F-8 | हिंदी का शिक्षण शास्त्र -1 (प्राथमिक स्तर ) | Hindi Ka Shikshan Shastra -1

हिंदी का शिक्षणशास्त्र -1 ( प्राथमिक स्तर )

हिंदी का शिक्षण शास्त्र -1 (प्राथमिक स्तर) नोट्स 

Table of Contents

Hindi Ka Shikshan Shastra -1 (Parathmik Star) Notes

 

 विषय   हिंदी का शिक्षण शास्त्र -1 (प्राथमिक स्तर )
SUBJECT  Hindi Ka Shikshan Shastra -1 (Parathmik Star )
COURSE BIHAR D.El.Ed. 1ST  YEAR
PAPER CODE F-8

VVI NOTES  के इस पेज में बिहार डी.एल.एड 1st ईयर पेपर F-8  ” हिंदी का शिक्षण शास्त्र -1 (प्राथमिक स्तर ) ”  से सम्बन्धित महत्वपर्ण प्रश्नों के उत्तर जोड़े  गये है | साथ ही इस विषय से सम्बन्धित  नोट्स, बुक, गाइड  के pdf भी सामिल किया जयेगा |




 

हिंदी का शिक्षणशास्त्र -1 सिलेबस – नोट्रस

इकाई 1 : PREMIUM NOTES

इकाई 1 : प्राथमिक स्तर पर हिन्दी : प्रकृति एवं उसके शिक्षण के उद्देश्य

    • बच्चों की दुनिया में हिन्दी।
    • हिन्दी भाषा की प्रकृति एवं प्राथमिक स्तर की हिन्दी की समझ।
    • राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 और बिहार पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2008 के आलोक में हिन्दी भाषा के उद्देश्यों को समझना।

प्रश्न(01): प्राथमिक स्तर पर हिन्दी के प्रकृति एवं उसके शिक्षण के उद्वेश्यो का वर्णन करे ?  

उत्तर –

  • भूमिका 
  • प्राथमिक स्तर पर हिंदी की प्रकृति
  • प्राथमिक स्तर पर हिंदी शिक्षण के उद्देश्य
  • निष्कर्ष

भूमिका –

प्राथमिक स्तर पर हिन्दी भाषा शिक्षण बालक के समग्र विकास का आधार होता है, जहाँ बच्चा भाषा के माध्यम से अपने विचारों को समझना और व्यक्त करना सीखता है। हिन्दी की प्रकृति सरल, स्वाभाविक एवं अनुभव आधारित होने के कारण इसका शिक्षण भी बालक-केंद्रित होना चाहिए, जिससे बच्चों के बौद्धिक, सामाजिक एवं भाषाई विकास को सुदृढ़ बनाया जा सके।

1. प्राथमिक स्तर पर हिंदी की प्रकृति
प्राथमिक स्तर पर हिंदी प्रकृति निम्नलिखित है:

भाषा कौशल प्रधान: यह व्याकरण के नियमों का ज्ञान देने वाला विषय न होकर, चारों भाषा कौशलों (सुनना, बोलना, पढ़ना, लिखना) के विकास का माध्यम है।

सक्रिय एवं प्रयोगात्मक: यह केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं है, बल्कि दैनिक जीवन में बातचीत, कहानी, कविता, प्रश्नोत्तर आदि के माध्यम से सीखी जाने वाली सजीव भाषा है।

मातृभाषा/परिवेशीय भाषा: अधिकांश बच्चों के लिए यह उनकी मातृभाषा या आस-पास बोली जाने वाली भाषा होती है, इसलिए इसका स्वरूप स्वाभाविक एवं सहज होता है।

बहु-विविधतापूर्ण: इस स्तर पर भाषा में स्थानीय बोलियों (अवधी, ब्रज, भोजपुरी आदि) का प्रभाव होता है। शिक्षण में मानक हिंदी पर जोर दिया जाता है, पर बोलियों का अपमान नहीं किया जाता।

समग्र (होलिस्टिक): प्राथमिक स्तर पर हिंदी का अर्थ केवल पाठ्यपुस्तक नहीं है, बल्कि कहानी, कविता, नाटक, गीत, पहेलियाँ, फिल्म, रेडियो आदि सभी इसके स्रोत हैं।

व्याकरण गौण: इस स्तर पर व्याकरण को अलग विषय की तरह नहीं पढ़ाया जाता, बल्कि सुनने-बोलने के दौरान वाक्य संरचना का स्वाभाविक ज्ञान होता है (अनुशासनात्मक व्याकरण के स्थान पर आनुभविक व्याकरण)।

2. प्राथमिक स्तर पर हिंदी शिक्षण के उद्देश्य
प्राथमिक स्तर पर हिंदी शिक्षण के उद्देश्यों को दो भागों में बाँटा जाता है: सामान्य उद्देश्य (कक्षा 1-5 के समग्र विकास हेतु) और कौशल-आधारित उद्देश्य (विशिष्ट भाषा कौशल हेतु)।

(क) सामान्य उद्देश्य:

