B.Ed 1st YEAR CHILDHOOD AND GROWING UP PREVIOUS QUESTION PAPER WITH ANSWER

CHILDHOOD AND GROWING UP PREVIOUS QUESTION PAPER

Table of Contents

UNIVERSITY MAGADH UNIVERSITY, BODH GAYA
TOPIC CHILDHOOD AND GROWING UP MODEL PAPER WITH SOLUTION
COURSE B.Ed 1st YEAR
PAPER 01

VVI NOTES के इस पेज में MAGADH UNIVERSITY B.Ed 1ST YEAR PAPER 1 CHILHOOD AND GROWING UP  PREVIOUS YEAR QUESTION PAPER WITH ANSWER  को शामिल किया गया है |







MAGADH UNIVERSITY B.Ed 1st YEAR PAPER PAPER – 01 CHILHOOD AND GROWING UP SESSION (2022-24) EXAM 2023 PREVIOUS YEAR QUESTION PAPER & SOLUTION

Section – A
(Long answer type questions)
(दीर्घ उत्तरीय प्रश्न)

1. Answer any five questions of the following:
निम्नलिखित में से किन्हीं पाँच प्रश्नों के उत्तर दें। -10 × 5 = 50

1(a)Q. Describe the main characteristics of physical development’ for the stages of childhood.

1(a) प्रश्न-  बाल्यावस्था के शारीरिक विकास के मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें। 2023

उत्तर –

  • (1) भूमिका
  • (2) बाल्यावस्था के शारीरिक विकास की मुख्य विशेषताएँ
  • (3) निष्कर्ष

(1) भूमिका

बाल्यावस्था मानव विकास की अत्यंत महत्वपूर्ण अवस्था है। सामान्यतः 6 से 12 वर्ष की आयु को बाल्यावस्था कहा जाता है। इस काल में बालक के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा भावनात्मक विकास की आधारशिला मजबूत होती है। शारीरिक विकास से आशय शरीर के आकार, बनावट, ऊँचाई, वजन, मांसपेशियों तथा अंगों के विकास से है।

(2) बाल्यावस्था के शारीरिक विकास की मुख्य विशेषताएँ
1. ऊँचाई एवं वजन में वृद्धि

बाल्यावस्था में बालक की ऊँचाई और वजन में निरंतर वृद्धि होती है। औसतन प्रतिवर्ष 5–6 सेमी ऊँचाई तथा 2–3 किलोग्राम वजन बढ़ता है। वृद्धि की गति शैशवावस्था की अपेक्षा धीमी लेकिन नियमित होती है।

2. शरीर का अनुपातिक विकास

इस अवस्था में शरीर के विभिन्न अंगों का विकास संतुलित रूप से होता है। सिर की अपेक्षा धड़ और पैरों की वृद्धि अधिक होती है, जिससे शरीर का अनुपात संतुलित दिखाई देने लगता है।

3. अस्थियों (हड्डियों) का विकास

हड्डियाँ मजबूत और कठोर होने लगती हैं। दाँतों का परिवर्तन (दूध के दाँतों की जगह स्थायी दाँत) इसी अवस्था में होता है। कैल्शियम और पोषण का इस समय विशेष महत्व होता है।

4. मांसपेशियों का विकास

मांसपेशियाँ अधिक सशक्त होती हैं। बालक दौड़ना, कूदना, खेलना आदि शारीरिक क्रियाएँ अधिक कुशलता से करने लगता है। शारीरिक शक्ति एवं सहनशक्ति में वृद्धि होती है।

5. सूक्ष्म एवं स्थूल कौशल का विकास

इस अवस्था में स्थूल (Gross) तथा सूक्ष्म (Fine) मोटर कौशल का विकास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

स्थूल कौशल: दौड़ना, कूदना, साइकिल चलाना।

सूक्ष्म कौशल: लिखना, चित्र बनाना, कागज काटना आदि।

6. स्नायविक तंत्र का विकास

तंत्रिका तंत्र अधिक परिपक्व होता है, जिससे समन्वय (Coordination) में सुधार आता है। आँख–हाथ का समन्वय बेहतर होता है।

7. स्वास्थ्य एवं प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि

बालक की रोग-प्रतिरोधक क्षमता पहले की अपेक्षा बढ़ती है। यदि उचित आहार और व्यायाम मिले तो स्वास्थ्य अच्छा रहता है।

8. लिंगानुसार अंतर

बालकों और बालिकाओं के शारीरिक विकास में हल्का अंतर दिखाई देता है। बाल्यावस्था के अंतिम चरण में बालिकाओं का विकास कभी-कभी बालकों से थोड़ा अधिक तेजी से होता है।

(3) निष्कर्ष

अतः बाल्यावस्था शारीरिक विकास की दृष्टि से संतुलित और स्थिर वृद्धि का काल है। इस अवस्था में उचित पोषण, स्वच्छता, व्यायाम तथा खेल-कूद की सुविधा प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यही समय भविष्य के स्वस्थ एवं सशक्त व्यक्तित्व की नींव रखता है।
 

 

 

1(b)Q. Explain the role of ‘family’ in normal development of childhood with suitable examples.

