधुनिक शिक्षा में प्रणाली उपागम का विशेष महत्व है क्योंकि यह शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप प्रदान करता है।
प्रणाली उपागम की उपयोगिता निम्नलिखित है—
(i) शिक्षण को व्यवस्थित बनाना –
यह शिक्षण प्रक्रिया को क्रमबद्ध एवं योजनाबद्ध बनाता है, जिससे शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति सरल हो जाती है।
(ii) उद्देश्यों की स्पष्टता –
प्रणाली उपागम के माध्यम से शिक्षण उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाता है, जिससे शिक्षक एवं विद्यार्थी दोनों को दिशा मिलती है।
(iii) समय एवं श्रम की बचत –
यह शिक्षण कार्य को अधिक प्रभावी बनाकर समय तथा श्रम की बचत करता है।
(iv) शिक्षण सामग्री का उचित चयन –
इसके द्वारा विद्यार्थियों की आवश्यकता तथा क्षमता के अनुसार उपयुक्त शिक्षण सामग्री का चयन किया जाता है।
(v) मूल्यांकन को प्रभावी बनाना –
प्रणाली उपागम शिक्षण के साथ-साथ मूल्यांकन प्रक्रिया को भी अधिक वैज्ञानिक तथा उद्देश्यपूर्ण बनाता है।
(vi) आधुनिक तकनीकों का उपयोग –
इसके माध्यम से कम्प्यूटर, प्रोजेक्टर तथा अन्य तकनीकी साधनों का प्रभावी उपयोग किया जाता है।
निष्कर्ष
अतः स्पष्ट है कि प्रणाली उपागम शिक्षण प्रक्रिया को वैज्ञानिक, प्रभावी तथा परिणामोन्मुख बनाता है। यह शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाकर विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अथवा
प्रश्न- सूक्ष्म शिक्षण के सम्प्रत्यय एवं महत्त्व की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
उत्तर
भूमिका
सूक्ष्म शिक्षण शिक्षक प्रशिक्षण की एक महत्वपूर्ण तकनीक है, जिसमें शिक्षक सीमित समय, सीमित विषयवस्तु तथा कम विद्यार्थियों के बीच शिक्षण कौशल का अभ्यास करता है। इसका उद्देश्य शिक्षकों की शिक्षण क्षमता का विकास करना तथा उन्हें प्रभावी शिक्षण के लिए प्रशिक्षित करना है। आधुनिक शिक्षक प्रशिक्षण में सूक्ष्म शिक्षण का विशेष महत्व है।
सूक्ष्म शिक्षण के सम्प्रत्यय एवं महत्त्व की संक्षिप्त व्याख्या
(i) सूक्ष्म शिक्षण का सम्प्रत्यय –
सूक्ष्म शिक्षण में शिक्षण प्रक्रिया को छोटे-छोटे भागों में विभाजित किया जाता है। इसमें शिक्षक एक समय में केवल एक शिक्षण कौशल, जैसे प्रश्न पूछना, उदाहरण देना या ब्लैकबोर्ड प्रयोग, का अभ्यास करता है। शिक्षण के बाद प्रतिक्रिया प्राप्त कर शिक्षक अपनी त्रुटियों में सुधार करता है।
(ii) शिक्षण कौशल का विकास –
सूक्ष्म शिक्षण शिक्षक में विभिन्न शिक्षण कौशलों का विकास करता है तथा उसे प्रभावी शिक्षक बनने में सहायता देता है।
(iii) आत्मविश्वास में वृद्धि –
लगातार अभ्यास एवं प्रतिक्रिया के कारण शिक्षक का आत्मविश्वास बढ़ता है।
(iv) त्रुटियों का सुधार –
इस तकनीक के माध्यम से शिक्षक अपनी कमियों को पहचानकर उनमें सुधार कर सकता है।
(v) प्रभावी शिक्षण में सहायक –
सूक्ष्म शिक्षण शिक्षण प्रक्रिया को अधिक सरल, स्पष्ट तथा प्रभावशाली बनाता है।
निष्कर्ष
इस प्रकार सूक्ष्म शिक्षण शिक्षक प्रशिक्षण की एक उपयोगी एवं प्रभावी तकनीक है। यह शिक्षकों के कौशल, आत्मविश्वास तथा शिक्षण क्षमता का विकास कर शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाता है।
प्रश्न 4. पृच्छा शिक्षण प्रतिमान का वर्णन कीजिए।
उत्तर
भूमिका
