VBSPU B.Ed. 2nd SEMESTER KNOWLEDGE & CURRICULUM

KNOWLEDGE & CURRICULUM SYLLABUS PREVIOUS YEAR QUESTION WITH SOLUTION

विषय Knowledge & Curriculum Notes
पेपर 201
विश्वविद्यालय वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल   विश्वविद्यालय  बी.एड द्वितीय सेमेस्टर
सेमेस्टर द्वितीय सेमेस्टर
lnfo वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल  विश्वविद्यालय  बी.एड. द्वितीय सेमेस्टर  के पेपर -201 ज्ञान एवं पाठ्यक्रम (Knowledge & Curriculum) दिया गया है |



VBSPU B.Ed. 2nd SEMESTER KNOWLEDGE & CURRICULUM SYLLABUS

प्रथम प्रश्न-पत्र (201)
ज्ञान एवं पाठ्यक्रम
Knowledge and Curriculum Syllabus

Unit-I
Knowledge and Information: Difference and similarity between the two.
• Levels of Knowledge: The taxonomic perspectives and the Indian view of knowledge.
• Relating knowledge to various context of education – formal, non-formal and informal.

Unit-II
Curriculum Determinants and Considerations:
(1) Socio cultural context of students-multi-cultural and multi lingual aspect.
(ii) Learner characteristics.
(iii) Teachers’ experiences and concerns.
(iv) Critical Issues : Environmental concerns, gender differences, inclusiveness, value concerns and issues, social sensitivity.

Unit-III
Curriculum Development

• Understanding different approaches to curriculum development: Subject- centred; environmentalist (incorporating local concerns); behaviourist; competency-based (including ‘minimum levels of learning’); learner- centred and constructivist.

• Process of curriculum making:
(i) Formulating aims and objectives (based on overall curricular aims and syllabus)
(ii) Criteria for selecting knowledge and representing knowledge in the form of thematic questions in different subjects.
(iii) Organising fundamental concepts and themes vertically across levels and integrating themes within (and across) different subjects.

Unit-IV
School: The site of curriculum Engagement:
Teachers’ role and support in:
•Transacting curriculum’, ‘developing curriculum’, ‘researching curriculum’
•Space for teacher as a critical pedagogue
•Role of external agencies in providing curriculum and pedagogic supports to teachers within schools – local, regional, national.




 

VBSPU B.Ed. 2nd SEMESTER KNOWLEDGE & CURRICULUM PREVIOUS YEAR QUESTION WITH ANSWER

समय: 3 घण्टे ]
बी.एड. प्रथम वर्ष (द्वितीय सेमेस्टर)
प्रथम प्रश्न-पत्र (201)
ज्ञान एवं पाठ्यक्रम
पूर्णांक : 90

खण्ड ‘अ’: अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (निर्धारित अंक 10 x 2 = 20 )

प्रश्न 1. इस प्रश्न के सभी भागों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक भाग का उत्तर लगभग 50 शब्दों में दीजिए।
(i) कोठारी आयोग का मूल्यांकन कीजिए।
(ii) शिक्षा का संकुचित अर्थ बताइए।
(iii)शिक्षा के अभिकरणों की तालिका बनाइए।
(iv)अनुप्रयोग के प्रकार बताइए।
(v) मूल्य क्या है? इसके प्रकार लिखिए।
(vi) पाठ्यक्रम में लैंगिक भेद-भाव ।
(vii) शिक्षण अधिगम प्रदान करने की विधि बताइए।
(viii) व्यवहारवादी उपागम क्या है?
(ix) अनुभव केंद्रित पाठ्यक्रम।
(x) बाल केन्द्रित शिक्षा क्या है ?

खण्ड ‘ब’:लघु उत्तरीय प्रश्न (निर्धारित अंक 5 x 8 = 40 )
नोट :सभी प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 200 शब्दों में दीजिए।

प्रश्न 2.भावात्मक पक्ष के उद्देश्य एवं प्रकार बताइए।
अथवा अवबोध से आप क्या समझते हैं?
प्रश्न 3. शिक्षा का शाब्दिक अर्थ बताइए ।
अथवा औपचारिक शिक्षा की विशेषताएँ बताइए।
प्रश्न 4. पाठ्यक्रम के सामाजिक निर्धारक तत्त्वों को बताइए।

अथवा सामाजिक आधार पर पाठ्यक्रम का स्वरूप बताइए ।
प्रश्न 5. विषय-केन्द्रित पाठ्यक्रम की व्याख्या कीजिए।

अथवा दक्षता आधारित उपागम को बताइए।
प्रश्न 6. शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण के मापदण्ड का वर्णन कीजिए।
अथवा एक अच्छे पाठ्यक्रम की क्या विशेषताएँ होनी चाहिए?

खण्ड ‘स’ : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (निर्धारित अंक 2 × 15 = 30 )
नोट : किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 500 शब्दों में दीजिए।

प्रश्न 7.ज्ञान से आप क्या समझते हैं? इसके प्राप्ति के तरीके का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
प्रश्न 8. अधिगमकर्त्ता की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
प्रश्न 9. पाठ्यक्रम के निर्माण में प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए
प्रश्न 10. पाठ्यक्रम के सिद्धान्त में पाठ्यक्रम का एक उत्पाद के रूप में व्याख्या कीजिए।
प्रश्न 11. पाठ्यक्रम निर्माण में ज्ञान के चयन एवं प्रस्तुतीकरण का मापदण्ड बताइए।




प्रश्न-(i) कोठारी आयोग का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर-
कोठारी आयोग (1964-66) भारतीय शिक्षा व्यवस्था के सुधार हेतु गठित एक महत्वपूर्ण आयोग था। इस आयोग ने शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का प्रमुख साधन माना। आयोग ने 10+2+3 शिक्षा प्रणाली, समान शिक्षा अवसर, विज्ञान शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा पर विशेष बल दिया। इसने शिक्षा में गुणवत्ता एवं राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने की सिफारिश की। आयोग की सिफारिशों के आधार पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति का निर्माण हुआ। यद्यपि इसकी अनेक सिफारिशें लागू हुईं, फिर भी शिक्षा में समानता एवं संसाधनों की कमी जैसी समस्याएँ पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हो सकीं।


प्रश्न-(ii) शिक्षा का संकुचित अर्थ बताइए।
उत्तर-
शिक्षा का संकुचित अर्थ उस औपचारिक शिक्षा से है जो विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयों में योजनाबद्ध रूप से प्रदान की जाती है। इसमें निश्चित पाठ्यक्रम, परीक्षा प्रणाली, समय-सारणी तथा शिक्षण विधियों का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार की शिक्षा का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को ज्ञान, अनुशासन एवं बौद्धिक विकास प्रदान करना होता है। संकुचित अर्थ में शिक्षा शिक्षक एवं विद्यालय तक सीमित रहती है। इसमें पुस्तक आधारित ज्ञान पर अधिक बल दिया जाता है। यह शिक्षा समाज के नियमों, आदर्शों तथा संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य भी करती है।


प्रश्न-(iii) शिक्षा के अभिकरणों की तालिका बनाइए।
उत्तर-

औपचारिक अभिकरण अनौपचारिक अभिकरण
विद्यालय परिवार
महाविद्यालय समाज
विश्वविद्यालय मित्र समूह
प्रशिक्षण संस्थान धार्मिक संस्थाएँ
पुस्तकालय समाचार पत्र एवं मीडिया