1(b) प्रश्न- बाल्यावस्था के सामान्य विकास में परिवार की भूमिका का उदाहरण सहित व्याख्या करें।2023

उत्तर –

  • (1) भूमिका
  • (2) बाल्यावस्था के सामान्य विकास में परिवार की भूमिका
  • (3) निष्कर्ष

(1) भूमिका

बाल्यावस्था मानव जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है। इस अवस्था में बालक का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक तथा नैतिक विकास तीव्र गति से होता है। परिवार बालक का प्रथम सामाजिक संस्थान है, जहाँ से वह जीवन के मूल संस्कार, व्यवहार और मूल्य सीखता है। अतः बाल्यावस्था के सामान्य विकास में परिवार की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।

(2) बाल्यावस्था के सामान्य विकास में परिवार की भूमिका
1. शारीरिक विकास में भूमिका

परिवार बालक को उचित आहार, वस्त्र, स्वास्थ्य-सुविधाएँ और सुरक्षित वातावरण प्रदान करता है।
उदाहरण: यदि माता-पिता संतुलित भोजन (दूध, फल, सब्जियाँ) देते हैं और समय-समय पर टीकाकरण कराते हैं, तो बालक का शारीरिक विकास संतुलित होता है।

2. मानसिक (बौद्धिक) विकास में भूमिका

परिवार बालक की जिज्ञासा को प्रोत्साहित करता है, उसे पढ़ने-लिखने का वातावरण देता है तथा प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता देता है।
उदाहरण: यदि माता-पिता बच्चे को कहानी की पुस्तकें पढ़कर सुनाते हैं या उसके प्रश्नों का उत्तर देते हैं, तो उसकी बुद्धि और सोचने की क्षमता विकसित होती है।

3. सामाजिक विकास में भूमिका

परिवार ही बालक को सामाजिक नियम, शिष्टाचार, सहयोग और अनुशासन सिखाता है।
उदाहरण: घर में बड़ों का सम्मान करना, अतिथि का स्वागत करना आदि व्यवहार परिवार से ही सीखे जाते हैं।

4. भावनात्मक विकास में भूमिका

परिवार का स्नेह, सुरक्षा और सहानुभूति बालक में आत्मविश्वास तथा भावनात्मक संतुलन विकसित करता है।
उदाहरण: यदि बच्चा असफल होता है और माता-पिता उसे डाँटने के बजाय प्रोत्साहित करते हैं, तो उसमें आत्मबल और सकारात्मक सोच विकसित होती है।

5. नैतिक एवं चारित्रिक विकास में भूमिका

परिवार बालक को सत्य, ईमानदारी, सहानुभूति और कर्तव्य जैसे नैतिक मूल्यों का शिक्षण देता है।
उदाहरण: यदि माता-पिता स्वयं सत्य बोलते हैं और अच्छे आचरण का पालन करते हैं, तो बालक भी वही व्यवहार अपनाता है।

6. भाषा विकास में भूमिका

बालक की प्रथम भाषा परिवार से ही विकसित होती है।
उदाहरण: घर में शुद्ध और स्पष्ट भाषा बोलने से बालक की भाषायी क्षमता मजबूत होती है।

(3) निष्कर्ष

स्पष्ट है कि परिवार बालक के सर्वांगीण विकास का आधार है। परिवार का वातावरण जितना स्नेहपूर्ण, अनुशासित और प्रेरणादायक होगा, बालक का विकास उतना ही संतुलित और प्रभावी होगा। अतः बाल्यावस्था के सामान्य विकास में परिवार की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण और निर्णायक होती है।

 

 

1c)Q. Describe the stages of moral development’ propounded by ‘Kohlberg’.

1(C) प्रश्न- कोहलबर्ग के द्वारा प्रतिपादित नैतिक विकास के अवस्थाओं का वर्णन करें। 2023

उत्तर-
(1) भूमिका

नैतिक विकास का संबंध व्यक्ति की सही-गलत के प्रति समझ, निर्णय-क्षमता तथा आचरण से है। Lawrence Kohlberg ने नैतिक विकास का एक क्रमिक सिद्धांत प्रस्तुत किया, जो बालकों एवं किशोरों में नैतिक तर्क (Moral Reasoning) के विकास को स्पष्ट करता है। उनका सिद्धांत Jean Piaget के संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत से प्रभावित है। कोहलबर्ग ने नैतिक विकास को तीन स्तरों तथा छः अवस्थाओं में विभाजित किया।

(2) नैतिक विकास के स्तर एवं अवस्थाएँ
1. पूर्व-परंपरागत स्तर (Pre-Conventional Level)

यह स्तर प्रायः बाल्यावस्था में पाया जाता है। इसमें नैतिकता का आधार दंड और पुरस्कार होता है।

(i) दंड एवं आज्ञापालन अभिमुखता (Punishment and Obedience Orientation)

बालक सही-गलत का निर्णय दंड के आधार पर करता है।

वह नियमों का पालन दंड से बचने के लिए करता है।
उदाहरण: बच्चा झूठ इसलिए नहीं बोलता क्योंकि उसे सजा का डर है।

(ii) साधनात्मक या स्वार्थ अभिमुखता (Instrumental Orientation)

बालक अपने लाभ या पुरस्कार के आधार पर कार्य करता है।

नैतिकता का आधार “लेन-देन” की भावना होती है।
उदाहरण: बच्चा होमवर्क इसलिए करता है क्योंकि उसे चॉकलेट मिलने वाली है।

2. परंपरागत स्तर (Conventional Level)

यह स्तर सामान्यतः किशोरावस्था में विकसित होता है। इसमें सामाजिक स्वीकृति और नियमों का पालन प्रमुख होता है।

(iii) अच्छा बालक अभिमुखता (Good Boy–Good Girl Orientation)

व्यक्ति दूसरों की स्वीकृति पाने हेतु नैतिक आचरण करता है।

अच्छा दिखने और प्रशंसा पाने की इच्छा प्रमुख होती है।
उदाहरण: छात्र शिक्षक की प्रशंसा पाने के लिए अनुशासन का पालन करता है।

(iv) विधि एवं व्यवस्था अभिमुखता (Law and Order Orientation)

व्यक्ति समाज के नियमों और कानूनों का पालन कर्तव्य समझकर करता है।

सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जाता है।
उदाहरण: व्यक्ति ट्रैफिक नियमों का पालन इसलिए करता है क्योंकि यह समाज के लिए आवश्यक है।

3. उत्तर-परंपरागत स्तर (Post-Conventional Level)