पृच्छा शिक्षण प्रतिमान एक महत्वपूर्ण शिक्षण मॉडल है, जिसमें प्रश्नों के माध्यम से विद्यार्थियों में जिज्ञासा, चिंतन तथा खोज की प्रवृत्ति विकसित की जाती है। इस प्रतिमान में शिक्षक विद्यार्थियों को सीधे उत्तर देने के बजाय प्रश्न पूछकर उन्हें सोचने और उत्तर खोजने के लिए प्रेरित करता है। यह शिक्षण को छात्र-केंद्रित तथा सक्रिय बनाता है। आधुनिक शिक्षा में इसका विशेष महत्व है क्योंकि यह विद्यार्थियों की तार्किक एवं विश्लेषणात्मक क्षमता का विकास करता है।
पृच्छा शिक्षण प्रतिमान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
(i) प्रश्न आधारित शिक्षण –
इस प्रतिमान में शिक्षण प्रश्नों के माध्यम से किया जाता है। शिक्षक ऐसे प्रश्न पूछता है जो विद्यार्थियों में जिज्ञासा उत्पन्न करें।
(ii) चिंतन शक्ति का विकास –
यह विद्यार्थियों को सोचने, तर्क करने तथा समस्या का समाधान खोजने के लिए प्रेरित करता है।
(iii) सक्रिय अधिगम –
पृच्छा शिक्षण प्रतिमान में विद्यार्थी केवल श्रोता नहीं रहते, बल्कि सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।
(iv) खोज एवं अनुसंधान की प्रवृत्ति –
इससे विद्यार्थियों में नई जानकारी प्राप्त करने तथा खोज करने की रुचि विकसित होती है।(v) शिक्षक की भूमिका –
इस प्रतिमान में शिक्षक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है तथा विद्यार्थियों को सही दिशा प्रदान करता है।(vi) प्रभावी शिक्षण –
यह शिक्षण प्रक्रिया को अधिक रोचक, स्पष्ट तथा स्थायी बनाता है।
निष्कर्ष
अतः स्पष्ट है कि पृच्छा शिक्षण प्रतिमान विद्यार्थियों में जिज्ञासा, तार्किकता तथा रचनात्मक सोच का विकास करता है। यह आधुनिक शिक्षा की एक प्रभावी एवं उपयोगी शिक्षण पद्धति है।
अथवा
प्रश्न- सेल्युलर फोन्स क्या है? इसके लाभ व हानि बताइए।
उत्तर –
भूमिका
सेल्युलर फोन या मोबाइल फोन आधुनिक संचार का एक महत्वपूर्ण साधन है। इसके माध्यम से व्यक्ति दूर बैठे लोगों से आसानी से बातचीत कर सकता है। आज के समय में मोबाइल फोन केवल बातचीत तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, व्यापार, मनोरंजन तथा इंटरनेट उपयोग का भी प्रमुख माध्यम बन गया है। विज्ञान और तकनीकी के विकास ने इसे मानव जीवन का आवश्यक भाग बना दिया है।
सेल्युलर फोन्स के लाभ
(i) संचार का सरल माध्यम –
मोबाइल फोन के द्वारा व्यक्ति कहीं भी और कभी भी संपर्क स्थापित कर सकता है।
(ii) शिक्षा में उपयोगी –
ऑनलाइन कक्षाएँ, ई-पुस्तकें तथा शैक्षिक वीडियो के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करना आसान हो गया है।(iii) समय की बचत –
मोबाइल फोन के माध्यम से आवश्यक कार्य शीघ्रता से पूरे किए जा सकते हैं।
(iv) मनोरंजन का साधन –
इसमें संगीत, वीडियो, गेम तथा सोशल मीडिया जैसी सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं।
मोबाइल फोन की हानियाँ –
अत्यधिक उपयोग से समय की बर्बादी होती है तथा पढ़ाई पर बुरा प्रभाव पड़ता है। मोबाइल की लत मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है। इसके अतिरिक्त साइबर अपराध तथा गोपनीयता की समस्या भी बढ़ रही है।
निष्कर्ष
इस प्रकार सेल्युलर फोन आधुनिक जीवन का महत्वपूर्ण साधन है। यदि इसका उपयोग संतुलित और सही तरीके से किया जाए तो यह अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है, लेकिन गलत उपयोग से अनेक हानियाँ भी उत्पन्न हो सकती हैं।
प्रश्न 5. इलेक्ट्रॉनिक मेल क्या है?