शिक्षा के अभिकरण वे साधन हैं जिनके माध्यम से व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करता है। औपचारिक अभिकरण योजनाबद्ध शिक्षा प्रदान करते हैं, जबकि अनौपचारिक अभिकरण अनुभव एवं सामाजिक वातावरण द्वारा शिक्षा देते हैं। ये सभी अभिकरण बालक के व्यक्तित्व, चरित्र तथा सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


प्रश्न-(iv) अनुप्रयोग के प्रकार बताइए।
उत्तर-
अनुप्रयोग का अर्थ है प्राप्त ज्ञान का व्यावहारिक जीवन में उपयोग करना। इसके मुख्यतः दो प्रकार होते हैं— सैद्धांतिक अनुप्रयोग एवं व्यावहारिक अनुप्रयोग। सैद्धांतिक अनुप्रयोग में सिद्धांतों एवं नियमों का अध्ययन किया जाता है, जबकि व्यावहारिक अनुप्रयोग में इन सिद्धांतों का वास्तविक जीवन में प्रयोग किया जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में अनुप्रयोग का विशेष महत्व है क्योंकि इससे विद्यार्थी केवल ज्ञान प्राप्त नहीं करता, बल्कि उसे व्यवहार में उपयोग करना भी सीखता है। अनुप्रयोग आधारित शिक्षा विद्यार्थियों की समस्या समाधान क्षमता, रचनात्मकता तथा कार्यकुशलता का विकास करती है।


प्रश्न-(v) मूल्य क्या है? इसके प्रकार लिखिए।
उत्तर-
मूल्य वे आदर्श, मान्यताएँ एवं सिद्धांत हैं जो व्यक्ति के व्यवहार को सही दिशा प्रदान करते हैं। ये समाज में उचित-अनुचित तथा अच्छे-बुरे का ज्ञान कराते हैं। मूल्य व्यक्ति के चरित्र निर्माण तथा सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मुख्यतः मूल्य के प्रकार हैं— नैतिक मूल्य, सामाजिक मूल्य, धार्मिक मूल्य, सांस्कृतिक मूल्य, आर्थिक मूल्य तथा राष्ट्रीय मूल्य। नैतिक मूल्य सत्य एवं ईमानदारी सिखाते हैं, जबकि सामाजिक मूल्य सहयोग एवं सहानुभूति की भावना विकसित करते हैं। शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों में मूल्यों का विकास कर उन्हें आदर्श नागरिक बनाया जाता है।


प्रश्न-(vi) पाठ्यक्रम में लैंगिक भेद-भाव।
उत्तर-
जब पाठ्यक्रम में लड़के एवं लड़कियों के प्रति असमान दृष्टिकोण अपनाया जाता है, तो उसे लैंगिक भेद-भाव कहा जाता है। इसमें पुस्तकों, चित्रों, उदाहरणों तथा गतिविधियों में एक लिंग को अधिक महत्व दिया जाता है। इससे समाज में असमानता एवं रूढ़िवादी सोच को बढ़ावा मिलता है। कई बार पाठ्यपुस्तकों में महिलाओं को केवल घरेलू कार्यों तक सीमित दिखाया जाता है। शिक्षा में लैंगिक समानता अत्यंत आवश्यक है। पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो लड़के एवं लड़कियों दोनों को समान अवसर एवं सम्मान प्रदान करे तथा समान अधिकारों की भावना विकसित करे।


प्रश्न-(vii) शिक्षण अधिगम प्रदान करने की विधि बताइए।
उत्तर-
शिक्षण-अधिगम प्रदान करने की अनेक विधियाँ हैं जिनके माध्यम से शिक्षक विद्यार्थियों को प्रभावी ढंग से ज्ञान प्रदान करता है। प्रमुख विधियाँ हैं— व्याख्यान विधि, प्रश्नोत्तर विधि, प्रदर्शन विधि, परियोजना विधि तथा गतिविधि आधारित विधि। व्याख्यान विधि में शिक्षक विषय की व्याख्या करता है, जबकि प्रश्नोत्तर विधि में विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी होती है। परियोजना एवं गतिविधि आधारित विधियों में विद्यार्थी करके सीखते हैं। इन विधियों के प्रयोग से विद्यार्थियों की रुचि, रचनात्मकता एवं समझ का विकास होता है तथा शिक्षण प्रक्रिया अधिक प्रभावशाली बनती है।


प्रश्न-(viii) व्यवहारवादी उपागम क्या है?
उत्तर-
व्यवहारवादी उपागम वह शिक्षण दृष्टिकोण है जिसमें सीखने को व्यवहार में परिवर्तन के रूप में देखा जाता है। इस उपागम के अनुसार व्यक्ति अभ्यास, पुनर्बलन तथा अनुभव द्वारा सीखता है। इसमें पुरस्कार एवं दंड का विशेष महत्व होता है। स्किनर, वॉटसन तथा पावलॉव इसके प्रमुख समर्थक थे। व्यवहारवादी उपागम में प्रत्यक्ष व्यवहार पर अधिक बल दिया जाता है। शिक्षक विद्यार्थियों को उचित प्रतिक्रिया देकर वांछित व्यवहार विकसित करता है। यह उपागम अनुशासन, अभ्यास तथा कौशल विकास में सहायक माना जाता है और शिक्षण प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाता है।


प्रश्न-(ix) अनुभव केंद्रित पाठ्यक्रम।
उत्तर-
अनुभव केंद्रित पाठ्यक्रम वह पाठ्यक्रम है जिसमें विद्यार्थियों के अनुभवों एवं गतिविधियों को शिक्षा का आधार बनाया जाता है। इसमें “करके सीखना” सिद्धांत पर विशेष बल दिया जाता है। विद्यार्थी अपने अनुभवों, पर्यवेक्षण तथा सहभागिता द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है। यह पाठ्यक्रम बालक की रुचि, आवश्यकता एवं सामाजिक परिवेश के अनुसार तैयार किया जाता है। अनुभव केंद्रित पाठ्यक्रम से विद्यार्थियों में रचनात्मकता, समस्या समाधान क्षमता तथा आत्मविश्वास का विकास होता है। यह शिक्षा को अधिक व्यावहारिक एवं उपयोगी बनाता है तथा विद्यार्थियों को वास्तविक जीवन की परिस्थितियों के लिए तैयार करता है।


प्रश्न-(x) बाल केन्द्रित शिक्षा क्या है ?
उत्तर-
बाल केन्द्रित शिक्षा वह शिक्षा है जिसमें बालक को शिक्षण प्रक्रिया का केंद्र माना जाता है। इस शिक्षा में बालक की रुचि, आवश्यकता, क्षमता तथा अनुभव के अनुसार शिक्षण कार्य किया जाता है। शिक्षक मार्गदर्शक एवं सहायक की भूमिका निभाता है। इसमें विद्यार्थियों को स्वतंत्र रूप से सीखने तथा अपनी प्रतिभा विकसित करने के अवसर दिए जाते हैं। बाल केन्द्रित शिक्षा बालक के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं भावनात्मक विकास पर बल देती है। यह शिक्षा विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, रचनात्मकता एवं सक्रिय सहभागिता को बढ़ावा देती है तथा अधिगम को अधिक रुचिकर बनाती है।




प्रश्न-2. भावात्मक पक्ष के उद्देश्य एवं प्रकार बताइए।

उत्तर-

भूमिका

शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का साधन नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व के विकास का माध्यम भी है। शिक्षा के विभिन्न पक्षों में भावात्मक पक्ष का विशेष महत्व है। भावात्मक पक्ष बालक की भावनाओं, रुचियों, अभिवृत्तियों, मूल्यों तथा व्यवहार से संबंधित होता है। यह विद्यार्थियों में नैतिकता, संवेदनशीलता, सहयोग तथा सामाजिक गुणों का विकास करता है। भावात्मक विकास के बिना शिक्षा अधूरी मानी जाती है।