यह स्तर प्रायः वयस्क अवस्था में विकसित होता है। इसमें नैतिकता व्यक्तिगत सिद्धांतों और मूल्यों पर आधारित होती है।

(v) सामाजिक अनुबंध अभिमुखता (Social Contract Orientation)

व्यक्ति समझता है कि कानून समाज के हित के लिए बनाए गए हैं।

यदि कानून अन्यायपूर्ण हो, तो उसे बदलने का समर्थन करता है।
उदाहरण: किसी अन्यायपूर्ण नियम के विरोध में शांतिपूर्ण आंदोलन करना।

(vi) सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत अभिमुखता (Universal Ethical Principles Orientation)

व्यक्ति अपने अंतःकरण और सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों (सत्य, न्याय, मानवता) के आधार पर निर्णय लेता है।

यह सर्वोच्च अवस्था मानी जाती है।
उदाहरण: किसी निर्दोष व्यक्ति को बचाने के लिए व्यक्तिगत हानि उठाना।

(3) निष्कर्ष

कोहलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि नैतिकता जन्मजात नहीं होती, बल्कि यह क्रमिक रूप से विकसित होती है। व्यक्ति दंड-पुरस्कार की भावना से प्रारंभ कर सामाजिक नियमों और अंततः सार्वभौमिक नैतिक मूल्यों तक पहुँचता है। शिक्षा और सामाजिक वातावरण इस विकास को दिशा प्रदान करते हैं। अतः कोहलबर्ग का सिद्धांत नैतिक शिक्षा के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
 

1(d)Q- Explain the physical and mental changes which take place in the stage of adolescence in detail.

1(d) प्रश्न- किशोरावस्था में घटित शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन को विस्तार से व्याख्या करें ।2023

उत्तर-

  • (१) भूमिका
  • (2) किशोरावस्था में शारीरिक परिवर्तन
  • (3) किशोरावस्था में मानसिक परिवर्तन
  • (४) निष्कर्ष

(१) भूमिका

किशोरावस्था मानव विकास की वह संक्रमण अवस्था है जिसमें बालक/बालिका शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक तथा सामाजिक दृष्टि से तीव्र परिवर्तन अनुभव करता/करती है। सामान्यतः यह अवस्था 12 से 19 वर्ष तक मानी जाती है। मनोवैज्ञानिक जैसे जी. स्टेनली हॉल ने इसे “Storm and Stress” अर्थात् उथल-पुथल की अवस्था कहा है, क्योंकि इस काल में व्यक्तित्व में व्यापक परिवर्तन होते हैं।

(१) किशोरावस्था में शारीरिक परिवर्तन

किशोरावस्था में शारीरिक विकास तीव्र एवं स्पष्ट होता है। इसे यौवनारंभ (Puberty) भी कहा जाता है।

1. तीव्र शारीरिक वृद्धि (Growth Spurt)

  • ऊँचाई एवं वजन में अचानक वृद्धि।
  • मांसपेशियों का विकास।
  • शरीर की बनावट में परिवर्तन (लड़कियों में गोलाई, लड़कों में चौड़ाई)।

2. यौन परिपक्वता

  • लड़कियों में मासिक धर्म (Menstruation) का प्रारंभ।
  • लड़कों में स्वप्नदोष एवं शुक्राणु निर्माण की शुरुआत।
  • जननांगों का पूर्ण विकास।

3. द्वितीयक लैंगिक लक्षण

  • लड़कों में दाढ़ी-मूँछ, आवाज का भारी होना।
  • लड़कियों में स्तनों का विकास।
  • दोनों में बगल एवं जननांगों के आसपास बालों का उगना।

4. हार्मोनल परिवर्तन

  • अंतःस्रावी ग्रंथियों (Endocrine glands) की सक्रियता बढ़ती है।
  • हार्मोन के कारण भावनात्मक अस्थिरता भी देखी जाती है।

5. स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ

  • मुहांसे, शरीर में पसीना अधिक आना।
  • थकान, असंतुलित खान-पान की प्रवृत्ति।

(२) किशोरावस्था में मानसिक परिवर्तन

किशोरावस्था में मानसिक एवं बौद्धिक विकास भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

1. संज्ञानात्मक विकास

  • अमूर्त चिंतन (Abstract Thinking) की क्षमता विकसित होती है।
  • तर्क, विश्लेषण एवं समस्या-समाधान की क्षमता बढ़ती है।
  • भविष्य की योजना बनाने की प्रवृत्ति।

मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे के अनुसार इस अवस्था में किशोर “औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था” (Formal Operational Stage) में प्रवेश करता है, जहाँ वह काल्पनिक एवं तार्किक चिंतन करने लगता है।

2. आत्मचेतना (Self-consciousness)

  • स्वयं के रूप-रंग एवं व्यक्तित्व के प्रति अधिक सजगता।
  • “लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं?” जैसी चिंता।

3. भावनात्मक अस्थिरता

  • क्रोध, प्रेम, ईर्ष्या, निराशा जैसी भावनाओं की तीव्रता।
  • मूड में अचानक परिवर्तन।

4. नैतिक विकास

  • सही-गलत की समझ विकसित होती है।
  • नैतिक मूल्यों पर चिंतन।
  • लॉरेंस कोहलबर्ग के अनुसार इस अवस्था में किशोर पारंपरिक नैतिकता से उत्तर-पारंपरिक स्तर की ओर बढ़ सकता है।

5. पहचान की खोज (Identity Formation)

  • “मैं कौन हूँ?” इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास।
  • करियर, रुचि एवं जीवन-लक्ष्य का निर्धारण।
  • मित्रों के साथ अधिक जुड़ाव।

6. स्वतंत्रता की भावना

  • माता-पिता से स्वतंत्र निर्णय लेने की इच्छा।
  • आत्मनिर्भर बनने की आकांक्षा।

(४) निष्कर्ष

किशोरावस्था परिवर्तन की संवेदनशील एवं निर्णायक अवस्था है। इस काल में शारीरिक परिपक्वता के साथ-साथ मानसिक, भावनात्मक एवं नैतिक विकास भी होता है। यदि परिवार, शिक्षक एवं समाज उचित मार्गदर्शन दें, तो किशोर का सर्वांगीण विकास संभव है। अतः इस अवस्था को समझदारी, सहानुभूति एवं संतुलित दृष्टिकोण से संभालना आवश्यक है।

 

 

(e) What is meant by development ? Explain it’s concept by differentiating with growth.