अभिव्यक्ति का विकास: बच्चे अपने मन के भावों, विचारों और अनुभवों को स्पष्ट एवं सरल हिंदी में व्यक्त कर सकें।

चिंतन एवं कल्पना शक्ति का विकास: कहानियों, कविताओं के माध्यम से बच्चों की कल्पनाशीलता और तार्किक क्षमता को बढ़ावा देना।

सृजनात्मकता का विकास: बच्चे अपनी छोटी-छोटी बातें, कविताएँ या कहानियाँ स्वयं गढ़ सकें।

सांस्कृतिक चेतना का निर्माण: हिंदी साहित्य (लोककथाएँ, दोहे, कहानियाँ) के माध्यम से भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और परंपराओं से जोड़ना।

आत्मविश्वास में वृद्धि: भाषा के अभ्यास से बच्चा कक्षा में निडर होकर बोले, प्रश्न करे और अपनी बात रखे।

(ख) कौशल-आधारित उद्देश्य (भाषा के चार कौशल):

क्रम कौशल उद्देश्य
1. सुनना (Listening) – परियों की कहानी, निर्देश या प्रश्न को ध्यानपूर्वक सुनना।
– सुनकर उसका अर्थ ग्रहण करना और प्रश्नों के उत्तर देना।
– विभिन्न ध्वनियों (जानवरों, वाद्यों) में अंतर करना।
2. बोलना (Speaking) – अपनी बात स्पष्ट एवं सही उच्चारण के साथ कहना।
– कक्षा में चर्चा, प्रश्नोत्तर, कविता वाचन में भाग लेना।
– मौखिक रूप से कहानी सुनाना या अनुभव बाँटना।
3. पढ़ना (Reading) – वर्णमाला, मात्राओं और शब्दों को पहचानना।
– सरल वाक्यों को बिना अटके, सही लय (छंद) और अर्थ समझते हुए पढ़ना।
– कहानी/कविता का आनंद लेना और भावों को समझना (सस्वर पाठ)।
4. लिखना (Writing) – अक्षरों को सही दिशा, आकार और रेखा में लिखना (लेखन कला)।
– श्रुतलेख द्वारा सही वर्तनी का अभ्यास।
– अपने विचारों को 2-3 वाक्यों या छोटे पैराग्राफ में लिखना।

निष्कर्ष –
प्राथमिक स्तर पर हिंदी शिक्षण का मुख्य उद्देश्य भाषा को ज्ञान के विषय के रूप में नहीं, बल्कि अर्जन (Acquisition) के रूप में सीखना है। यह बच्चे को साक्षरता (Literacy) प्रदान करने की प्रक्रिया है, जहाँ वह सीखता है कि:

भाषा सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि जीवन में है।

गलतियाँ करना सीखने का हिस्सा है, सज़ा नहीं।

मौखिक भाषा (बोलचाल) लिखित भाषा (पढ़ना-लिखना) का आधार है।
 




प्रश्न(02): बच्चों की दुनिया में हिन्दी की भूमिका का वर्णन कीजिए।

उत्तर –

  • भूमिका
  • बच्चों की दुनिया में हिन्दी की भूमिका
  • निष्कर्ष

भूमिका

बच्चों की दुनिया में हिन्दी” का आशय यह समझना है कि बच्चों के दैनिक जीवन, अनुभव, भावनाओं और सीखने की प्रक्रिया में हिन्दी भाषा किस प्रकार स्वाभाविक रूप से समाहित होती है। हिन्दी केवल एक विषय नहीं, बल्कि बच्चों के सोचने, समझने और अभिव्यक्त करने का प्रमुख माध्यम है।

बच्चों की दुनिया में हिन्दी की भूमिका

I. बच्चों की भाषा के रूप में हिन्दी

बच्चे अपने प्रारम्भिक जीवन में जिस भाषा को घर-परिवार और परिवेश से सीखते हैं, वह उनकी मातृभाषा होती है। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी बच्चों की पहली भाषा होती है। इसी भाषा में वे अपने विचारों, भावनाओं और आवश्यकताओं को व्यक्त करते हैं, जिससे सीखना सहज और प्रभावी बनता है।

II. अनुभवों से जुड़ी भाषा

बच्चों की दुनिया खेल, परिवार, स्कूल और आसपास के वातावरण से निर्मित होती है। हिन्दी भाषा इन्हीं अनुभवों से जुड़ी होती है। जब शिक्षक बच्चों के अनुभवों से संबंधित शब्दों, कहानियों और उदाहरणों का प्रयोग करते हैं, तो बच्चे आसानी से सीखते हैं और विषय को बेहतर समझते हैं।

III. अभिव्यक्ति का माध्यम

हिन्दी बच्चों को अपनी भावनाओं, कल्पनाओं और विचारों को व्यक्त करने का अवसर देती है। कविता, कहानी, चित्र-वर्णन, संवाद आदि के माध्यम से बच्चे अपनी सृजनात्मकता को विकसित करते हैं। इससे उनकी भाषाई और मानसिक क्षमता दोनों का विकास होता है।