भावात्मक पक्ष का मुख्य उद्देश्य

भावात्मक पक्ष का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों के भावनात्मक एवं नैतिक विकास को सुनिश्चित करना है। इसके माध्यम से विद्यार्थियों में प्रेम, दया, सहानुभूति, अनुशासन, सहयोग एवं देशभक्ति की भावना विकसित की जाती है। यह बालकों में अच्छे संस्कार उत्पन्न करता है तथा उन्हें समाज के प्रति जिम्मेदार बनाता है।

भावात्मक पक्ष के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं
(i) नैतिक मूल्यों का विकास करना।
(ii) सामाजिक समायोजन की भावना उत्पन्न करना।
(iii) सकारात्मक अभिवृत्ति विकसित करना।
(iv) आत्मविश्वास एवं सहिष्णुता बढ़ाना।
(v) मानवीय गुणों का विकास करना।

भावात्मक पक्ष के प्रमुख प्रकार इस प्रकार हैं—
(i) रुचि (Interest)
(ii) अभिवृत्ति (Attitude)
(iii) मूल्य (Values)
(iv) भावनाएँ (Emotions)
(v) संवेदनशीलता एवं प्रशंसा (Sensitivity and Appreciation)

विद्यालय, परिवार तथा समाज भावात्मक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शिक्षक अपने व्यवहार एवं शिक्षण विधियों द्वारा विद्यार्थियों में अच्छे गुणों का विकास करता है।

निष्कर्ष

अतः स्पष्ट है कि भावात्मक पक्ष शिक्षा का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। यह विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण, नैतिक विकास तथा सामाजिक समायोजन में सहायक होता है। भावात्मक विकास के माध्यम से ही बालक एक आदर्श, जिम्मेदार एवं संवेदनशील नागरिक बन सकता है। इसलिए शिक्षा में भावात्मक पक्ष को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए।


अथवा 

प्रश्न. अवबोध से आप क्या समझते हैं?

उत्तर-

भूमिका

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में समझ विकसित करना भी है। जब विद्यार्थी किसी विषय के अर्थ, उद्देश्य तथा उपयोग को समझ लेता है, तब उसे अवबोध कहा जाता है। अवबोध शिक्षा प्रक्रिया का महत्वपूर्ण भाग है, क्योंकि बिना समझ के ज्ञान स्थायी एवं उपयोगी नहीं बन सकता। यह विद्यार्थियों की सोचने-समझने की क्षमता का विकास करता है।

अवबोध से आप क्या समझते हैं

अवबोध का अर्थ किसी तथ्य, विचार या विषय को सही रूप में समझना एवं उसके अर्थ को ग्रहण करना है। यह केवल रटने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि ज्ञान को समझकर उसका उचित उपयोग करने की क्षमता है। उदाहरण के लिए, यदि विद्यार्थी केवल कविता याद कर लेता है तो यह ज्ञान है, लेकिन जब वह कविता का भावार्थ एवं संदेश समझ जाता है, तब उसे अवबोध कहा जाएगा।

अवबोध विद्यार्थियों में विश्लेषण, तुलना तथा तर्क करने की क्षमता विकसित करता है। इसके माध्यम से विद्यार्थी विषय की गहराई को समझ पाता है।

अवबोध के प्रमुख तत्व हैं—
(i) अर्थ ग्रहण करना
(ii) व्याख्या करना
(iii) उदाहरण देना
(iv) ज्ञान का उपयोग करना

अवबोध विकसित करने के लिए शिक्षक को सरल भाषा, उदाहरण, चित्र, गतिविधि एवं प्रश्नोत्तर विधि का प्रयोग करना चाहिए। इससे विद्यार्थी विषय को अधिक आसानी से समझ पाते हैं।

निष्कर्ष

इस प्रकार अवबोध शिक्षा का आधार माना जाता है। यह विद्यार्थियों को केवल जानकारी प्राप्त करने तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें समझने, सोचने एवं वास्तविक जीवन में ज्ञान का उपयोग करने योग्य बनाता है। इसलिए शिक्षण प्रक्रिया में अवबोध का विशेष महत्व है।

प्रश्न-3. शिक्षा का शाब्दिक अर्थ बताइए।

उत्तर-

भूमिका

शिक्षा मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह व्यक्ति के ज्ञान, व्यवहार, विचार तथा व्यक्तित्व का विकास करती है। शिक्षा के माध्यम से मनुष्य सही और गलत का ज्ञान प्राप्त करता है तथा समाज में रहने योग्य बनता है। शिक्षा केवल विद्यालय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया है। इसलिए शिक्षा के वास्तविक अर्थ को समझना आवश्यक है।

शिक्षा का शाब्दिक अर्थ

‘शिक्षा’ शब्द संस्कृत भाषा की “शिक्ष” धातु से बना है, जिसका अर्थ है— सीखना और सिखाना। अंग्रेजी भाषा का “Education” शब्द लैटिन भाषा के “Educare”, “Educere” तथा “Educatum” शब्दों से बना है। “Educare” का अर्थ पालन-पोषण करना, “Educere” का अर्थ भीतर की शक्तियों को बाहर लाना तथा “Educatum” का अर्थ प्रशिक्षण देना है।

शिक्षा का शाब्दिक अर्थ व्यक्ति की जन्मजात शक्तियों का विकास करना तथा उसे जीवन के योग्य बनाना है। शिक्षा मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक एवं भावनात्मक विकास में सहायता करती है। यह व्यक्ति को ज्ञान, कौशल एवं संस्कार प्रदान करती है।

विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षा को अलग-अलग रूप में परिभाषित किया है। महात्मा गांधी के अनुसार शिक्षा वह प्रक्रिया है जो बालक के शरीर, मन एवं आत्मा का सर्वांगीण विकास करती है।

निष्कर्ष

अतः शिक्षा का शाब्दिक अर्थ केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति की आंतरिक शक्तियों का विकास करना है। शिक्षा मनुष्य को सभ्य, संस्कारी एवं जिम्मेदार नागरिक बनाती है तथा उसके सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

अथवा 

प्रश्न-. औपचारिक शिक्षा की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर-

भूमिका

शिक्षा के विभिन्न रूपों में औपचारिक शिक्षा का विशेष महत्व है। यह शिक्षा विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में योजनाबद्ध ढंग से प्रदान की जाती है। औपचारिक शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को व्यवस्थित ज्ञान, कौशल तथा अनुशासन प्रदान करना होता है। यह समाज एवं राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

औपचारिक शिक्षा की विशेषताएँ

औपचारिक शिक्षा की अनेक विशेषताएँ होती हैं, जो इसे अन्य प्रकार की शिक्षा से अलग बनाती हैं। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

(i) निश्चित पाठ्यक्रम – औपचारिक शिक्षा में पूर्व निर्धारित पाठ्यक्रम होता है।

(ii) निश्चित समय एवं स्थान – यह शिक्षा निश्चित समय-सारणी एवं विद्यालयों में दी जाती है।

(iii) प्रशिक्षित शिक्षक – इसमें शिक्षण कार्य प्रशिक्षित एवं योग्य शिक्षकों द्वारा कराया जाता है।

(iv) अनुशासन – औपचारिक शिक्षा में नियम एवं अनुशासन का विशेष महत्व होता है।

(v) परीक्षा प्रणाली – विद्यार्थियों के ज्ञान का मूल्यांकन परीक्षा द्वारा किया जाता है।