1(e) प्रश्न-विकास से क्या तात्पर्य है? इसकी व्याख्या वृद्धि से अलग करते हुए करें ।2023

उत्तर –

  • (१) भूमिका
  • (2) विकास से तात्पर्य
  • (3) वृद्धि से तात्पर्य
  • (4) विकास और वृद्धि में अंतर
  • (५) निष्कर्ष

(१) भूमिका

मानव जीवन में “विकास” एक सतत् और बहुआयामी प्रक्रिया है। यह केवल शारीरिक परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक और नैतिक पक्षों को भी सम्मिलित करता है। विकास को समझने के लिए इसे “वृद्धि” से अलग करना आवश्यक है, क्योंकि दोनों शब्दों का प्रयोग प्रायः समानार्थी रूप में कर दिया जाता है, जबकि दोनों में स्पष्ट अंतर है।

(2) विकास से तात्पर्य

विकास (Development) वह क्रमिक एवं निरंतर प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति में गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवर्तन होते हैं और उसकी क्षमताओं में परिपक्वता आती है।

मनोवैज्ञानिक एलिज़ाबेथ हरलॉक के अनुसार,
“विकास केवल आकार या संख्या में वृद्धि नहीं है, बल्कि यह एक प्रगतिशील एवं व्यवस्थित परिवर्तन है, जो व्यक्ति को अधिक जटिल एवं परिपक्व बनाता है।”

इसी प्रकार जेम्स ड्रेवर ने विकास को ऐसी प्रक्रिया माना है, जिसमें व्यक्ति की क्षमताओं और व्यवहार में क्रमबद्ध परिवर्तन होते हैं।

विकास की प्रमुख विशेषताएँ

  • विकास एक निरंतर प्रक्रिया है।
  • यह गर्भावस्था से मृत्यु तक चलता है।
  • इसमें गुणात्मक एवं मात्रात्मक दोनों परिवर्तन होते हैं।
  • विकास का क्रम सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है।
  • यह व्यक्तिगत भिन्नताओं से प्रभावित होता है।

(3) वृद्धि से तात्पर्य

वृद्धि (Growth) का अर्थ शरीर के आकार, लंबाई, वजन आदि में होने वाली मात्रात्मक वृद्धि से है। यह मुख्यतः शारीरिक परिवर्तन तक सीमित होती है।

उदाहरण:

  • बच्चे की लंबाई 120 सेमी से 130 सेमी होना।
  • वजन 25 किलोग्राम से 30 किलोग्राम होना।
  • वृद्धि को मापा जा सकता है, जैसे—किलोग्राम, सेंटीमीटर आदि में।

(4) विकास और वृद्धि में अंतर

आधार विकास (Development) वृद्धि (Growth)
स्वरूप गुणात्मक एवं मात्रात्मक परिवर्तन केवल मात्रात्मक परिवर्तन
क्षेत्र शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक आदि मुख्यतः शारीरिक
मापन सीधे मापना कठिन आसानी से मापा जा सकता है
अवधि जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया एक निश्चित आयु तक सीमित
उदाहरण तर्कशक्ति का विकास, नैतिक चेतना लंबाई, वजन में वृद्धि

स्पष्ट रूप से, वृद्धि विकास का एक भाग है, परंतु विकास वृद्धि से अधिक व्यापक अवधारणा है।

(५) निष्कर्ष

विकास एक व्यापक एवं सतत् प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति के व्यक्तित्व के सभी पक्षों में क्रमिक एवं गुणात्मक परिवर्तन होते हैं, जबकि वृद्धि केवल शारीरिक आकार में होने वाली मात्रात्मक बढ़ोतरी है। अतः वृद्धि विकास का अंग है, परंतु विकास केवल वृद्धि नहीं है।

 

 

(f) Describe the factors which affect language development in detail.

1(f) प्रश्न-भाषा विकास को प्रभावित करने वाले कारकों का विस्तार से वर्णन करें।2023

उत्तर-

(1) भूमिका

भाषा विकास बालक के समग्र विकास का एक महत्वपूर्ण आयाम है। भाषा के माध्यम से बालक अपने विचार, भावनाएँ तथा अनुभव व्यक्त करता है और सामाजिक संबंध स्थापित करता है। भाषा विकास केवल जैविक परिपक्वता का परिणाम नहीं है, बल्कि यह अनेक मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं पर्यावरणीय कारकों से प्रभावित होता है।

(2) भाषा विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक
1. जैविक एवं शारीरिक कारक

  • मस्तिष्क का विकास भाषा अर्जन का आधार है।
  • वाणी से संबंधित अंग (जीभ, होंठ, स्वरयंत्र) का समुचित विकास आवश्यक है।
  • यदि बालक में श्रवण दोष या वाणी दोष हो तो भाषा विकास प्रभावित होता है।
  • स्नायु तंत्र की परिपक्वता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

2. बुद्धि (Intelligence)

  • अधिक बुद्धि स्तर वाले बालक सामान्यतः भाषा शीघ्र सीखते हैं।
  • शब्द भंडार, वाक्य रचना और अभिव्यक्ति क्षमता बुद्धि से प्रभावित होती है।
  • मानसिक मंदता होने पर भाषा विकास धीमा हो सकता है।