IV. सांस्कृतिक जुड़ाव

हिन्दी भाषा बच्चों को उनके समाज और संस्कृति से जोड़ती है। लोककथाएँ, कहावतें, त्योहारों की कहानियाँ और परंपराएँ बच्चों को अपनी जड़ों से परिचित कराती हैं, जिससे उनमें सामाजिक और नैतिक मूल्यों का विकास होता है।

V. सीखने को सरल बनाना

जब शिक्षा हिन्दी में दी जाती है, तो बच्चों के लिए नई जानकारी को समझना आसान हो जाता है। मातृभाषा में शिक्षा देने से जटिल अवधारणाएँ भी सरल रूप में समझ में आती हैं और बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है।

VI. रचनात्मकता और कल्पनाशक्ति का विकास

हिन्दी के माध्यम से बच्चे कहानी लिखना, कविता बनाना, नाटक करना आदि गतिविधियों में भाग लेते हैं। इससे उनकी कल्पनाशक्ति और रचनात्मक सोच का विकास होता है।

निष्कर्ष

बच्चों की दुनिया में हिन्दी एक जीवंत और महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह केवल भाषा नहीं, बल्कि बच्चों के समग्र विकास का आधार है। हिन्दी के माध्यम से बच्चे न केवल ज्ञान प्राप्त करते हैं, बल्कि अपनी संस्कृति, समाज और स्वयं की पहचान से भी जुड़ते हैं। इसलिए प्राथमिक स्तर पर हिन्दी का शिक्षण बच्चों के अनुभवों और जीवन से जोड़कर करना अत्यंत आवश्यक है।

 

प्रश्न(03): प्राथमिक स्तर पर हिन्दी की समझ की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

  • भूमिका
  • प्राथमिक स्तर पर हिन्दी की समझ
  • निष्कर्ष

भूमिका

प्राथमिक स्तर पर हिन्दी की समझ का तात्पर्य बच्चों में भाषा को सुनने, समझने, बोलने, पढ़ने और लिखने की प्रारम्भिक क्षमता विकसित करना है। यह वह अवस्था है जहाँ भाषा अधिगम की नींव रखी जाती है और बच्चे भाषा को व्यवहारिक रूप में प्रयोग करना सीखते हैं।

प्राथमिक स्तर पर हिन्दी की समझ

I. हिन्दी की समझ की अवधारणा

प्राथमिक स्तर पर हिन्दी की समझ का अर्थ है कि बच्चे सरल शब्दों, वाक्यों और भावों को आसानी से ग्रहण कर सकें तथा उन्हें अपने दैनिक जीवन में प्रयोग कर सकें। इस स्तर पर भाषा केवल पाठ्यवस्तु नहीं, बल्कि संप्रेषण का माध्यम होती है।

II. भाषा कौशलों का विकास

हिन्दी की समझ चार प्रमुख भाषा कौशलों—श्रवण, वाचन (पठन), वाचन (बोलना) और लेखन—पर आधारित होती है। प्रारम्भ में बच्चे सुनकर और बोलकर भाषा सीखते हैं, इसके बाद पढ़ना और लिखना सीखते हैं। इन कौशलों का क्रमिक एवं संतुलित विकास आवश्यक है।

III. समझ आधारित अधिगम

इस स्तर पर हिन्दी शिक्षण का उद्देश्य रटने के बजाय समझ विकसित करना होता है। जब बच्चे शब्दों और वाक्यों के अर्थ को समझते हैं, तभी वे उनका सही एवं प्रभावी उपयोग कर पाते हैं।

IV. मातृभाषा एवं परिवेश का महत्व

बच्चों की मातृभाषा और उनका परिवेश हिन्दी की समझ को मजबूत बनाते हैं। यदि शिक्षण बच्चों की स्थानीय भाषा और अनुभवों से जुड़ा हो, तो वे नई भाषा को अधिक सरलता से सीखते हैं।

V. रुचिकर एवं क्रियात्मक शिक्षण

कहानी, कविता, खेल, चित्र, अभिनय और संवाद जैसी गतिविधियाँ हिन्दी की समझ को बढ़ाने में सहायक होती हैं। इससे बच्चे सीखने में रुचि लेते हैं और भाषा का प्रयोग सहज रूप से करते हैं।

VI. शिक्षक की भूमिका

शिक्षक को मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हुए बच्चों को अधिक से अधिक बोलने, सुनने और अभिव्यक्त करने के अवसर देने चाहिए। सरल भाषा का प्रयोग और प्रोत्साहन बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ाता है।

निष्कर्ष

अतः प्राथमिक स्तर पर हिन्दी की समझ बच्चों के समग्र विकास की आधारशिला है। यह न केवल भाषा कौशलों का विकास करती है, बल्कि बच्चों की सोचने, समझने और अभिव्यक्त करने की क्षमता को भी सुदृढ़ बनाती है। इसलिए हिन्दी शिक्षण को बाल-केंद्रित, सरल और अनुभव आधारित बनाना आवश्यक है।




उत्तर –

  • भूमिका
  • राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 के आलोक में हिन्दी भाषा के उद्देश्यों
  • निष्कर्ष