(vi) प्रमाण-पत्र प्रदान करना – शिक्षा पूर्ण होने पर प्रमाण-पत्र या डिग्री प्रदान की जाती है।

(vii) उद्देश्यपूर्ण शिक्षा – इसका उद्देश्य विद्यार्थियों का बौद्धिक एवं सामाजिक विकास करना होता है।

निष्कर्ष

इस प्रकार औपचारिक शिक्षा एक योजनाबद्ध एवं व्यवस्थित प्रक्रिया है, जो विद्यार्थियों को ज्ञान, कौशल एवं अनुशासन प्रदान करती है। यह व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ समाज एवं राष्ट्र की प्रगति में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है।

प्रश्न 4. पाठ्यक्रम के सामाजिक निर्धारक तत्त्वों को बताइए।

उत्तर-

भूमिका

पाठ्यक्रम शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है। यह केवल विषय-वस्तु का संग्रह नहीं होता, बल्कि समाज की आवश्यकताओं, मूल्यों और उद्देश्यों का प्रतिबिंब भी होता है। समाज में होने वाले परिवर्तन, संस्कृति, परम्पराएँ, आर्थिक स्थिति तथा सामाजिक आवश्यकताएँ पाठ्यक्रम को प्रभावित करती हैं। इसलिए पाठ्यक्रम निर्माण में सामाजिक निर्धारक तत्त्वों का विशेष महत्व होता है।

पाठ्यक्रम के सामाजिक निर्धारक तत्त्व

1. समाज की आवश्यकताएँ

समाज की वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुसार पाठ्यक्रम तैयार किया जाता है। समाज को योग्य, जिम्मेदार और कुशल नागरिकों की आवश्यकता होती है, इसलिए पाठ्यक्रम में उसी प्रकार की सामग्री को शामिल किया जाता है।

2. संस्कृति एवं परम्पराएँ

किसी भी समाज की संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज तथा परम्पराएँ पाठ्यक्रम को प्रभावित करती हैं। शिक्षा के माध्यम से सांस्कृतिक विरासत को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाया जाता है।

3. सामाजिक मूल्य एवं आदर्श

सत्य, अहिंसा, सहयोग, समानता, सहिष्णुता तथा लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास शिक्षा का उद्देश्य होता है। इसलिए पाठ्यक्रम में ऐसे विषय और गतिविधियाँ रखी जाती हैं जो नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का विकास करें।

4. आर्थिक स्थिति

समाज की आर्थिक परिस्थितियाँ भी पाठ्यक्रम को प्रभावित करती हैं। औद्योगिक और तकनीकी विकास के अनुसार व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा को पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाता है।

5. विज्ञान एवं तकनीकी विकास

विज्ञान और तकनीक में हो रहे परिवर्तन के कारण पाठ्यक्रम में कंप्यूटर शिक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी तथा आधुनिक ज्ञान को शामिल किया जाता है।

6. लोकतांत्रिक व्यवस्था

लोकतांत्रिक समाज में स्वतंत्रता, समान अवसर और नागरिक अधिकारों का महत्व होता है। इसलिए पाठ्यक्रम में लोकतांत्रिक मूल्यों एवं नागरिक कर्तव्यों का समावेश किया जाता है।

7. सामाजिक परिवर्तन

समाज निरंतर बदलता रहता है। इन परिवर्तनों के अनुसार पाठ्यक्रम में भी परिवर्तन आवश्यक होता है ताकि विद्यार्थी आधुनिक समाज के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकें।

निष्कर्ष

इस प्रकार स्पष्ट है कि पाठ्यक्रम समाज से गहराई से जुड़ा हुआ है। सामाजिक आवश्यकताएँ, संस्कृति, मूल्य, आर्थिक स्थिति तथा वैज्ञानिक प्रगति पाठ्यक्रम के निर्माण को प्रभावित करते हैं। एक अच्छा पाठ्यक्रम वही माना जाता है जो समाज की जरूरतों को पूरा करते हुए विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में सहायक बने।


अथवा 

प्रश्न . सामाजिक आधार पर पाठ्यक्रम का स्वरूप बताइए।

उत्तर-

भूमिका

शिक्षा और समाज का आपस में घनिष्ठ संबंध होता है। समाज की आवश्यकताओं, मूल्यों और उद्देश्यों के अनुसार ही पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाता है। सामाजिक आधार पर निर्मित पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को समाजोपयोगी बनाता है तथा उनमें सामाजिक चेतना और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करता है।

सामाजिक आधार पर पाठ्यक्रम का स्वरूप

1. समाजोपयोगी पाठ्यक्रम

ऐसा पाठ्यक्रम समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को समाज के लिए उपयोगी नागरिक बनाना होता है।

2. जीवन-केंद्रित पाठ्यक्रम

सामाजिक आधार पर पाठ्यक्रम जीवन से जुड़ा होता है। इसमें दैनिक जीवन की समस्याओं, अनुभवों तथा व्यवहारिक ज्ञान को महत्व दिया जाता है।

3. लोकतांत्रिक स्वरूप

इस प्रकार के पाठ्यक्रम में समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व तथा सहयोग जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रमुख स्थान दिया जाता है।

4. सांस्कृतिक संरक्षण

पाठ्यक्रम समाज की संस्कृति, भाषा, कला और परम्पराओं के संरक्षण का कार्य करता है। इसके माध्यम से विद्यार्थियों में अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है।

5. व्यावसायिक एवं कार्यानुभव आधारित स्वरूप

समाज की आर्थिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम में कार्यानुभव, कौशल विकास और व्यावसायिक शिक्षा को शामिल किया जाता है।

6. परिवर्तनशील स्वरूप

समाज में परिवर्तन के साथ पाठ्यक्रम में भी परिवर्तन किया जाता है। आधुनिक विज्ञान, तकनीक और नई सामाजिक आवश्यकताओं को इसमें स्थान दिया जाता है।

7. नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का विकास

सामाजिक आधार पर पाठ्यक्रम विद्यार्थियों में अनुशासन, सहयोग, सहानुभूति, नैतिकता तथा सामाजिक जिम्मेदारी का विकास करता है।

निष्कर्ष

अतः सामाजिक आधार पर पाठ्यक्रम का स्वरूप व्यापक एवं उपयोगी होता है। यह केवल ज्ञान प्रदान करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विद्यार्थियों को सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक रूप से सक्षम बनाता है। ऐसा पाठ्यक्रम समाज और राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रश्न 5. विषय-केन्द्रित पाठ्यक्रम की व्याख्या कीजिए।

उत्तर-

भूमिका

पाठ्यक्रम शिक्षा की प्रक्रिया का आधार होता है। शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विभिन्न प्रकार के पाठ्यक्रम बनाए जाते हैं। विषय-केन्द्रित पाठ्यक्रम पारंपरिक शिक्षा प्रणाली का प्रमुख स्वरूप है। इसमें विषयों को अधिक महत्व दिया जाता है तथा ज्ञान के व्यवस्थित अध्ययन पर बल दिया जाता है। विद्यालयों में प्रायः इसी प्रकार के पाठ्यक्रम का प्रयोग किया जाता है।

विषय-केन्द्रित पाठ्यक्रम का अर्थ

विषय-केन्द्रित पाठ्यक्रम वह पाठ्यक्रम है जिसमें विभिन्न विषयों—जैसे हिन्दी, गणित, विज्ञान, इतिहास, भूगोल आदि—को अलग-अलग रूप में व्यवस्थित किया जाता है। इसमें विषय-वस्तु को मुख्य आधार माना जाता है और विद्यार्थियों को निर्धारित ज्ञान प्रदान करने पर बल दिया जाता है।