3. पारिवारिक वातावरण

  • परिवार भाषा सीखने का प्रथम विद्यालय है।
  • घर में प्रयुक्त भाषा, वार्तालाप की शैली और माता-पिता की शिक्षा का स्तर प्रभाव डालता है।
  • जिन परिवारों में बालक से अधिक संवाद किया जाता है, वहाँ भाषा विकास बेहतर होता है।
  • उपेक्षा या संवादहीन वातावरण भाषा विकास को बाधित करता है।

4. सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश

  • समाज की भाषा, संस्कृति, परंपराएँ तथा सामाजिक संपर्क भाषा विकास को दिशा देते हैं।
  • शहरी वातावरण में शब्दावली अपेक्षाकृत अधिक विकसित होती है।
  • बहुभाषी परिवेश बालक को अनेक भाषाएँ सीखने का अवसर देता है।

5. आर्थिक स्थिति

  • समृद्ध परिवारों में शैक्षिक संसाधन (पुस्तकें, कहानियाँ, डिजिटल माध्यम) अधिक उपलब्ध होते हैं।
  • निम्न आर्थिक स्तर में संसाधनों की कमी भाषा विकास को प्रभावित कर सकती है।

6. विद्यालय एवं शिक्षक

  • विद्यालय में भाषा शिक्षण की विधि महत्वपूर्ण होती है।
  • शिक्षक की भाषा शैली, प्रोत्साहन और गतिविधि-आधारित शिक्षण भाषा विकास को बढ़ावा देते हैं।
  • कहानी, वाद-विवाद, नाटक आदि गतिविधियाँ भाषा कौशल विकसित करती हैं।

7. अनुकरण (Imitation)

  • बालक बड़ों की भाषा का अनुकरण करता है।
  • शुद्ध एवं स्पष्ट भाषा सुनने से बालक का उच्चारण एवं शब्द भंडार बेहतर होता है।

8. भावनात्मक स्थिति

  • सुरक्षित एवं प्रेमपूर्ण वातावरण में बालक निःसंकोच बोलता है।
  • भय, तनाव या असुरक्षा की भावना भाषा अभिव्यक्ति को बाधित कर सकती है।

9. लिंग भेद

  • सामान्यतः बालिकाओं में भाषा विकास बालकों की अपेक्षा थोड़ा शीघ्र देखा गया है।
  • यह अंतर जैविक एवं सामाजिक दोनों कारणों से हो सकता है।

10. मीडिया एवं तकनीकी साधन

  • रेडियो, टेलीविजन, मोबाइल, इंटरनेट आदि भाषा सीखने में सहायक हो सकते हैं।
  • उचित मार्गदर्शन के बिना अत्यधिक स्क्रीन समय भाषा विकास को सीमित कर सकता है।

(3) निष्कर्ष-

भाषा विकास एक जटिल एवं बहुआयामी प्रक्रिया है, जो जैविक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों से प्रभावित होती है। यदि बालक को अनुकूल वातावरण, उचित मार्गदर्शन एवं संवाद का अवसर प्रदान किया जाए, तो उसका भाषा विकास संतुलित एवं प्रभावी रूप से होता है। अतः अभिभावकों एवं शिक्षकों का कर्तव्य है कि वे बालक को समृद्ध भाषायी वातावरण प्रदान करें।

 

 

anobas
(g) Explain the ‘ecological theory’ propounded by Brofen Brenner in the context of socialization.

1(g) प्रश्न-ब्रोफेन ब्रेनर द्वारा प्रतिपादित सामाजीकरण के संदर्भ में स्थापित पारिस्थितिक सिद्धान्तों की व्याख्या करें । 2023

उत्तर-
(1) भूमिका

प्रसिद्ध विकासात्मक मनोवैज्ञानिक Urie Bronfenbrenner ने मानव विकास को समझाने के लिए पारिस्थितिक तंत्र सिद्धान्त (Ecological Systems Theory) प्रतिपादित किया। उनके अनुसार बालक का सामाजीकरण केवल परिवार या विद्यालय तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अनेक पर्यावरणीय तंत्रों के पारस्परिक प्रभाव का परिणाम है।

यह सिद्धान्त बताता है कि बालक विभिन्न स्तरों के पर्यावरण से घिरा होता है, जो उसके व्यवहार, व्यक्तित्व एवं सामाजिक विकास को प्रभावित करते हैं।

(2) पारिस्थितिक तंत्र के प्रमुख स्तर
1. सूक्ष्म तंत्र (Microsystem)

यह बालक का निकटतम एवं प्रत्यक्ष परिवेश है।
उदाहरण: परिवार, विद्यालय, मित्र, पड़ोस।
➡ यहाँ बालक का प्रत्यक्ष संपर्क होता है और यहीं से सामाजीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ होती है।

2. मध्य तंत्र (Mesosystem)

यह विभिन्न सूक्ष्म तंत्रों के बीच संबंध को दर्शाता है।
उदाहरण: माता-पिता और शिक्षक के बीच समन्वय।
➡ यदि इन तंत्रों में सामंजस्य हो, तो बालक का सामाजिक विकास सकारात्मक होता है।

3. बहिर्तंत्र (Exosystem)

यह वह तंत्र है जिसमें बालक प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं होता, परंतु उसका प्रभाव उस पर पड़ता है।
उदाहरण: माता-पिता का कार्यस्थल, मीडिया, स्थानीय प्रशासन।
➡ अप्रत्यक्ष रूप से बालक के व्यवहार और अनुभवों को प्रभावित करता है।

4. व्यापक तंत्र (Macrosystem)

इसमें समाज की संस्कृति, मूल्य, परंपराएँ, कानून और सामाजिक मान्यताएँ सम्मिलित हैं।
➡ यह सबसे बाहरी स्तर है, जो बालक के सामाजीकरण को व्यापक दिशा प्रदान करता है।