उत्तर –
भूमिका
इलेक्ट्रॉनिक मेल, जिसे संक्षेप में ई-मेल कहा जाता है, आधुनिक संचार का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसके द्वारा इंटरनेट की सहायता से संदेश, दस्तावेज़, चित्र तथा अन्य सूचनाएँ एक स्थान से दूसरे स्थान तक शीघ्रता से भेजी जाती हैं। वर्तमान समय में ई-मेल का उपयोग शिक्षा, व्यापार, कार्यालय तथा व्यक्तिगत कार्यों में व्यापक रूप से किया जा रहा है। यह संचार को सरल, तेज तथा सुलभ बनाता है।
इलेक्ट्रॉनिक मेल से लाभ
(i) संदेश भेजने का आधुनिक माध्यम –
ई-मेल इंटरनेट के माध्यम से संदेश भेजने और प्राप्त करने की सुविधा प्रदान करता है।
(ii) तीव्र गति –
इसके द्वारा कुछ ही सेकंड में विश्व के किसी भी स्थान पर संदेश भेजा जा सकता है।
(iii) कम खर्चीला साधन –
ई-मेल का उपयोग करने में बहुत कम खर्च होता है, इसलिए यह संचार का सस्ता माध्यम माना जाता है।
(iv) दस्तावेज़ भेजने की सुविधा –
इसके माध्यम से फाइल, चित्र, वीडियो तथा अन्य दस्तावेज़ आसानी से भेजे जा सकते हैं।
(v) शिक्षा एवं व्यापार में उपयोगिता –
ई-मेल का उपयोग ऑनलाइन शिक्षा, कार्यालय कार्य, नौकरी आवेदन तथा व्यावसायिक संचार में किया जाता है।
(vi) सुरक्षित एवं सुविधाजनक –
यह जानकारी को सुरक्षित रखने तथा भविष्य में उपयोग के लिए संग्रहित करने की सुविधा देता है।
निष्कर्ष
अतः स्पष्ट है कि इलेक्ट्रॉनिक मेल आधुनिक युग का अत्यंत उपयोगी संचार साधन है। इसने संचार प्रक्रिया को तेज, सरल तथा प्रभावी बनाकर शिक्षा, व्यापार और सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है।
अथवा
प्रश्न – शिक्षण में बहु इन्द्रिय अनुदेशन की उपयोगिता लिखिए।
उत्तर –
भूमिका
बहु इन्द्रिय अनुदेशन ऐसी शिक्षण प्रक्रिया है जिसमें विद्यार्थियों की एक से अधिक इन्द्रियों— जैसे आँख, कान, स्पर्श आदि— का उपयोग करके शिक्षण कराया जाता है। इसका उद्देश्य शिक्षण को अधिक प्रभावी, रुचिकर तथा स्थायी बनाना है। आधुनिक शिक्षा में इसका विशेष महत्व है क्योंकि इससे विद्यार्थी विषयवस्तु को आसानी से समझते हैं।
शिक्षण में बहु इन्द्रिय अनुदेशन की उपयोगिता
(i) अधिगम को प्रभावी बनाना –
जब विद्यार्थी एक साथ कई इन्द्रियों का उपयोग करते हैं, तो उनका सीखना अधिक प्रभावशाली हो जाता है।
(ii) रुचि एवं ध्यान में वृद्धि –
चित्र, ध्वनि, मॉडल तथा गतिविधियों के प्रयोग से विद्यार्थियों की रुचि और ध्यान बढ़ता है।
(iii) स्मरण शक्ति का विकास –
बहु इन्द्रिय अनुभव से सीखी गई बातें लंबे समय तक स्मरण रहती हैं।
(iv) कठिन विषयों को सरल बनाना –
इस विधि से जटिल विषयों को भी सरल और स्पष्ट रूप में समझाया जा सकता है।
(v) सक्रिय सहभागिता –
विद्यार्थी शिक्षण प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है।
(vi) व्यक्तिगत भिन्नताओं का ध्यान –
यह विधि विभिन्न प्रकार के विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक होती है।
निष्कर्ष
इस प्रकार बहु इन्द्रिय अनुदेशन शिक्षण को अधिक प्रभावी, रोचक तथा विद्यार्थी-केंद्रित बनाता है। यह विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है तथा आधुनिक शिक्षण की एक उपयोगी पद्धति मानी जाती है।
प्रश्न 6. अभिक्रमित अनुदेशन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर –
भूमिका
अभिक्रमित अनुदेशन एक ऐसी शिक्षण विधि है जिसमें विषयवस्तु को छोटे-छोटे क्रमबद्ध चरणों में प्रस्तुत किया जाता है। इस विधि का उद्देश्य विद्यार्थियों को उनकी गति और क्षमता के अनुसार सीखने का अवसर प्रदान करना है। इसमें विद्यार्थी प्रत्येक चरण को समझने के बाद अगले चरण की ओर बढ़ता है। यह शिक्षण को अधिक सरल, वैज्ञानिक तथा प्रभावी बनाता है। आधुनिक शिक्षा में इसका विशेष महत्व है।
(i) क्रमबद्ध शिक्षण प्रक्रिया –
अभिक्रमित अनुदेशन में विषयवस्तु को छोटे-छोटे भागों में विभाजित कर क्रम से प्रस्तुत किया जाता है।
(ii) स्व-अधिगम को बढ़ावा –
इस विधि में विद्यार्थी अपनी गति से सीखता है, जिससे उसमें आत्मनिर्भरता विकसित होती है।
(iii) त्वरित प्रतिपुष्टि –
प्रत्येक चरण के बाद विद्यार्थी को तुरंत प्रतिक्रिया मिलती है, जिससे वह अपनी त्रुटियों में सुधार कर सकता है।
(iv) व्यक्तिगत भिन्नताओं का ध्यान –
यह विधि विद्यार्थियों की क्षमता, रुचि तथा आवश्यकता के अनुसार सीखने का अवसर प्रदान करती है।
(v) शिक्षण को प्रभावी बनाना –
अभिक्रमित अनुदेशन शिक्षण को सरल, स्पष्ट तथा स्थायी बनाता है।
(vi) आधुनिक तकनीक से संबंध –
कम्प्यूटर आधारित शिक्षा तथा ऑनलाइन शिक्षण में अभिक्रमित अनुदेशन का व्यापक उपयोग किया जाता है।
निष्कर्ष
अतः स्पष्ट है कि अभिक्रमित अनुदेशन एक प्रभावी एवं वैज्ञानिक शिक्षण विधि है। यह विद्यार्थियों को स्व-अधिगम, आत्मविश्वास तथा निरंतर अभ्यास के माध्यम से बेहतर शिक्षा प्राप्त करने में सहायता करता है।
अथवा
प्रश्न- शिक्षा में इण्टरनेट से आप क्या समझते हैं?