विषय-केन्द्रित पाठ्यक्रम की विशेषताएँ

1. विषयों को प्रमुख स्थान

इस पाठ्यक्रम में प्रत्येक विषय का अलग महत्व होता है तथा विषयवार अध्ययन कराया जाता है।

2. ज्ञान-केंद्रित स्वरूप

इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को अधिक से अधिक ज्ञान प्रदान करना होता है।

3. निश्चित पाठ्यवस्तु

इसमें पाठ्यक्रम पहले से निर्धारित होता है और उसी के अनुसार शिक्षण कार्य किया जाता है।

4. शिक्षक का प्रमुख स्थान

शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षक की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है। शिक्षक ही ज्ञान का मुख्य स्रोत माना जाता है।

5. अनुशासन पर बल

इस पाठ्यक्रम में नियम, अनुशासन और व्यवस्थित अध्ययन को महत्व दिया जाता है।

6. परीक्षा प्रधान व्यवस्था

विद्यार्थियों का मूल्यांकन मुख्यतः लिखित परीक्षाओं के आधार पर किया जाता है।

विषय-केन्द्रित पाठ्यक्रम के गुण

  • ज्ञान का व्यवस्थित संगठन होता है।
  • विषयों का गहन अध्ययन संभव होता है।
  • उच्च शिक्षा के लिए आधार मजबूत बनता है।
  • समय और कार्य का उचित विभाजन रहता है।

विषय-केन्द्रित पाठ्यक्रम की सीमाएँ

  • यह बालक की रुचि और आवश्यकताओं की उपेक्षा करता है।
  • व्यवहारिक ज्ञान की अपेक्षा सैद्धांतिक ज्ञान पर अधिक बल देता है।
  • विद्यार्थियों में रचनात्मकता और क्रियात्मकता कम विकसित होती है।
  • शिक्षा को परीक्षा-केंद्रित बना देता है।

निष्कर्ष

अतः विषय-केन्द्रित पाठ्यक्रम शिक्षा का पारंपरिक एवं महत्वपूर्ण स्वरूप है। यह ज्ञान के व्यवस्थित अध्ययन में सहायक होता है, किन्तु आधुनिक शिक्षा में बालक-केंद्रित एवं गतिविधि-आधारित शिक्षण को भी महत्व दिया जा रहा है ताकि विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास हो सके।

अथवा 

प्रश्न: दक्षता आधारित उपागम को बताइए।

उत्तर-

भूमिका

आधुनिक शिक्षा में केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि विद्यार्थियों में आवश्यक कौशल, क्षमता और व्यवहारिक दक्षताओं का विकास भी आवश्यक है। इसी उद्देश्य से दक्षता आधारित उपागम को शिक्षा में अपनाया गया है। यह उपागम विद्यार्थियों की वास्तविक योग्यता और कार्य करने की क्षमता पर बल देता है।

दक्षता आधारित उपागम का अर्थ

दक्षता आधारित उपागम वह शिक्षण पद्धति है जिसमें विद्यार्थियों को निश्चित दक्षताओं या कौशलों को प्राप्त कराने पर जोर दिया जाता है। इसमें इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि विद्यार्थी किसी कार्य को सही ढंग से करने में सक्षम हुआ है या नहीं।

दक्षता आधारित उपागम की विशेषताएँ

1. कौशल विकास पर बल

इस उपागम में ज्ञान के साथ-साथ कौशल और व्यवहारिक क्षमता के विकास को महत्व दिया जाता है।

2. विद्यार्थी-केंद्रित उपागम

यह उपागम विद्यार्थियों की आवश्यकता, गति और क्षमता के अनुसार शिक्षण प्रदान करता है।

3. स्पष्ट उद्देश्यों का निर्धारण

शिक्षण के उद्देश्य पहले से निश्चित होते हैं तथा उसी के अनुसार शिक्षण कराया जाता है।

4. क्रियात्मक अधिगम

विद्यार्थियों को गतिविधियों, प्रयोगों और अभ्यासों के माध्यम से सीखने का अवसर दिया जाता है।

5. निरंतर मूल्यांकन

विद्यार्थियों की दक्षताओं का मूल्यांकन लगातार किया जाता है ताकि उनकी प्रगति का सही आकलन हो सके।

दक्षता आधारित उपागम के लाभ

  • विद्यार्थियों में आत्मविश्वास और कार्यकुशलता का विकास होता है।
  • शिक्षा अधिक व्यवहारिक और उपयोगी बनती है।
  • विद्यार्थियों की व्यक्तिगत भिन्नताओं का ध्यान रखा जाता है।
  • रोजगारोन्मुख शिक्षा को बढ़ावा मिलता है।

दक्षता आधारित उपागम की सीमाएँ

  • इसे लागू करने में अधिक समय और संसाधनों की आवश्यकता होती है।
  • शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती है।
  • सभी विषयों में दक्षताओं का निर्धारण कठिन हो सकता है।

निष्कर्ष

इस प्रकार दक्षता आधारित उपागम आधुनिक शिक्षा की एक महत्वपूर्ण पद्धति है। यह विद्यार्थियों को केवल ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि उन्हें जीवनोपयोगी कौशलों से भी सशक्त बनाता है। वर्तमान समय में गुणवत्तापूर्ण एवं रोजगारपरक शिक्षा के लिए यह उपागम अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रहा है।

प्रश्न 6. शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण के मापदण्ड का वर्णन कीजिए

उत्तर-

भूमिका

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बालकों का सर्वांगीण विकास करना है। शैक्षिक उद्देश्यों के माध्यम से यह निर्धारित किया जाता है कि शिक्षण प्रक्रिया द्वारा विद्यार्थियों में कौन-से ज्ञान, कौशल, मूल्य और व्यवहार विकसित किए जाने हैं। इसलिए शैक्षिक उद्देश्यों का निर्धारण सोच-समझकर तथा उचित मापदण्डों के आधार पर किया जाना आवश्यक है।

शैक्षिक उद्देश्यों के निर्धारण के मापदण्ड

1. बालक की आवश्यकताओं के अनुरूप

शैक्षिक उद्देश्य विद्यार्थियों की रुचि, क्षमता, आयु तथा मानसिक स्तर के अनुसार होने चाहिए ताकि वे उनके विकास में सहायक बन सकें।

2. समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप

उद्देश्य ऐसे होने चाहिए जो समाज की वर्तमान एवं भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करें तथा विद्यार्थियों को उपयोगी नागरिक बना सकें।

3. राष्ट्र के आदर्शों के अनुरूप

शिक्षा के उद्देश्य राष्ट्रीय एकता, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय तथा राष्ट्रभक्ति जैसे मूल्यों को विकसित करने वाले होने चाहिए।

4. स्पष्ट एवं निश्चित

उद्देश्य स्पष्ट, सरल और निश्चित होने चाहिए ताकि शिक्षक एवं विद्यार्थी दोनों उन्हें आसानी से समझ सकें।

5. व्यवहारिक एवं प्राप्त करने योग्य

उद्देश्य ऐसे होने चाहिए जिन्हें उपलब्ध संसाधनों और परिस्थितियों में प्राप्त किया जा सके।

6. सर्वांगीण विकास पर आधारित

उद्देश्यों में विद्यार्थियों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक तथा भावनात्मक विकास को महत्व दिया जाना चाहिए।

7. परिवर्तनशील एवं लचीले

समाज, विज्ञान और तकनीक में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार उद्देश्यों में संशोधन की व्यवस्था होनी चाहिए।

8. मूल्यांकन योग्य

शैक्षिक उद्देश्य ऐसे होने चाहिए जिनका मूल्यांकन किया जा सके और यह पता लगाया जा सके कि वे कितने सफल हुए हैं।

निष्कर्ष

अतः शैक्षिक उद्देश्यों का निर्धारण शिक्षा प्रक्रिया का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। उचित मापदण्डों के आधार पर निर्धारित उद्देश्य ही शिक्षा को प्रभावी, उपयोगी तथा समाजोपयोगी बनाते हैं। ऐसे उद्देश्य विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास तथा राष्ट्र निर्माण में सहायक सिद्ध होते हैं।

अथवा 

प्रश्न: एक अच्छे पाठ्यक्रम की क्या विशेषताएँ होनी चाहिए?