भूमिका

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के अनुसार भाषा शिक्षण का उद्देश्य केवल पढ़ना-लिखना सिखाना नहीं, बल्कि बच्चों में भाषा के माध्यम से सोचने, समझने, अभिव्यक्त करने और सामाजिक-सांस्कृतिक जुड़ाव विकसित करना है। हिन्दी भाषा को बाल-केंद्रित, गतिविधि-आधारित और अनुभवात्मक ढंग से सिखाने पर विशेष बल दिया गया है।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 के आलोक में हिन्दी भाषा के उद्देश्यों

I. संप्रेषणीय क्षमता का विकास

NCF 2005 के अनुसार हिन्दी शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य बच्चों में प्रभावी संप्रेषण क्षमता विकसित करना है। बच्चे अपनी बात स्पष्ट रूप से बोल सकें, दूसरों की बात समझ सकें और विभिन्न परिस्थितियों में भाषा का सही उपयोग कर सकें।

II. भाषा कौशलों का समग्र विकास

हिन्दी के चारों भाषा कौशल—श्रवण, बोलना, पठन और लेखन—का संतुलित विकास आवश्यक माना गया है। NCF 2005 इस बात पर जोर देता है कि ये सभी कौशल एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और इन्हें समग्र रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

III. समझ आधारित अधिगम

इस रूपरेखा में रटने के बजाय समझ पर आधारित शिक्षण को महत्व दिया गया है। बच्चों को भाषा के अर्थ, संदर्भ और प्रयोग को समझने के अवसर दिए जाने चाहिए ताकि वे भाषा का सृजनात्मक उपयोग कर सकें।

IV. रचनात्मकता और अभिव्यक्ति का विकास

हिन्दी शिक्षण के माध्यम से बच्चों की कल्पनाशक्ति, सृजनात्मकता और अभिव्यक्ति क्षमता को विकसित करना एक प्रमुख उद्देश्य है। कहानी, कविता, नाटक, चित्र-वर्णन आदि के माध्यम से बच्चों को अपनी बात व्यक्त करने के अवसर दिए जाते हैं।

V. बहुभाषिकता को प्रोत्साहन

NCF 2005 बहुभाषिकता को बढ़ावा देता है। हिन्दी शिक्षण में बच्चों की मातृभाषा और अन्य भाषाओं को भी सम्मान दिया जाता है, जिससे भाषा सीखना अधिक सहज और प्रभावी बनता है।

VI. सामाजिक एवं सांस्कृतिक संवेदनशीलता का विकास

हिन्दी भाषा के माध्यम से बच्चों को समाज, संस्कृति और विविधता के प्रति संवेदनशील बनाना भी एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। लोककथाएँ, साहित्य और सामाजिक संदर्भ बच्चों में नैतिक मूल्यों का विकास करते हैं।

VII. सीखने को आनंददायक बनाना

NCF 2005 के अनुसार हिन्दी शिक्षण को बोझिल न बनाकर आनंददायक बनाया जाना चाहिए। खेल, गतिविधि, चर्चा और सहभागिता के माध्यम से सीखने को रोचक बनाया जाता है।

VIII. आलोचनात्मक सोच का विकास

हिन्दी भाषा के माध्यम से बच्चों में प्रश्न पूछने, तर्क करने और विश्लेषण करने की क्षमता विकसित करना भी एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है, ताकि वे सक्रिय और जागरूक शिक्षार्थी बन सकें।

निष्कर्ष

अतः राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के आलोक में हिन्दी भाषा शिक्षण का उद्देश्य बच्चों के समग्र विकास को सुनिश्चित करना है। यह उन्हें केवल भाषा ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि सोचने, अभिव्यक्त करने, सामाजिक रूप से जुड़ने और सृजनात्मक बनने की क्षमता भी प्रदान करता है।

उत्तर –

  • भूमिका
  • बिहार पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2008 के आलोक में हिन्दी भाषा के उद्देश्य
  • निष्कर्ष

भूमिका
बिहार पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2008 (BCF-2008) राज्य के विद्यालयी शिक्षा तंत्र को अधिक बाल-केंद्रित, गतिविधि-आधारित और जीवनोपयोगी बनाने के उद्देश्य से विकसित की गई। यह रूपरेखा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 से प्रेरित है और हिन्दी भाषा शिक्षण को केवल विषय न मानकर अभिव्यक्ति, चिंतन और सामाजिक सहभागिता का माध्यम मानती है।

बिहार पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2008 के आलोक में हिन्दी भाषा के उद्देश्य