उत्तर –
भूमिका
इण्टरनेट आधुनिक युग की एक महत्वपूर्ण तकनीकी सुविधा है, जिसके माध्यम से विश्वभर की सूचनाएँ एवं सेवाएँ प्राप्त की जा सकती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में इण्टरनेट का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। इसके द्वारा विद्यार्थी तथा शिक्षक आसानी से ज्ञान, जानकारी तथा शैक्षिक सामग्री प्राप्त कर सकते हैं। इण्टरनेट ने शिक्षा को अधिक सरल, सुलभ तथा प्रभावी बना दिया है।
शिक्षा में इण्टरनेट की विशेषता
(i) ज्ञान का विशाल स्रोत –
इण्टरनेट के माध्यम से विद्यार्थी विभिन्न विषयों की जानकारी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।
(ii) ऑनलाइन शिक्षा की सुविधा –
इसके द्वारा ऑनलाइन कक्षाएँ, वेबिनार तथा ई-लर्निंग संभव हो पाई है।
(iii) अध्ययन सामग्री की उपलब्धता –
इण्टरनेट पर ई-पुस्तकें, नोट्स, वीडियो तथा शोध सामग्री आसानी से उपलब्ध होती हैं।
(iv) समय एवं श्रम की बचत –
विद्यार्थी घर बैठे आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, जिससे समय और श्रम की बचत होती है।
(v) शिक्षक एवं विद्यार्थी में संपर्क –
इण्टरनेट के माध्यम से शिक्षक और विद्यार्थी आपस में आसानी से संवाद कर सकते हैं।
(vi) आधुनिक शिक्षण में सहायक –
स्मार्ट कक्षा, डिजिटल शिक्षा तथा ऑनलाइन परीक्षाओं में इण्टरनेट का महत्वपूर्ण योगदान है।
निष्कर्ष
इस प्रकार इण्टरनेट शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी साधन बन गया है। इसने शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को सरल, आधुनिक तथा प्रभावी बनाकर शिक्षा की गुणवत्ता में महत्वपूर्ण सुधार किया है।
प्रश्न 07. भाषा-प्रयोगशाला के बारे में विस्तार से उल्लेख कीजिए।
उत्तर –
भूमिका
भाषा-प्रयोगशाला आधुनिक शिक्षण की एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है, जिसका उपयोग भाषा शिक्षण को प्रभावी, रोचक तथा व्यावहारिक बनाने के लिए किया जाता है। यह एक ऐसा कक्ष होता है जहाँ विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की सहायता से विद्यार्थियों को भाषा सुनने, बोलने, पढ़ने तथा लिखने का अभ्यास कराया जाता है। भाषा-प्रयोगशाला विशेष रूप से उच्चारण, श्रवण कौशल तथा संप्रेषण क्षमता के विकास में सहायक होती है। आधुनिक शिक्षा में विदेशी भाषाओं तथा मातृभाषा के शिक्षण में इसका महत्व निरंतर बढ़ रहा है।
(i) भाषा-प्रयोगशाला का अर्थ –
भाषा-प्रयोगशाला वह स्थान है जहाँ तकनीकी साधनों के माध्यम से भाषा का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें विद्यार्थी हेडफोन, माइक्रोफोन, कम्प्यूटर तथा ऑडियो-वीडियो सामग्री के माध्यम से भाषा सीखते हैं।
(ii) भाषा-प्रयोगशाला के उद्देश्य –
इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों में भाषा कौशलों का विकास करना है। इसके माध्यम से सही उच्चारण, स्पष्ट बोलना, सुनने की क्षमता तथा संप्रेषण कौशल का विकास किया जाता है। यह विद्यार्थियों में आत्मविश्वास भी उत्पन्न करती है।(iii) भाषा-प्रयोगशाला के उपकरण –
भाषा-प्रयोगशाला में कम्प्यूटर, हेडफोन, माइक्रोफोन, स्पीकर, रिकॉर्डर, प्रोजेक्टर तथा इंटरनेट जैसी सुविधाएँ होती हैं। इन उपकरणों के माध्यम से विद्यार्थी भाषा का अभ्यास करते हैं।
(iv) भाषा-प्रयोगशाला की विशेषताएँ –
यह शिक्षण को छात्र-केंद्रित बनाती है। विद्यार्थी अपनी गति से सीख सकते हैं। इसमें श्रवण एवं वाचन कौशल का प्रभावी विकास होता है। यह शिक्षण को अधिक रुचिकर और व्यावहारिक बनाती है।
(v) भाषा-प्रयोगशाला की उपयोगिता –
भाषा-प्रयोगशाला विद्यार्थियों को सही उच्चारण सीखने में सहायता करती है। इसके माध्यम से वे बार-बार सुनकर अभ्यास कर सकते हैं। यह विदेशी भाषाओं के शिक्षण में अत्यंत उपयोगी है। इसके द्वारा विद्यार्थी अपनी त्रुटियों को पहचानकर उनमें सुधार कर सकते हैं।
(vi) भाषा-प्रयोगशाला के लाभ –