उत्तर-

भूमिका

पाठ्यक्रम शिक्षा व्यवस्था का आधार होता है। इसके माध्यम से विद्यार्थियों को ज्ञान, कौशल, मूल्य तथा अनुभव प्रदान किए जाते हैं। एक अच्छा पाठ्यक्रम वही माना जाता है जो विद्यार्थियों, समाज तथा राष्ट्र की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए उनके सर्वांगीण विकास में सहायक हो।

एक अच्छे पाठ्यक्रम की विशेषताएँ

1. बालक-केंद्रित होना चाहिए

पाठ्यक्रम विद्यार्थियों की रुचि, आवश्यकता, क्षमता तथा मानसिक स्तर के अनुसार होना चाहिए।

2. उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए

पाठ्यक्रम शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति करने वाला तथा स्पष्ट दिशा प्रदान करने वाला होना चाहिए।

3. सर्वांगीण विकास में सहायक

इसमें विद्यार्थियों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक एवं भावनात्मक विकास की व्यवस्था होनी चाहिए।

4. जीवनोपयोगी होना चाहिए

पाठ्यक्रम का संबंध वास्तविक जीवन से होना चाहिए ताकि विद्यार्थी जीवन की समस्याओं का समाधान कर सकें।

5. लचीला एवं परिवर्तनशील

समय, समाज, विज्ञान एवं तकनीक के अनुसार पाठ्यक्रम में आवश्यक परिवर्तन किए जा सकें।

6. क्रियात्मक एवं अनुभवात्मक

पाठ्यक्रम में गतिविधियों, प्रयोगों, परियोजनाओं तथा अनुभव आधारित शिक्षण को महत्व दिया जाना चाहिए।

7. सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित

इसमें समाज की संस्कृति, परम्पराओं, नैतिक मूल्यों तथा राष्ट्रीय आदर्शों को स्थान मिलना चाहिए।

8. लोकतांत्रिक भावना का विकास

पाठ्यक्रम विद्यार्थियों में सहयोग, समानता, स्वतंत्रता तथा जिम्मेदारी की भावना विकसित करने वाला होना चाहिए।

9. व्यावसायिक एवं कौशल आधारित

इसमें रोजगारोन्मुख शिक्षा तथा कौशल विकास पर भी बल दिया जाना चाहिए।

10. मूल्यांकन की उचित व्यवस्था

एक अच्छे पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों की प्रगति जाँचने के लिए उचित एवं सतत मूल्यांकन की व्यवस्था होनी चाहिए।

निष्कर्ष

इस प्रकार एक अच्छा पाठ्यक्रम वह है जो विद्यार्थियों की आवश्यकताओं, समाज की अपेक्षाओं तथा राष्ट्रीय उद्देश्यों के अनुरूप हो। ऐसा पाठ्यक्रम शिक्षा को प्रभावी, उपयोगी और जीवनोपयोगी बनाकर विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

खण्ड ‘स’ : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (निर्धारित अंक 2 × 15 = 30 )
नोट : किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर दीजिए। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 500 शब्दों में दीजिए।

प्रश्न 7. ज्ञान से आप क्या समझते हैं? इसके प्राप्ति के तरीके का संक्षिप्त विवरण दीजिए।

उत्तर-

भूमिका

ज्ञान मानव जीवन का आधार है। मनुष्य अपने अनुभव, शिक्षा तथा पर्यावरण से जो जानकारी और समझ प्राप्त करता है, वही ज्ञान कहलाता है। ज्ञान के माध्यम से व्यक्ति सही और गलत में अंतर करना सीखता है तथा अपने जीवन को सफल और उपयोगी बनाता है। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य भी विद्यार्थियों में ज्ञान का विकास करना होता है। ज्ञान व्यक्ति के मानसिक, सामाजिक और नैतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

ज्ञान का अर्थ

ज्ञान वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति किसी वस्तु, तथ्य, घटना या विचार को समझता और उसका बोध प्राप्त करता है। दूसरे शब्दों में, अनुभव, अध्ययन और चिंतन के माध्यम से प्राप्त समझ को ज्ञान कहा जाता है। ज्ञान व्यक्ति को जागरूक, विवेकशील और सक्षम बनाता है।

दार्शनिक दृष्टि से ज्ञान सत्य, विश्वास और अनुभव का समन्वय है। यह केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि उन सूचनाओं को समझकर जीवन में उपयोग करने की क्षमता भी है।

ज्ञान प्राप्ति के तरीके

1. प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा

मनुष्य अपने प्रत्यक्ष अनुभवों से बहुत कुछ सीखता है। किसी वस्तु को देखकर, छूकर या प्रयोग करके प्राप्त जानकारी स्थायी ज्ञान बन जाती है। उदाहरण के लिए, विज्ञान प्रयोगशाला में किए गए प्रयोग विद्यार्थियों को वास्तविक ज्ञान प्रदान करते हैं।

2. अध्ययन एवं पठन द्वारा

पुस्तकों, समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा अन्य अध्ययन सामग्री के माध्यम से ज्ञान प्राप्त किया जाता है। विद्यालय और महाविद्यालय में शिक्षा का मुख्य आधार अध्ययन ही होता है।

3. निरीक्षण द्वारा

आसपास की घटनाओं और परिस्थितियों का ध्यानपूर्वक अवलोकन करने से ज्ञान प्राप्त होता है। बालक अपने वातावरण का निरीक्षण करके अनेक नई बातें सीखता है।

4. श्रवण द्वारा

दूसरों की बातों को सुनकर भी ज्ञान प्राप्त किया जाता है। शिक्षक के व्याख्यान, माता-पिता के निर्देश तथा विद्वानों के विचार सुनकर व्यक्ति नई जानकारी प्राप्त करता है।

5. चिंतन एवं मनन द्वारा

गहन विचार और मनन के माध्यम से व्यक्ति किसी विषय की गहराई को समझता है। यह ज्ञान को स्थायी और सार्थक बनाता है।

6. प्रयोग एवं अनुसंधान द्वारा

वैज्ञानिक और शोधकर्ता प्रयोग तथा अनुसंधान के माध्यम से नए ज्ञान की खोज करते हैं। यह ज्ञान समाज के विकास में सहायक होता है।

7. सामाजिक संपर्क द्वारा

मनुष्य समाज में रहकर एक-दूसरे से सीखता है। मित्रों, परिवार तथा समाज के अन्य लोगों के संपर्क से व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त होता है।

ज्ञान का महत्व

ज्ञान व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाता है। यह उसके व्यक्तित्व का विकास करता है तथा समाज में सम्मान दिलाता है। ज्ञान के माध्यम से विज्ञान, तकनीक, संस्कृति और सभ्यता का विकास संभव हुआ है।

निष्कर्ष

अतः ज्ञान मानव जीवन का अमूल्य धन है। यह व्यक्ति को अज्ञानता से मुक्त कर सही दिशा प्रदान करता है। अनुभव, अध्ययन, निरीक्षण, चिंतन तथा सामाजिक संपर्क ज्ञान प्राप्ति के प्रमुख साधन हैं। ज्ञान के बिना व्यक्ति और समाज का विकास संभव नहीं है।