(i) भाषा के माध्यम से अभिव्यक्ति क्षमता का विकास
BCF-2008 के अनुसार हिन्दी शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य बच्चों में अपनी बात को स्पष्ट, प्रभावी और आत्मविश्वास के साथ व्यक्त करने की क्षमता विकसित करना है। इसमें बोलना, सुनना, पढ़ना और लिखना—चारों कौशलों का संतुलित विकास शामिल है।
(ii) संप्रेषणीय दक्षता (Communication Skills) का विकास
हिन्दी को दैनिक जीवन की भाषा के रूप में प्रयोग करने की क्षमता विकसित करना आवश्यक माना गया है, जिससे बच्चे सामाजिक एवं शैक्षिक परिस्थितियों में प्रभावी संवाद स्थापित कर सकें।
(iii) सृजनात्मकता एवं कल्पनाशक्ति का विकास
कहानी, कविता, नाटक, चित्र-वर्णन आदि के माध्यम से बच्चों की रचनात्मकता को प्रोत्साहित करना BCF-2008 का महत्वपूर्ण उद्देश्य है, ताकि वे केवल ज्ञान ग्रहण न करें बल्कि नया सृजन भी कर सकें।
(iv) आलोचनात्मक एवं चिंतनशील क्षमता का विकास
भाषा शिक्षण के माध्यम से बच्चों में तार्किक सोच, प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति और विश्लेषण करने की क्षमता विकसित की जाती है, जिससे वे पाठ्य सामग्री को समझकर उसका मूल्यांकन कर सकें।
(v) भाषा के प्रति रुचि एवं संवेदनशीलता का विकास
हिन्दी साहित्य (कहानी, कविता, लोकसाहित्य) के माध्यम से भाषा के सौंदर्य, भाव और सांस्कृतिक पक्ष को समझने की संवेदनशीलता विकसित करना भी एक प्रमुख उद्देश्य है।
(vi) बहुभाषिकता (Multilingualism) का सम्मान
BCF-2008 बच्चों की मातृभाषा/स्थानीय भाषा को महत्व देता है और हिन्दी शिक्षण को उससे जोड़कर विकसित करने पर बल देता है, जिससे भाषा सीखना सहज और प्रभावी बनता है।
(vii) जीवनोपयोगी भाषा कौशल का विकास
हिन्दी को केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उपयोगी बनाने पर जोर दिया गया है—जैसे आवेदन लिखना, पत्र लेखन, संवाद करना आदि।
(viii) सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का विकास
हिन्दी भाषा के माध्यम से बच्चों में सामाजिक समरसता, सहिष्णुता, नैतिकता और सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान विकसित करना भी एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

निष्कर्ष
बिहार पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2008 के अनुसार हिन्दी भाषा शिक्षण का उद्देश्य केवल भाषाई ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों को सक्षम, संवेदनशील, सृजनशील और सामाजिक रूप से जागरूक नागरिक बनाना है। यह रूपरेखा हिन्दी को जीवन से जोड़ती है और शिक्षण को बाल-केंद्रित एवं अनुभवात्मक बनाती है, जिससे सीखना अधिक सार्थक और प्रभावी हो सके।

 

इकाई 2 : PREMIUM NOTES

इकाई 2 : प्राथमिक स्तर की हिन्दी : पाठ्यचर्या-पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तकों की समझ

      • बिहार के प्राथमिक स्तर की हिन्दी के पाठ्यचर्या-पाठ्यक्रम के उद्देश्य
      • प्राथमिक स्तर की पाठ्चर्या-पाठ्यक्रम की संरचना।
      • प्राथमिक स्तर की हिन्दी की पाठ्य-पुस्तकों एवं अभ्यास प्रश्नों की प्रकृति की समझ।

प्रश्न(06): बिहार के प्राथमिक स्तर की हिन्दी के पाठ्यचर्या एवं पाठ्यक्रम के उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।

उत्तर –

  • भूमिका
  • बिहार के प्राथमिक स्तर की हिन्दी के पाठ्यचर्या एवं पाठ्यक्रम के उद्देश्य
  • निष्कर्ष

भूमिका

प्राथमिक स्तर पर हिन्दी भाषा शिक्षण का उद्देश्य केवल भाषा ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों के समग्र व्यक्तित्व का विकास करना होता है। पाठ्यचर्या एवं पाठ्यक्रम इस प्रकार निर्मित किए जाते हैं कि वे बालकों की भाषा दक्षता, अभिव्यक्ति क्षमता तथा सामाजिक-सांस्कृतिक समझ को विकसित करें।

बिहार के प्राथमिक स्तर की हिन्दी के पाठ्यचर्या एवं पाठ्यक्रम के उद्देश्य

(i) भाषा कौशलों का विकास
प्राथमिक स्तर की हिन्दी पाठ्यचर्या का मुख्य उद्देश्य बच्चों में सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना (LSRW) चारों भाषा कौशलों का संतुलित विकास करना है। इससे बच्चे प्रभावी संप्रेषण करने में सक्षम बनते हैं।

(ii) अभिव्यक्ति क्षमता का विकास
पाठ्यक्रम इस प्रकार तैयार किया जाता है कि बच्चे अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को सरल एवं स्पष्ट रूप से व्यक्त कर सकें। इससे आत्मविश्वास और रचनात्मकता बढ़ती है।

(iii) भाषा के प्रति रुचि उत्पन्न करना
बच्चों में हिन्दी भाषा के प्रति प्रेम और रुचि विकसित करना एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। रोचक कहानियों, कविताओं और गतिविधियों के माध्यम से भाषा सीखना सहज बनाया जाता है।