यह विद्यार्थियों की संप्रेषण क्षमता को बढ़ाती है। इससे आत्मविश्वास का विकास होता है तथा भाषा सीखना सरल और प्रभावी बनता है। शिक्षक भी विद्यार्थियों की प्रगति का आसानी से मूल्यांकन कर सकते हैं।
(vii) भाषा-प्रयोगशाला की सीमाएँ –
इसके निर्माण और रखरखाव में अधिक खर्च होता है। सभी विद्यालयों में आवश्यक तकनीकी साधन उपलब्ध नहीं होते। तकनीकी ज्ञान के अभाव में इसका उचित उपयोग कठिन हो सकता है।
निष्कर्ष
अतः स्पष्ट है कि भाषा-प्रयोगशाला भाषा शिक्षण की एक आधुनिक एवं प्रभावी प्रणाली है। यह विद्यार्थियों में भाषा कौशल, उच्चारण तथा संप्रेषण क्षमता का विकास करती है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में इसका महत्व अत्यंत अधिक है और यह शिक्षण को अधिक व्यावहारिक, वैज्ञानिक तथा रुचिकर बनाती है।
प्रश्न 08. शैक्षिक तकनीकी की विशेषताओं को बताइए।
उत्तर-
भूमिका
शैक्षिक तकनीकी शिक्षा को प्रभावी, सरल तथा वैज्ञानिक बनाने की प्रक्रिया है। यह शिक्षण-अधिगम कार्य में आधुनिक तकनीकों, विधियों तथा साधनों का उपयोग करती है। शैक्षिक तकनीकी का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा प्रदान करना तथा शिक्षण प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाना है। वर्तमान समय में शिक्षा के क्षेत्र में इसका महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है।
शैक्षिक तकनीकी की विशेषता
(i) वैज्ञानिक आधार –
शैक्षिक तकनीकी का आधार वैज्ञानिक सिद्धांतों तथा मनोवैज्ञानिक नियमों पर आधारित होता है। यह शिक्षण को तर्कसंगत तथा प्रभावी बनाती है।
(ii) उद्देश्यपूर्ण शिक्षण –
इसमें शिक्षण उद्देश्यों को पहले से निर्धारित किया जाता है तथा उसी के अनुसार शिक्षण कार्य किया जाता है।
(iii) छात्र-केंद्रित प्रक्रिया –
शैक्षिक तकनीकी विद्यार्थियों की रुचि, आवश्यकता तथा क्षमता को ध्यान में रखकर शिक्षण प्रदान करती है।
(iv) शिक्षण को सरल बनाना –
चित्र, मॉडल, ऑडियो-वीडियो तथा कम्प्यूटर जैसे साधनों के उपयोग से कठिन विषयों को भी सरल बनाया जाता है।(v) समय एवं श्रम की बचत –
इसके माध्यम से कम समय में अधिक प्रभावी शिक्षण संभव हो पाता है।(vi) आधुनिक उपकरणों का उपयोग –
शैक्षिक तकनीकी में कम्प्यूटर, प्रोजेक्टर, स्मार्ट बोर्ड, इंटरनेट तथा ई-लर्निंग जैसे आधुनिक साधनों का प्रयोग किया जाता है।
(vii) अधिगम को स्थायी बनाना –
ऑडियो-वीडियो सामग्री तथा व्यावहारिक अनुभव के माध्यम से विद्यार्थियों का ज्ञान अधिक स्थायी बनता है।
(viii) मूल्यांकन में सहायक –
यह शिक्षण के साथ-साथ मूल्यांकन प्रक्रिया को भी अधिक सरल और प्रभावी बनाती है। ऑनलाइन परीक्षा तथा डिजिटल मूल्यांकन इसके उदाहरण हैं।
(ix) व्यक्तिगत भिन्नताओं का ध्यान –
शैक्षिक तकनीकी विद्यार्थियों की व्यक्तिगत क्षमताओं तथा सीखने की गति के अनुसार शिक्षण करने में सहायता करती है।
(x) शिक्षण को रुचिकर बनाना –
इसमें विभिन्न तकनीकी साधनों का प्रयोग होने से विद्यार्थी शिक्षण में अधिक रुचि लेते हैं।
निष्कर्ष
इस प्रकार शैक्षिक तकनीकी आधुनिक शिक्षा का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसकी विशेषताएँ शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, वैज्ञानिक तथा छात्र-केंद्रित बनाती हैं। यह शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाकर विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
प्रश्न 09. शिक्षण प्रतिमान से क्या आशय है? फ्लैण्डर के अन्तर्क्रिया विश्लेषण पर प्रकाश डालिए।
उत्तर –
भूमिका
शिक्षण प्रतिमान शिक्षण प्रक्रिया को व्यवस्थित, प्रभावी तथा उद्देश्यपूर्ण बनाने का एक वैज्ञानिक ढाँचा है। यह शिक्षक को यह निर्देश देता है कि किस प्रकार शिक्षण कार्य किया जाए ताकि विद्यार्थियों में अधिकतम अधिगम हो सके। शिक्षण प्रतिमान शिक्षण की योजना, शिक्षण व्यवहार तथा मूल्यांकन को व्यवस्थित रूप प्रदान करता है। आधुनिक शिक्षा में विभिन्न शिक्षण प्रतिमानों का उपयोग विद्यार्थियों की आवश्यकताओं तथा परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है। इन्हीं प्रतिमानों में फ्लैण्डर का अन्तर्क्रिया विश्लेषण एक महत्वपूर्ण प्रतिमान माना जाता है।