प्रश्न 8. अधिगमकर्त्ता की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर-

भूमिका

अधिगमकर्ता वह व्यक्ति होता है जो सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेता है। शिक्षा प्रक्रिया का केंद्र बिंदु अधिगमकर्ता ही होता है। प्रत्येक विद्यार्थी की रुचि, क्षमता, बुद्धि, व्यवहार तथा सीखने की गति अलग-अलग होती है। इसलिए शिक्षक के लिए अधिगमकर्ता की विशेषताओं को समझना अत्यंत आवश्यक है। अधिगमकर्ता की विशेषताओं को ध्यान में रखकर ही प्रभावी शिक्षण संभव हो पाता है।

अधिगमकर्ता की प्रमुख विशेषताएँ

1. सीखने की जिज्ञासा

अधिगमकर्ता में नई बातें जानने और सीखने की स्वाभाविक इच्छा होती है। जिज्ञासा ही उसे ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है।

2. व्यक्तिगत भिन्नता

हर अधिगमकर्ता की मानसिक क्षमता, रुचि, योग्यता और सीखने की गति अलग होती है। कोई विद्यार्थी जल्दी सीखता है तो कोई धीरे-धीरे सीखता है।

3. सक्रियता

अधिगमकर्ता केवल सुनने वाला नहीं होता, बल्कि वह गतिविधियों में भाग लेकर सीखता है। प्रश्न पूछना, प्रयोग करना और चर्चा में भाग लेना उसकी सक्रियता को दर्शाता है।

4. लक्ष्य उन्मुखता

अधिगमकर्ता का सीखना किसी उद्देश्य से जुड़ा होता है। वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मेहनत करता है और नई जानकारी अर्जित करता है।

5. अनुभव से सीखना

विद्यार्थी अपने अनुभवों से बहुत कुछ सीखता है। प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा प्राप्त ज्ञान अधिक स्थायी और प्रभावशाली होता है।

6. प्रेरणा की आवश्यकता

अधिगमकर्ता को सीखने के लिए प्रेरणा की आवश्यकता होती है। शिक्षक का प्रोत्साहन और सकारात्मक वातावरण उसके अधिगम को प्रभावी बनाता है।

7. सामाजिक प्रकृति

अधिगमकर्ता समाज में रहकर सीखता है। समूह कार्य, चर्चा और सहयोगात्मक गतिविधियाँ उसके सामाजिक विकास में सहायक होती हैं।

8. भावनात्मक प्रभाव

अधिगमकर्ता की भावनाएँ उसके सीखने को प्रभावित करती हैं। भय, तनाव और चिंता सीखने में बाधा उत्पन्न करते हैं, जबकि आत्मविश्वास और उत्साह अधिगम को बढ़ाते हैं।

9. सृजनात्मकता

अधिगमकर्ता में नई कल्पनाएँ और विचार उत्पन्न करने की क्षमता होती है। सृजनात्मकता उसे समस्याओं का समाधान खोजने में सहायता करती है।

10. अनुकूलन क्षमता

अधिगमकर्ता बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता रखता है। यही गुण उसे जीवन में सफल बनाता है।

अधिगमकर्ता का शैक्षिक महत्व

अधिगमकर्ता की विशेषताओं को समझकर शिक्षक उचित शिक्षण विधियों का चयन करता है। इससे शिक्षण प्रक्रिया अधिक प्रभावी, रुचिकर और बालक-केंद्रित बनती है। आधुनिक शिक्षा में अधिगमकर्ता को शिक्षा का केंद्र माना गया है।

निष्कर्ष

अतः अधिगमकर्ता शिक्षा प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। उसकी जिज्ञासा, सक्रियता, अनुभव, प्रेरणा तथा व्यक्तिगत भिन्नताएँ अधिगम को प्रभावित करती हैं। शिक्षक को इन विशेषताओं को ध्यान में रखकर शिक्षण कार्य करना चाहिए ताकि विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास हो सके।

प्रश्न 9. पाठ्यक्रम के निर्माण में प्रमुख सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए

उत्तर –

भूमिका

पाठ्यक्रम शिक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह केवल विषयों की सूची नहीं होता, बल्कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए योजनाबद्ध अनुभवों का समुच्चय होता है। किसी भी देश की शिक्षा प्रणाली उसके पाठ्यक्रम पर आधारित होती है। इसलिए पाठ्यक्रम निर्माण एक अत्यंत जिम्मेदारीपूर्ण कार्य है। पाठ्यक्रम का निर्माण करते समय कई सिद्धान्तों का ध्यान रखा जाता है ताकि शिक्षा उद्देश्यपूर्ण, उपयोगी और जीवनोपयोगी बन सके। ये सिद्धान्त विद्यार्थियों की आवश्यकताओं, समाज की अपेक्षाओं तथा समय की मांगों के अनुरूप शिक्षा प्रदान करने में सहायता करते हैं।

पाठ्यक्रम निर्माण के प्रमुख सिद्धान्त

1. बालक-केंद्रित सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के अनुसार पाठ्यक्रम का केंद्र बालक होना चाहिए। पाठ्यक्रम निर्माण में बालकों की रुचि, आवश्यकता, क्षमता, आयु तथा मानसिक स्तर को ध्यान में रखा जाता है। यदि पाठ्यक्रम बालकों के अनुकूल होगा तो अधिगम अधिक प्रभावी और स्थायी होगा।

2. जीवनोपयोगिता का सिद्धान्त

पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो विद्यार्थियों को वास्तविक जीवन के लिए तैयार करे। शिक्षा केवल परीक्षा पास करने तक सीमित न रहकर जीवन की समस्याओं का समाधान करने में सहायक होनी चाहिए। इसलिए पाठ्यक्रम में व्यावहारिक ज्ञान और कौशल को स्थान दिया जाता है।

3. लचीलापन का सिद्धान्त

समय, समाज और विज्ञान में निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं। इसलिए पाठ्यक्रम में भी परिवर्तन की संभावना बनी रहनी चाहिए। कठोर एवं स्थिर पाठ्यक्रम विद्यार्थियों की बदलती आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता। अतः पाठ्यक्रम लचीला और परिवर्तनशील होना चाहिए।

4. उपयोगिता का सिद्धान्त

पाठ्यक्रम में वही विषय एवं गतिविधियाँ शामिल की जानी चाहिए जो विद्यार्थियों और समाज के लिए उपयोगी हों। अनुपयोगी तथा बोझिल विषयों को कम महत्व दिया जाना चाहिए।

5. सामाजिक आवश्यकता का सिद्धान्त

शिक्षा का उद्देश्य समाज के योग्य नागरिक तैयार करना है। इसलिए पाठ्यक्रम का निर्माण समाज की आवश्यकताओं, संस्कृति, परंपराओं तथा मूल्यों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। इससे विद्यार्थियों में सामाजिक समायोजन की भावना विकसित होती है।

6. क्रियात्मकता का सिद्धान्त

पाठ्यक्रम केवल सैद्धांतिक न होकर क्रियात्मक होना चाहिए। विद्यार्थियों को “करके सीखने” के अवसर मिलने चाहिए। परियोजना कार्य, प्रयोग, खेल, कला तथा गतिविधि आधारित शिक्षण को महत्व दिया जाना चाहिए।