5. काल तंत्र (Chronosystem)

यह समय के साथ होने वाले परिवर्तनों को दर्शाता है।
उदाहरण: आर्थिक परिवर्तन, पारिवारिक संरचना में बदलाव, तकनीकी विकास।
➡ जीवन की घटनाएँ और ऐतिहासिक परिवर्तन सामाजीकरण की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।

(3) सामाजीकरण के संदर्भ में महत्व

यह सिद्धान्त विकास को बहुआयामी दृष्टिकोण से समझाता है।

बालक और पर्यावरण के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट करता है।

शिक्षा, परामर्श और बाल-पालन में अत्यंत उपयोगी है।

यह बताता है कि बालक का व्यवहार केवल व्यक्तिगत गुणों का परिणाम नहीं, बल्कि पर्यावरणीय प्रभावों का संयुक्त परिणाम है।

(4) निष्कर्ष

ब्रोफेनब्रेनर का पारिस्थितिक सिद्धान्त सामाजीकरण को समझने का एक व्यापक एवं वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है। यह सिद्धान्त स्पष्ट करता है कि बालक का सामाजिक विकास अनेक स्तरों के पर्यावरणीय तंत्रों के संयुक्त प्रभाव से होता है। अतः बालक के समुचित सामाजीकरण के लिए परिवार, विद्यालय एवं समाज सभी की समन्वित भूमिका आवश्यक है।




Section-B

(Short answer type questions)
(लघु उत्तरीय प्रश्न)

 

2. Answer any four questions of the following:
निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दें । 5×4=20

2(a)Q- Role of ‘peer groups’ in socialization.

2(a) प्रश्न- समाजीकरण में ‘साथियों के समूह’ की भूमिका ।2023

उत्तर –
भूमिका :
समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति समाज के मूल्य, मानदंड, व्यवहार और संस्कृति को सीखता है। इस प्रक्रिया में परिवार, विद्यालय, मीडिया आदि के साथ-साथ साथियों का समूह (Peer Group) भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सामाजिक  साथियों के समूह की भूमिका :

सामाजिक कौशल का विकास –
समान आयु के साथियों के बीच रहने से बालक में सहयोग, प्रतिस्पर्धा, नेतृत्व, समायोजन एवं संचार कौशल का विकास होता है।

स्वतंत्र पहचान का निर्माण –
किशोरावस्था में बालक अपने व्यक्तित्व और पहचान का निर्माण साथियों के माध्यम से करता है। वह अपने विचारों और रुचियों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करना सीखता है।

मूल्यों एवं मानदंडों का अधिग्रहण –
साथी समूह अपने नियम और अपेक्षाएँ बनाते हैं। इनके माध्यम से बालक सामाजिक नियमों, अनुशासन तथा समूह-व्यवहार को सीखता है।

भावनात्मक सहयोग –
मित्र कठिन परिस्थितियों में भावनात्मक सहारा प्रदान करते हैं, जिससे आत्मविश्वास और आत्मसम्मान में वृद्धि होती है।

अनुकरण एवं व्यवहार परिवर्तन –
बालक अपने साथियों के व्यवहार का अनुकरण करता है। इससे अच्छे या बुरे दोनों प्रकार के व्यवहार विकसित हो सकते हैं, इसलिए साथियों का चयन महत्वपूर्ण होता है।

निष्कर्ष :
इस प्रकार, साथियों का समूह समाजीकरण का एक प्रभावी माध्यम है। यह बालक के व्यक्तित्व, व्यवहार और सामाजिक अनुकूलन को गहराई से प्रभावित करता है। अतः समाजीकरण की प्रक्रिया में साथियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
(b) Importance of ‘media’ for adolescence development.

2(b) प्रश्न- किशोर के विकास हेतु संचार माध्यमों की महत्व | 2023

उत्तर –
(1) भूमिका

किशोरावस्था मानव जीवन की वह अवस्था है जिसमें तीव्र शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं भावनात्मक परिवर्तन होते हैं। इस अवस्था में किशोर नई जानकारियों, आदर्शों और अनुभवों की खोज करता है। ऐसे में संचार माध्यम (जैसे– समाचार पत्र, रेडियो, टेलीविजन, इंटरनेट, सोशल मीडिया आदि) उसके व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

(2) संचार माध्यमों का महत्त्व

1. ज्ञान-विस्तार में सहायक
संचार माध्यमों के द्वारा किशोर देश-विदेश की घटनाओं, विज्ञान, तकनीक, खेल, राजनीति आदि विषयों की जानकारी प्राप्त करता है। इससे उसका सामान्य ज्ञान एवं बौद्धिक विकास होता है।

2. सामाजिक जागरूकता का विकास
समाज में चल रही समस्याओं, अधिकारों एवं कर्तव्यों की जानकारी संचार माध्यमों से मिलती है, जिससे सामाजिक चेतना विकसित होती है।

3. व्यक्तित्व निर्माण में सहायक
महान व्यक्तियों के जीवन, प्रेरणादायक कथाओं एवं उपलब्धियों की जानकारी से किशोर प्रेरित होता है और सकारात्मक व्यक्तित्व का निर्माण करता है।

4. भाषा एवं संप्रेषण कौशल का विकास
टीवी, समाचार पत्र और इंटरनेट के माध्यम से किशोर की भाषा-शैली, शब्द-भंडार और अभिव्यक्ति क्षमता में वृद्धि होती है।

5. करियर मार्गदर्शन
विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार अवसरों और करियर विकल्पों की जानकारी संचार माध्यमों से प्राप्त होती है, जिससे किशोर अपने भविष्य की योजना बना सकता है।

6. मनोरंजन एवं रचनात्मकता
संगीत, कला, खेल आदि कार्यक्रम किशोरों के मानसिक तनाव को कम करते हैं तथा उनकी रचनात्मकता को बढ़ाते हैं।

7. नैतिक एवं सांस्कृतिक विकास
सकारात्मक और मूल्यपरक कार्यक्रमों के माध्यम से किशोर नैतिक मूल्यों एवं सांस्कृतिक परंपराओं को समझता है।

(3) निष्कर्ष-

अतः स्पष्ट है कि संचार माध्यम किशोर के समग्र विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि इनका उपयोग संतुलित एवं सकारात्मक रूप से किया जाए तो ये किशोर के बौद्धिक, सामाजिक, नैतिक एवं व्यावसायिक विकास के प्रभावी साधन बन सकते हैं।
(c) Anecdotal Records of students in educational institutions.