(i) शिक्षण प्रतिमान का अर्थ
शिक्षण प्रतिमान वह रूपरेखा है जिसके आधार पर शिक्षक शिक्षण प्रक्रिया को संचालित करता है। इसमें शिक्षण उद्देश्यों, शिक्षण विधियों, शिक्षण सामग्री तथा मूल्यांकन को योजनाबद्ध ढंग से संगठित किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य शिक्षण को अधिक प्रभावी और छात्र-केंद्रित बनाना है।
(ii) फ्लैण्डर का अन्तर्क्रिया विश्लेषण
फ्लैण्डर ने कक्षा शिक्षण में शिक्षक एवं विद्यार्थियों के बीच होने वाली मौखिक क्रियाओं का अध्ययन करने के लिए अन्तर्क्रिया विश्लेषण प्रणाली विकसित की। इसे “फ्लैण्डर अन्तर्क्रिया विश्लेषण प्रणाली” कहा जाता है। इसका उद्देश्य कक्षा में शिक्षक तथा विद्यार्थियों के व्यवहार का विश्लेषण करना है।
(iii) फ्लैण्डर प्रणाली की श्रेणियाँ
फ्लैण्डर ने कक्षा व्यवहार को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया—
(क) शिक्षक वार्ता –
इसमें शिक्षक द्वारा किया गया मौखिक व्यवहार शामिल होता है। जैसे— प्रश्न पूछना, व्याख्या करना, निर्देश देना तथा विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करना।
(ख) विद्यार्थी वार्ता –
इसमें विद्यार्थियों द्वारा दिए गए उत्तर, प्रश्न तथा विचार शामिल होते हैं।(ग) मौन या भ्रम –
जब कक्षा में शांति हो या भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो, उसे इस श्रेणी में रखा जाता है।
(iv) फ्लैण्डर प्रणाली की विशेषताएँ
यह कक्षा व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन करती है।
शिक्षक एवं विद्यार्थी की सहभागिता का विश्लेषण करती है।
शिक्षण को अधिक प्रभावी बनाने में सहायता करती है।
शिक्षक को अपने शिक्षण व्यवहार में सुधार करने का अवसर देती है।
(v) फ्लैण्डर प्रणाली की उपयोगिता-
यह प्रणाली शिक्षक को यह समझने में सहायता करती है कि कक्षा में विद्यार्थियों की सहभागिता कितनी है। इसके माध्यम से शिक्षक अपनी शिक्षण शैली में सुधार कर सकता है। यह शिक्षण को अधिक छात्र-केंद्रित तथा प्रभावी बनाती है। शिक्षक प्रशिक्षण में भी इसका व्यापक उपयोग किया जाता है।
(vi) सीमाएँ
फ्लैण्डर प्रणाली केवल मौखिक व्यवहार का अध्ययन करती है। इसमें भावनात्मक एवं शारीरिक व्यवहार का समुचित अध्ययन नहीं हो पाता। इसके प्रयोग के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।
निष्कर्ष
अतः स्पष्ट है कि शिक्षण प्रतिमान शिक्षण प्रक्रिया को व्यवस्थित एवं प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फ्लैण्डर का अन्तर्क्रिया विश्लेषण कक्षा शिक्षण के अध्ययन की एक वैज्ञानिक एवं उपयोगी प्रणाली है, जो शिक्षक एवं विद्यार्थियों के व्यवहार का विश्लेषण कर शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार लाती है।
प्रश्न 10. सूक्ष्म शिक्षण से आप क्या समझते हैं? इसकी विशेषताएँ बताइये।
उत्तर –
भूमिका
सूक्ष्म शिक्षण शिक्षक प्रशिक्षण की एक आधुनिक एवं प्रभावी तकनीक है। इसमें शिक्षक सीमित समय, सीमित विषयवस्तु तथा कम विद्यार्थियों के सामने किसी विशेष शिक्षण कौशल का अभ्यास करता है। सूक्ष्म शिक्षण का उद्देश्य शिक्षक की शिक्षण क्षमता तथा कौशलों का विकास करना है। यह शिक्षकों को वास्तविक कक्षा शिक्षण से पहले अभ्यास करने का अवसर प्रदान करता है। आधुनिक शिक्षक शिक्षा में इसका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
(i) सूक्ष्म शिक्षण का अर्थ
सूक्ष्म शिक्षण ऐसी प्रशिक्षण प्रक्रिया है जिसमें शिक्षण को छोटे-छोटे भागों में विभाजित कर अभ्यास कराया जाता है। इसमें शिक्षक एक समय में केवल एक कौशल, जैसे प्रश्न पूछना, उदाहरण देना या पुनर्बलन, का अभ्यास करता है।
(ii) सीमित समय एवं विद्यार्थी
सूक्ष्म शिक्षण में सामान्यतः 5 से 10 मिनट का शिक्षण कराया जाता है तथा विद्यार्थियों की संख्या भी सीमित रखी जाती है। इससे शिक्षक आसानी से अपने कौशल का अभ्यास कर सकता है।
(iii) एक कौशल पर ध्यान