(iv) सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का विकास
पाठ्यचर्या में ऐसी सामग्री शामिल होती है जो बच्चों को अपने समाज, संस्कृति, परंपराओं और नैतिक मूल्यों से जोड़ती है, जिससे उनमें सामाजिक जागरूकता विकसित होती है।

(v) रचनात्मक एवं आलोचनात्मक सोच का विकास
बच्चों को प्रश्न पूछने, सोचने और अपने विचार व्यक्त करने के अवसर दिए जाते हैं, जिससे उनकी रचनात्मक एवं आलोचनात्मक सोच का विकास होता है।

(vi) जीवनोपयोगी भाषा का विकास
पाठ्यक्रम का उद्देश्य बच्चों को दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाली भाषा का ज्ञान देना है, ताकि वे वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में भाषा का प्रभावी उपयोग कर सकें।

(vii) बहुभाषिकता का सम्मान
बिहार की भाषाई विविधता को ध्यान में रखते हुए पाठ्यचर्या बच्चों की मातृभाषा एवं स्थानीय भाषाओं का सम्मान करती है और हिन्दी सीखने में उन्हें सहयोग देती है।

(viii) सक्रिय एवं बालकेन्द्रित शिक्षण
पाठ्यक्रम इस प्रकार बनाया जाता है कि शिक्षण प्रक्रिया बालकेन्द्रित हो, जिसमें गतिविधियों, खेल, संवाद और सहभागिता को महत्व दिया जाता है।

निष्कर्ष

अतः स्पष्ट है कि बिहार के प्राथमिक स्तर की हिन्दी पाठ्यचर्या एवं पाठ्यक्रम के उद्देश्य केवल भाषा ज्ञान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे बच्चों के सर्वांगीण विकास, सामाजिक समझ तथा जीवनोपयोगी कौशलों के निर्माण पर केंद्रित हैं।

प्रश्न(07):  प्राथमिक स्तर की पाठ्यचर्या एवं पाठ्यक्रम की संरचना का वर्णन कीजिए।

उत्तर –

  • भूमिका
  • प्राथमिक स्तर की पाठ्यचर्या एवं पाठ्यक्रम की संरचना
  • निष्कर्ष

भूमिका

प्राथमिक स्तर की पाठ्यचर्या एवं पाठ्यक्रम की संरचना इस प्रकार बनाई जाती है कि यह बच्चों के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करे। यह संरचना बालकों की आयु, रुचि, अनुभव तथा उनकी सीखने की गति को ध्यान में रखकर तैयार की जाती है।

 प्राथमिक स्तर की पाठ्यचर्या एवं पाठ्यक्रम की संरचना

(i) बालकेन्द्रित संरचना
प्राथमिक पाठ्यचर्या का आधार बालक होता है। इसमें बच्चों की आवश्यकताओं, रुचियों और अनुभवों को केंद्र में रखकर विषय-वस्तु का चयन किया जाता है, जिससे सीखना सहज और प्रभावी बनता है।

(ii) एकीकृत (समेकित) विषयवस्तु
इस स्तर पर विषयों को अलग-अलग न रखकर समेकित रूप में प्रस्तुत किया जाता है। भाषा, गणित, पर्यावरण अध्ययन आदि को आपस में जोड़कर पढ़ाया जाता है, जिससे बच्चे वास्तविक जीवन से जुड़कर सीखते हैं।

(iii) अनुभव आधारित शिक्षण
पाठ्यक्रम की संरचना इस प्रकार होती है कि बच्चे अपने अनुभवों, गतिविधियों और प्रयोगों के माध्यम से सीखते हैं। इससे ज्ञान स्थायी और व्यावहारिक बनता है।

(iv) सरल से जटिल की ओर
विषयवस्तु का संगठन इस सिद्धांत पर आधारित होता है कि बच्चों को पहले सरल और परिचित बातों से शुरू करके धीरे-धीरे जटिल और नई अवधारणाओं की ओर ले जाया जाए।

(v) गतिविधि एवं खेल आधारित संरचना
प्राथमिक स्तर पर पाठ्यक्रम में खेल, गतिविधियाँ, चित्र, कहानी, कविता आदि को शामिल किया जाता है, जिससे बच्चों में सीखने के प्रति रुचि बनी रहती है।

(vi) निरंतर एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE)
पाठ्यचर्या में मूल्यांकन की व्यवस्था सतत एवं व्यापक होती है। बच्चों का मूल्यांकन केवल परीक्षा के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी दैनिक गतिविधियों, सहभागिता और प्रगति के आधार पर किया जाता है।

(vii) भाषा का सरल एवं सहज रूप
पाठ्यक्रम में प्रयुक्त भाषा बच्चों के स्तर के अनुसार सरल, स्पष्ट और समझने योग्य होती है, जिससे वे आसानी से विषयवस्तु को ग्रहण कर सकें।

(viii) स्थानीय परिवेश का समावेश
पाठ्यचर्या में स्थानीय परिवेश, संस्कृति, जीवनशैली और अनुभवों को शामिल किया जाता है, जिससे बच्चों का सीखना अधिक सार्थक और प्रासंगिक बनता है।