2(c) प्रश्न- शैक्षिक संस्थानों में विद्यार्थियों का उपाख्यानात्मक अभिलेख । 2023

उत्तर-
(1) भूमिका

शैक्षिक प्रक्रिया केवल परीक्षा परिणामों तक सीमित नहीं होती, बल्कि विद्यार्थी के समग्र विकास (बौद्धिक, सामाजिक, भावनात्मक एवं नैतिक) का आकलन भी आवश्यक है। इसी उद्देश्य से शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों के व्यवहार, रुचि, उपलब्धि एवं विशिष्ट घटनाओं का क्रमबद्ध लेखा-जोखा रखा जाता है, जिसे उपाख्यानात्मक अभिलेख कहा जाता है।

(2) उपाख्यानात्मक अभिलेख का अर्थ

उपाख्यानात्मक अभिलेख वह लिखित विवरण है जिसमें शिक्षक किसी विद्यार्थी के व्यवहार या किसी विशेष घटना का तथ्यात्मक, संक्षिप्त एवं निष्पक्ष वर्णन करता है।यह विवरण किसी विशेष परिस्थिति में विद्यार्थी की प्रतिक्रिया, आचरण या उपलब्धि को दर्शाता है।

(3) उपाख्यानात्मक अभिलेख की विशेषताएँ

  • तथ्यपरकता – इसमें केवल देखी गई घटना का उल्लेख होता है, व्यक्तिगत मत या अनुमान नहीं।
  • विशिष्ट घटना का वर्णन – यह सामान्य व्यवहार नहीं, बल्कि किसी खास घटना पर आधारित होता है।
  • संक्षिप्तता – विवरण छोटा और स्पष्ट होता है।
  • तिथि एवं परिस्थिति का उल्लेख – घटना कब और किस परिस्थिति में हुई, यह अंकित किया जाता है।
  • व्यक्तिगत विकास पर केंद्रित – यह विद्यार्थी के व्यक्तित्व के किसी विशेष पहलू को दर्शाता है।

(4) शैक्षिक संस्थानों में उपाख्यानात्मक अभिलेख का महत्त्व

  • व्यक्तिगत भिन्नताओं की पहचान – प्रत्येक विद्यार्थी की विशेषताओं और समस्याओं को समझने में सहायता मिलती है।
  • मार्गदर्शन एवं परामर्श में सहायक – शिक्षक उचित परामर्श प्रदान कर सकता है।
  • व्यवहार सुधार में उपयोगी – अनुशासनात्मक या सकारात्मक व्यवहार दोनों का रिकॉर्ड भविष्य के निर्णयों में सहायक होता है।
  • अभिभावकों से संवाद में सहायक – विद्यार्थी की प्रगति या समस्या को प्रमाण सहित समझाया जा सकता है।
  • समग्र मूल्यांकन का आधार – केवल अंक आधारित नहीं, बल्कि व्यवहारिक एवं सामाजिक पक्ष का भी आकलन संभव होता है।

(5) उपाख्यानात्मक अभिलेख का उदाहरण

विद्यार्थी का नाम: अमित कुमार
तिथि: 20 फरवरी 2026
घटना: कक्षा में समूह कार्य के दौरान अमित ने अपने साथियों का नेतृत्व किया तथा सभी को कार्य में सम्मिलित किया।
टिप्पणी: नेतृत्व क्षमता एवं सहयोगात्मक व्यवहार प्रदर्शित किया।

(6) निष्कर्ष

उपाख्यानात्मक अभिलेख शैक्षिक संस्थानों में विद्यार्थियों के समग्र विकास को समझने का एक प्रभावी साधन है। यह शिक्षक को विद्यार्थी के व्यवहार एवं व्यक्तित्व के सूक्ष्म पहलुओं का विश्लेषण करने में सहायता प्रदान करता है तथा मार्गदर्शन एवं परामर्श प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाता है।

(d) Importance of storytelling as a teaching method.

2(d) प्रश्न- शिक्षण विधि के रूप में ‘कहानीकथन’ की महत्ता । 2023

उत्तर :
कहानीकथन (Storytelling) एक प्रभावी एवं रोचक शिक्षण विधि है, जिसके माध्यम से शिक्षक विषय-वस्तु को कहानी के रूप में प्रस्तुत करता है। यह विधि विशेष रूप से बालकों एवं किशोरों के लिए आकर्षक एवं प्रभावशाली मानी जाती है।

मुख्य महत्त्व :

  • रुचि एवं ध्यान आकर्षित करता है – कहानी के माध्यम से विद्यार्थी विषय में अधिक रुचि लेते हैं और ध्यानपूर्वक सुनते हैं।
  • कल्पनाशक्ति का विकास – कहानी विद्यार्थियों की सृजनात्मकता एवं कल्पनाशक्ति को विकसित करती है।
  • भाषा विकास में सहायक – शब्द-भंडार, अभिव्यक्ति एवं सुनने की क्षमता में वृद्धि होती है।
  • नैतिक मूल्यों का विकास – प्रेरणादायक कहानियाँ नैतिक शिक्षा प्रदान करती हैं।
  • जटिल विषयों को सरल बनाना – कठिन विषयों को कहानी के माध्यम से सरल एवं समझने योग्य बनाया जा सकता है।

निष्कर्ष :
अतः कहानीकथन शिक्षण की एक प्रभावी विधि है, जो विद्यार्थियों के बौद्धिक, भाषाई एवं नैतिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
(e) Significance of ‘competition’ and ‘cooperation’ for a healthy development.