7. समन्वय का सिद्धान्त

पाठ्यक्रम में विभिन्न विषयों एवं गतिविधियों के बीच समन्वय होना चाहिए। ज्ञान को अलग-अलग भागों में बाँटने के बजाय एकीकृत रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए ताकि विद्यार्थी विषयों के पारस्परिक संबंध को समझ सकें।

8. सर्वांगीण विकास का सिद्धान्त

पाठ्यक्रम का उद्देश्य केवल बौद्धिक विकास नहीं होना चाहिए। इसमें शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक तथा भावनात्मक विकास के अवसर भी उपलब्ध होने चाहिए।

9. लोकतांत्रिक सिद्धान्त

लोकतांत्रिक समाज में शिक्षा का उद्देश्य स्वतंत्र विचार, समानता, सहयोग तथा सहिष्णुता का विकास करना होता है। इसलिए पाठ्यक्रम में लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थान दिया जाना आवश्यक है।

10. अनुभव की पूर्णता का सिद्धान्त

पाठ्यक्रम में ऐसे अनुभव दिए जाने चाहिए जो विद्यार्थियों के जीवन से जुड़े हों और उन्हें संपूर्ण अधिगम अनुभव प्रदान करें। इससे शिक्षा अधिक अर्थपूर्ण बनती है।

निष्कर्ष

अतः स्पष्ट है कि पाठ्यक्रम निर्माण एक वैज्ञानिक एवं योजनाबद्ध प्रक्रिया है। इसके निर्माण में विभिन्न सिद्धान्तों का पालन करना आवश्यक होता है ताकि शिक्षा बालक, समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं को पूरा कर सके। एक अच्छा पाठ्यक्रम विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करता है तथा उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनने में सहायता प्रदान करता है।


प्रश्न 10. पाठ्यक्रम के सिद्धान्त में पाठ्यक्रम का एक उत्पाद के रूप में व्याख्या कीजिए।

भूमिका

पाठ्यक्रम शिक्षा की दिशा निर्धारित करने वाला महत्वपूर्ण साधन है। शिक्षा शास्त्र में पाठ्यक्रम को विभिन्न दृष्टिकोणों से समझाया गया है। इनमें “पाठ्यक्रम को एक उत्पाद के रूप में” देखने का दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दृष्टिकोण में शिक्षा को एक ऐसी प्रक्रिया माना जाता है जिसके अंत में निश्चित परिणाम या उत्पाद प्राप्त होता है। अर्थात् शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों में अपेक्षित ज्ञान, कौशल, व्यवहार एवं मूल्यों का विकास करना ही इसका उद्देश्य होता है।

पाठ्यक्रम का एक उत्पाद के रूप में अर्थ

जब पाठ्यक्रम को एक उत्पाद के रूप में देखा जाता है, तब शिक्षा का मुख्य ध्यान पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति पर होता है। इस दृष्टिकोण में यह माना जाता है कि यदि शिक्षण प्रक्रिया सही ढंग से संचालित की जाए तो अंत में एक निश्चित “उत्पाद” प्राप्त होगा। यह उत्पाद विद्यार्थियों का विकसित ज्ञान, कौशल, योग्यता तथा व्यवहार होता है।

इस सिद्धान्त में पाठ्यक्रम निर्माण पहले से निर्धारित उद्देश्यों के आधार पर किया जाता है। शिक्षक, शिक्षण विधियाँ, मूल्यांकन तथा शिक्षण सामग्री सभी का चयन इस प्रकार किया जाता है कि वांछित परिणाम प्राप्त हो सके।

पाठ्यक्रम को उत्पाद मानने की विशेषताएँ

1. उद्देश्य आधारित शिक्षा

इस सिद्धान्त में शिक्षा के उद्देश्यों को पहले निर्धारित किया जाता है। पाठ्यक्रम इन्हीं उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए बनाया जाता है।

2. परिणाम पर अधिक बल

यह दृष्टिकोण शिक्षण प्रक्रिया की अपेक्षा अंतिम परिणाम या उपलब्धि को अधिक महत्व देता है। विद्यार्थियों ने क्या सीखा, इसका मूल्यांकन प्रमुख होता है।

3. मापन एवं मूल्यांकन की व्यवस्था

इस सिद्धान्त में विद्यार्थियों की उपलब्धियों का परीक्षण एवं मूल्यांकन किया जाता है। परीक्षा, परीक्षण तथा अंक प्रणाली के माध्यम से परिणामों को मापा जाता है।

4. योजनाबद्ध शिक्षण

पाठ्यक्रम को व्यवस्थित एवं योजनाबद्ध तरीके से तैयार किया जाता है ताकि शिक्षण प्रक्रिया प्रभावी बन सके।

5. व्यवहार परिवर्तन पर बल

इस सिद्धान्त के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों के व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाना होता है।

पाठ्यक्रम को उत्पाद मानने के लाभ

1. शिक्षा में स्पष्टता आती है

पूर्व निर्धारित उद्देश्यों के कारण शिक्षक एवं विद्यार्थी दोनों को यह स्पष्ट रहता है कि क्या प्राप्त करना है।

2. मूल्यांकन सरल हो जाता है

निश्चित उद्देश्यों के आधार पर विद्यार्थियों की उपलब्धियों का आकलन आसानी से किया जा सकता है।

3. शिक्षण अधिक संगठित बनता है

यह दृष्टिकोण शिक्षण प्रक्रिया को व्यवस्थित एवं नियंत्रित बनाता है।

4. उत्तरदायित्व सुनिश्चित होता है

शिक्षक एवं विद्यालय अपने परिणामों के प्रति उत्तरदायी बनते हैं।

सीमाएँ

1. रचनात्मकता की उपेक्षा

यह सिद्धान्त कभी-कभी केवल परीक्षा एवं परिणामों पर अधिक बल देता है, जिससे विद्यार्थियों की रचनात्मकता प्रभावित हो सकती है।

2. बालक की व्यक्तिगत भिन्नताओं की अनदेखी

सभी विद्यार्थियों को एक समान मानकर शिक्षा देने से व्यक्तिगत आवश्यकताओं की उपेक्षा हो सकती है।

3. शिक्षा को यांत्रिक बना देना

अत्यधिक लक्ष्य आधारित शिक्षा कभी-कभी शिक्षण को केवल अंक प्राप्ति तक सीमित कर देती है।

निष्कर्ष

अंततः कहा जा सकता है कि पाठ्यक्रम को एक उत्पाद के रूप में देखने का सिद्धान्त शिक्षा में उद्देश्य, योजना एवं परिणाम की स्पष्टता प्रदान करता है। यह शिक्षा को व्यवस्थित और उत्तरदायी बनाता है। हालांकि, केवल परिणाम आधारित दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं है। इसलिए आधुनिक शिक्षा में इस सिद्धान्त के साथ बालक-केंद्रित एवं अनुभवात्मक दृष्टिकोण को भी महत्व दिया जाता है, ताकि विद्यार्थियों का संतुलित एवं सर्वांगीण विकास सुनिश्चित किया जा सके।

Share This Post

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

More To Explore

VBSPU B.Ed. 2nd SEMESTER KNOWLEDGE & CURRICULUM

KNOWLEDGE & CURRICULUM SYLLABUS PREVIOUS YEAR QUESTION WITH SOLUTION विषय Knowledge & Curriculum Notes पेपर 201 विश्वविद्यालय वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल   विश्वविद्यालय  बी.एड द्वितीय

Creating An Inclusive School
B.Ed. 2nd NOTES

Creating an Inclusive School

Creating an Inclusive School विषय  Creating an Inclusive School   SUBJECT Creating an Inclusive School B.Ed. Notes COURSE  B.Ed. 2nd Year PAPER  VVI NOTES के

Scroll to Top