निष्कर्ष

अतः प्राथमिक स्तर की पाठ्यचर्या एवं पाठ्यक्रम की संरचना बालकेन्द्रित, गतिविधि-आधारित तथा अनुभवपरक होती है, जो बच्चों के सर्वांगीण विकास और प्रभावी अधिगम को सुनिश्चित करती है।




प्रश्न (08): प्राथमिक स्तर की हिन्दी की पाठ्य-पुस्तकों की प्रकृति की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

  • भूमिका
  • प्राथमिक स्तर की हिन्दी की पाठ्य-पुस्तकों की प्रकृति
  • निष्कर्ष

भूमिका

प्राथमिक स्तर की हिन्दी की पाठ्य-पुस्तकें बच्चों के भाषा विकास का प्रमुख साधन होती हैं। इनकी प्रकृति ऐसी होती है कि वे बालकों के मानसिक स्तर, रुचि और अनुभवों के अनुरूप हों तथा सीखने को सरल, रोचक और प्रभावी बनाएं।

प्राथमिक स्तर की हिन्दी की पाठ्य-पुस्तकों की प्रकृति

(i) बालकेन्द्रित प्रकृति
प्राथमिक स्तर की हिन्दी पाठ्य-पुस्तकें बालकों को केंद्र में रखकर तैयार की जाती हैं। इनमें विषयवस्तु बच्चों के अनुभवों, रुचियों और आवश्यकताओं के अनुसार होती है, जिससे वे आसानी से जुड़ पाते हैं।

(ii) सरल एवं सहज भाषा
इन पुस्तकों की भाषा अत्यंत सरल, स्पष्ट और समझने योग्य होती है। कठिन शब्दों और जटिल वाक्यों से बचते हुए बच्चों के स्तर के अनुसार भाषा का चयन किया जाता है।

(iii) रोचक एवं आकर्षक प्रस्तुति
पाठ्य-पुस्तकों में चित्र, रंग, कहानी, कविता, संवाद आदि का समावेश होता है, जिससे बच्चे रुचि के साथ सीखते हैं और उनका ध्यान बना रहता है।

(iv) गतिविधि-आधारित प्रकृति
इन पुस्तकों में विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ जैसे—प्रश्न-उत्तर, मिलान, चित्र वर्णन, खेल आदि शामिल होते हैं, जो बच्चों को सक्रिय रूप से सीखने के लिए प्रेरित करते हैं।

(v) भाषा कौशलों का विकास
पाठ्य-पुस्तकें इस प्रकार बनाई जाती हैं कि वे सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने—चारों भाषा कौशलों का संतुलित विकास करें।

(vi) जीवन से जुड़ी विषयवस्तु
इनमें शामिल पाठ बच्चों के दैनिक जीवन, परिवेश, परिवार, विद्यालय और समाज से संबंधित होते हैं, जिससे सीखना वास्तविक और उपयोगी बनता है।

(vii) नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का समावेश
पाठ्य-पुस्तकों में ऐसी कहानियाँ और प्रसंग होते हैं जो बच्चों में नैतिकता, सहयोग, ईमानदारी और सामाजिकता जैसे गुणों का विकास करते हैं।

(viii) बहुभाषिकता का सम्मान
बिहार जैसे बहुभाषिक राज्य में पाठ्य-पुस्तकों की प्रकृति स्थानीय भाषाओं और बोलियों का सम्मान करते हुए हिन्दी सीखने में सहायक होती है।

निष्कर्ष

अतः प्राथमिक स्तर की हिन्दी की पाठ्य-पुस्तकों की प्रकृति बालकेन्द्रित, सरल, रोचक एवं गतिविधि-आधारित होती है, जो बच्चों के भाषा विकास के साथ-साथ उनके समग्र व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।




 

प्रश्न (09): प्राथमिक स्तर की हिन्दी में अभ्यास प्रश्नों की प्रकृति एवं उनकी उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

  • भूमिका
  • अभ्यास प्रश्नों की प्रकृति
  • अभ्यास प्रश्नों की उपयोगिता
  • निष्कर्ष

भूमिका
प्राथमिक स्तर पर हिन्दी शिक्षण में अभ्यास प्रश्नों का विशेष महत्व होता है। ये प्रश्न बच्चों की भाषा-समझ, अभिव्यक्ति क्षमता तथा रचनात्मकता के विकास में सहायक होते हैं। अभ्यास प्रश्न केवल ज्ञान की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया को सक्रिय बनाने का माध्यम हैं।