2(e) प्रश्न- एक स्वस्थ विकास हेतु ‘प्रतिस्पर्धा’ एवम् ‘सहायता’ की सार्थकता |2023

उत्तर :
स्वस्थ विकास से आशय बालक/किशोर के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं भावनात्मक विकास से है। इस विकास प्रक्रिया में ‘प्रतिस्पर्धा’ (Competition) और ‘सहायता’ (Cooperation/Support) दोनों का महत्वपूर्ण स्थान है।

(1) प्रतिस्पर्धा की सार्थकता :

  • यह बालक को उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए प्रेरित करती है।
  • आत्मविश्वास एवं आत्मनिर्भरता का विकास करती है।
  • लक्ष्य प्राप्ति की भावना को प्रबल बनाती है।
  • परिश्रम एवं अनुशासन की आदत विकसित करती है।

(2) सहायता की सार्थकता :

  • सहयोग की भावना एवं सामाजिक गुणों का विकास करती है।
  • भावनात्मक सुरक्षा एवं आत्मीयता प्रदान करती है।
  • समूह में कार्य करने की क्षमता विकसित करती है।
  • तनाव एवं असफलता की स्थिति में संतुलन बनाए रखने में सहायक होती है।

निष्कर्ष :
अतः स्वस्थ विकास के लिए प्रतिस्पर्धा और सहायता दोनों आवश्यक हैं। संतुलित प्रतिस्पर्धा प्रगति की प्रेरणा देती है, जबकि सहयोग एवं सहायता सामाजिक समरसता और भावनात्मक संतुलन को सुदृढ़ करती है।
(f) Individual difference among children.

2(f) प्रश्न- बालकों के बीच वैयक्तिक अंतर । 2023

उत्तर :
वैयक्तिक अंतर (Individual Differences) से आशय बालकों के बीच पाई जाने वाली शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक एवं बौद्धिक विभिन्नताओं से है। प्रत्येक बालक अपनी क्षमताओं, रुचियों, अभिरुचियों, व्यक्तित्व तथा व्यवहार में अन्य बालकों से भिन्न होता है।

बालकों के बीच वैयक्तिक अंतर

  • बौद्धिक अंतर – बुद्धि, स्मरण शक्ति, चिंतन एवं समस्या समाधान क्षमता में भिन्नता।
  • शारीरिक अंतर – ऊँचाई, वजन, स्वास्थ्य एवं शारीरिक विकास में अंतर।
  • भावनात्मक अंतर – संवेदनशीलता, धैर्य, आत्मविश्वास आदि में भिन्नता।
  • सामाजिक अंतर – मिलनसारिता, नेतृत्व क्षमता एवं सामाजिक व्यवहार में अंतर।
  • रुचि एवं अभिरुचि का अंतर – विभिन्न विषयों एवं गतिविधियों के प्रति अलग-अलग रुचि।

निष्कर्ष :
अतः बालकों के बीच वैयक्तिक अंतर स्वाभाविक एवं सामान्य हैं। शिक्षक को इन भिन्नताओं को ध्यान में रखकर शिक्षण कार्य करना चाहिए, ताकि प्रत्येक बालक का समुचित एवं संतुलित विकास हो सके।

Section-C
(Objective type questions)
(वस्तुनिष्ठ प्रश्न)

खण्ड -C वस्तुनिष्ट प्रश्न -२०२३

3. Choose the correct answer of the following : 2 × 5 = 10
निम्नलिखित में से सही उत्तर का चयन करें :

3(a)———–change indicates child’s physical growth.
3(a) बालक के ———-परिवर्तन, शारीरिक वृद्धि का संकेत है।

(i) Positive -धनात्मक
(ii) Negative -नकारात्मक
(iii) Qualitative -गुणात्मक
(iv) Quantitative -मात्रात्मक

उत्तर –Quantitative -मात्रात्मक

3(b) ——-stage is also called ‘dirty age’.
3(b) ‘गंदी आयु’ की अवस्था भी —–अवस्था को कहा जाता है |

(i) Infancy -शैशवास्था
(ii) Childhood -बाल्यावस्था अवस्था को
(ni) Adolescence किशोरावस्था-
(iv) Adulthood -प्रौढ़ावस्था

उत्तर – Infancy -शैशवास्था

(c)———– has said, “Adolescence is a period of great stress, strain, storm and strike”.
3(c) ———- ने कहा, “किशोरावस्था एक तनाव, संघर्ष, तूफान तथा विरोध का काल / अवस्था है” ।

(i) Jean Piaget – जीन पियाजे
(ii) Maslow – मैसलो
(iii) Stanley Hall – स्टैनली हॉल
(iv) Skinner – स्कीनर

उत्तर –(iii) Stanley Hall – स्टैनली हॉल

3(d)——– stage indicates “Recapitulation of Infancy”.
3(d)——–अवस्था में “शैशवास्था की पुनरावृत्ति” की झलक मिलती है।

(i) Oldage -वृद्धावस्था
(ii) Adolescence- किशोरावस्था
(iii) Childhood – बाल्यावस्था
(iv) Adulthood – प्रौढावस्था

उत्तर –(ii) Adolescence- किशोरावस्था

3(e) ———- does not indicate child’s emotion.
3(e) बालक के संवेग को ———-इंगित नहीं करता है।

(i) Curiosity -जिज्ञासा
(ii) Sorrow – दुख
(iii) Tolerance -सहनशीलता –
(iv) Excitement -उत्तेजना

उत्तर-(iii) Tolerance -सहनशीलता

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