इस तकनीक में एक समय में केवल एक शिक्षण कौशल का अभ्यास किया जाता है। इससे शिक्षक उस कौशल में दक्षता प्राप्त करता है।
(iv) प्रतिपुष्टि की व्यवस्था
शिक्षण के बाद शिक्षक को तुरंत प्रतिक्रिया दी जाती है। इससे वह अपनी त्रुटियों को पहचानकर उनमें सुधार कर सकता है।
(v) पुनः शिक्षण की सुविधा
सूक्ष्म शिक्षण में शिक्षक अपनी कमियों को सुधारने के बाद पुनः शिक्षण करता है। इससे उसकी शिक्षण क्षमता में वृद्धि होती है।
(vi) आत्मविश्वास का विकास
लगातार अभ्यास तथा सुधार के कारण शिक्षक का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह प्रभावी ढंग से शिक्षण करने लगता है।
(vii) छात्र-केंद्रित प्रक्रिया
सूक्ष्म शिक्षण विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता को बढ़ावा देता है तथा शिक्षण को अधिक प्रभावी बनाता है।
(viii) वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक विधियह शिक्षक प्रशिक्षण की वैज्ञानिक तथा व्यावहारिक पद्धति है, जिसमें शिक्षण व्यवहार का विश्लेषण कर सुधार किया जाता है।
(ix) शिक्षण कौशलों का विकाससूक्ष्म शिक्षण के माध्यम से शिक्षक में प्रश्न पूछने, पुनर्बलन देने, ब्लैकबोर्ड प्रयोग तथा व्याख्या कौशल का विकास होता है।
(x) शिक्षा की गुणवत्ता में सुधारयह तकनीक शिक्षकों को कुशल एवं प्रभावी बनाकर शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाती है।
निष्कर्ष
इस प्रकार सूक्ष्म शिक्षण शिक्षक प्रशिक्षण की एक महत्वपूर्ण एवं उपयोगी तकनीक है। यह शिक्षक के शिक्षण कौशल, आत्मविश्वास तथा कार्यक्षमता का विकास करती है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में प्रभावी शिक्षक तैयार करने के लिए सूक्ष्म शिक्षण का विशेष महत्व है।
प्रश्न 11. शैक्षिक उद्देश्य और शिक्षण उद्देश्यों में क्या अन्तर है? शैक्षिक उद्देश्यों के वर्गीकरण की संक्षिप्त विवेचना कीजिए।
उत्तर –
भूमिका
शिक्षा एक उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है, जिसका लक्ष्य व्यक्ति के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करना होता है। शिक्षा के क्षेत्र में शैक्षिक उद्देश्य तथा शिक्षण उद्देश्य दोनों का महत्वपूर्ण स्थान है। शैक्षिक उद्देश्य व्यापक एवं दीर्घकालीन होते हैं, जबकि शिक्षण उद्देश्य सीमित एवं तात्कालिक होते हैं। शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए उद्देश्यों का स्पष्ट निर्धारण आवश्यक होता है। विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों ने शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण भी किया है, जिससे शिक्षण कार्य अधिक व्यवस्थित एवं परिणामकारी बनता है।
(i) शैक्षिक उद्देश्य का अर्थ
शैक्षिक उद्देश्य वे व्यापक लक्ष्य होते हैं जिन्हें शिक्षा द्वारा प्राप्त किया जाना अपेक्षित होता है। इनका संबंध व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक तथा बौद्धिक विकास से होता है।
(ii) शिक्षण उद्देश्य का अर्थ
शिक्षण उद्देश्य वे विशिष्ट लक्ष्य होते हैं जिन्हें शिक्षक किसी पाठ या विषय को पढ़ाने के बाद विद्यार्थियों में विकसित करना चाहता है। ये उद्देश्य अल्पकालीन तथा व्यवहार परिवर्तन पर आधारित होते हैं।
शैक्षिक उद्देश्य एवं शिक्षण उद्देश्य में अन्तर
(i) क्षेत्र की दृष्टि सेशैक्षिक उद्देश्य व्यापक होते हैं, जबकि शिक्षण उद्देश्य सीमित होते हैं।
(ii) समय की दृष्टि सेशैक्षिक उद्देश्य दीर्घकालीन होते हैं, जबकि शिक्षण उद्देश्य तात्कालिक होते हैं।
(iii) उद्देश्य की प्रकृतिशैक्षिक उद्देश्य व्यक्ति के सर्वांगीण विकास से संबंधित होते हैं, जबकि शिक्षण उद्देश्य किसी विशेष पाठ या विषय के अधिगम से संबंधित होते हैं।
(iv) निर्माण का आधारशैक्षिक उद्देश्य समाज एवं राष्ट्र की आवश्यकताओं पर आधारित होते हैं, जबकि शिक्षण उद्देश्य पाठ्यक्रम एवं विषयवस्तु पर आधारित होते हैं।
(v) कार्यक्षेत्रशैक्षिक उद्देश्य सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित करते हैं, जबकि शिक्षण उद्देश्य केवल कक्षा शिक्षण तक सीमित रहते हैं।
शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण
(i) ज्ञानात्मक क्षेत्र (Cognitive Domain)यह क्षेत्र बौद्धिक विकास से संबंधित है। इसमें ज्ञान, समझ, अनुप्रयोग, विश्लेषण तथा मूल्यांकन जैसी क्षमताओं का विकास किया जाता है।
(ii) भावात्मक क्षेत्र (Affective Domain)इस क्षेत्र का संबंध भावनाओं, रुचियों, मूल्यों तथा दृष्टिकोणों से होता है। इसमें नैतिकता, अनुशासन तथा सामाजिक गुणों का विकास किया जाता है।
(iii) क्रियात्मक क्षेत्र (Psychomotor Domain)यह क्षेत्र शारीरिक कौशल एवं क्रियात्मक दक्षताओं के विकास से संबंधित है। इसमें लेखन, चित्रकला, खेल तथा प्रयोगात्मक कार्य शामिल होते हैं।
शैक्षिक उद्देश्यों का महत्व
(i) शिक्षण को दिशा प्रदान करना –उद्देश्य शिक्षण प्रक्रिया को सही दिशा प्रदान करते हैं।
(ii) मूल्यांकन में सहायता –इनके आधार पर विद्यार्थियों की प्रगति का मूल्यांकन किया जाता है।
(iii) शिक्षण को प्रभावी बनाना –स्पष्ट उद्देश्य शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली बनाते हैं।
निष्कर्ष
अतः स्पष्ट है कि शैक्षिक उद्देश्य एवं शिक्षण उद्देश्य शिक्षा प्रक्रिया के महत्वपूर्ण अंग हैं। दोनों का कार्यक्षेत्र एवं प्रकृति अलग-अलग होते हुए भी वे एक-दूसरे के पूरक हैं। शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण शिक्षण को वैज्ञानिक, व्यवस्थित तथा उद्देश्यपूर्ण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
VBSPU B.Ed 2nd SEMESTER ALL SUBJECT NOTES
| Paper Code | Notes Link |
|---|---|
| 201 | Knowledge & Curriculum >> |
| 202 | Educational Technology & ICT >> |
| 203 | Pedagogy-I (Social Science) >> |
| 204 | Pedagogy-II (Hindi) >> |
VBSPU B.Ed 2nd SEMESTER SUBJECT NAME
| Paper Code | Paper Name | Marks |
|---|---|---|
| 201 | Knowledge & Curriculum | 90 |
| 202 | Educational Technology & ICT | 90 |
| 203 | Pedagogy-I (Social Science) | 90 |
| 204 | Pedagogy-II (Hindi) | 90 |
VBSPU B.Ed. 2nd SEMESTER EDUCATIONAL TECHNOLOGY & ICT SYLLABUS WITH SOLUTION
Unit-I
Educational Technology:
• Meaning and Concept.
• Scope and Significance.
Training Strategies:
• Demonstration, Programmed Learning, Development of programmed instruction materials linear and branching, Interaction Analysis, Simulation and Micro Teaching.
Unit-II
Concept of Teaching:
• Meaning, Definition and Characteristics.
• Levels of Teachings.
• Stages of Teachings.
Teaching Learning materials cone of experience (Edgerdale)
• Multi Sensory Instruction-Advantages.
• Teaching Methods.
• Teaching Strategies and techniques.
• Concept, Types, Various strategies for developing Thinking.
Unit-III
Innovations in Teaching-Learning:
• System Approach.
• Personalized Instructional System.
• Co-operative learning.
• Language Laboratory.
Models of Teaching:
• Concept.
• Fundamental Elements of Models of teaching.
• Types of Teaching Model.
Glaser’s basic Teaching Model, Inquiry Training Model, Mastery Learning Model, Concept Attainment Model.
Unit-IV
Information and Communication Technology:
• Meaning and Concept.
• Models of Communication, Classroom Communication.
• Concept of Tele-communication and Satellite-communication- Teleconferencing, Video Conferencing.
Introduction of Computers:
• Input and Output devices.
• MS Office-2003 onwards (Word, Excel, MS Access, PowerPoint, Paint).
• Computer care – Viruses, Security and maintenance.
• Uses and Applications of computer.
Networking :
• Internet and its Working – www, Educational website, E-mail
• E-learning and Virtual Classrooms
• Multimedia-Meaning, Concept, Required Software and use in education.