अभ्यास प्रश्नों की प्रकृति (Nature of Practice Questions)
प्राथमिक स्तर पर हिन्दी के अभ्यास प्रश्नों की प्रकृति बाल-केंद्रित, सरल एवं रोचक होती है। इनकी प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार से समझी जा सकती हैं:
(i) सरल एवं स्पष्ट भाषा
अभ्यास प्रश्न बच्चों की आयु और समझ के अनुरूप सरल भाषा में होते हैं, ताकि वे बिना कठिनाई के उन्हें समझ सकें।
(ii) बाल-मन के अनुकूल
प्रश्न बच्चों की रुचि, अनुभव और परिवेश से जुड़े होते हैं, जिससे वे आसानी से जुड़ाव महसूस करते हैं।
(iii) विविधता (Variety)
अभ्यास प्रश्नों में विभिन्न प्रकार शामिल होते हैं जैसे—रिक्त स्थान भरना, मिलान करना, लघु उत्तरीय प्रश्न, चित्र आधारित प्रश्न, रचनात्मक लेखन आदि।
(iv) क्रियात्मक एवं गतिविधि-आधारित
इनमें खेल, चित्र, कहानी, संवाद आदि के माध्यम से सीखने को रोचक बनाया जाता है।
(v) रचनात्मकता को बढ़ावा देने वाले
कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जो बच्चों को स्वयं सोचने, लिखने और कल्पना करने के लिए प्रेरित करते हैं।
(vi) क्रमबद्धता (Graded Learning)
प्रश्न सरल से कठिन की ओर क्रमबद्ध होते हैं, जिससे धीरे-धीरे बच्चों की क्षमता विकसित होती है।

 

अभ्यास प्रश्नों की उपयोगिता (Utility of Practice Questions)
अभ्यास प्रश्नों का उपयोग केवल परीक्षा तक सीमित नहीं होता, बल्कि ये सम्पूर्ण शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावी बनाते हैं:
(i) भाषा कौशल का विकास
अभ्यास प्रश्नों से सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना—चारों भाषा कौशलों का विकास होता है।
(ii) समझ (Comprehension) में वृद्धि
ये प्रश्न पाठ की गहरी समझ विकसित करने में मदद करते हैं और बच्चों को अर्थ ग्रहण करने की क्षमता प्रदान करते हैं।
(iii) स्मरण शक्ति सुदृढ़ करना
नियमित अभ्यास से बच्चों की याददाश्त मजबूत होती है और सीखी गई सामग्री स्थायी हो जाती है।
(iv) आत्मविश्वास में वृद्धि
जब बच्चे स्वयं प्रश्नों को हल करते हैं, तो उनमें आत्मविश्वास और स्वावलंबन की भावना बढ़ती है।
(v) मूल्यांकन का साधन
अभ्यास प्रश्न शिक्षक के लिए यह जानने का माध्यम होते हैं कि बच्चे ने कितना सीखा है और कहाँ सुधार की आवश्यकता है।
(vi) रचनात्मक एवं आलोचनात्मक सोच का विकास
खुले प्रकार के प्रश्न बच्चों को सोचने, तर्क करने और अपनी बात अभिव्यक्त करने के लिए प्रेरित करते हैं।

निष्कर्ष
अतः स्पष्ट है कि प्राथमिक स्तर पर हिन्दी में अभ्यास प्रश्नों की प्रकृति बाल-केंद्रित, रोचक एवं विविधतापूर्ण होती है, जो बच्चों के सर्वांगीण भाषा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ये न केवल ज्ञान को सुदृढ़ करते हैं, बल्कि बच्चों को सक्रिय, आत्मविश्वासी और सृजनशील शिक्षार्थी भी बनाते हैं।




 

UNIT – 3 SYLLABUS

इकाई 3 : भाषायी क्षमताओं का विकास : सुनना व बोलना

      • भाषायी क्षमताओं की संकल्पना : विभिन्न भाषायी क्षमताएँ और उनके बीच आपसी सम्बन्ध।
      • सुनने व बोलने का अर्थ।
      • सुनने व बोलने को प्रभावित करने वाले कारक।
      • प्राथमिक स्तर के बच्चों के सुनने और बोलने की क्षमताओं का विकास :
        बच्चों को कक्षा में सुनने व बोलने के मौके उपलब्ध करवाना; जैसे-आज की बात, बातचीत, अपने बारे में बात करना, स्कूल अनुभवों पर बात करना, आँखों देखी या सुनी हुई घटनाओं के बारे में अभिव्यक्ति करना, बालगीत/कविता सुनना-सुनाना, कहानी सुनना-सुनाना, चित्र-वर्णन, दिए गए शब्दों से कहानी सुनाना, रोल प्ले करवाना, सुने हुए विचारों को संक्षिप्त व विस्तारित कर पाना, परिचित सम-सामयिक विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत करना, बच्चों को कहानी, कविता, नाटक, आदि रचने, उसे बढ़ाने तथा प्रस्तुत करने के अवसर देना (कविताओं,कहानियों व बातगीतों, आदि के उदाहरण प्रारम्भिक कक्षाओं की हिन्दी की पाठ्य-पुस्तकों से भी लिए जाएँ)।
      • भाषा सीखने के संकेतक : सुनने और बोलने के सन्दर्भ में।

प्रश्न(10): भाषायी क्षमताओं की संकल्पना क्या है? विभिन्न भाषायी क्षमताओं (जैसे- सुनना, बोलना, पढ़ना एवं लिखना) का वर्णन करते हुए उनके बीच आपसी संबंध स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

  • भूमिका
  • ✦ भाषायी क्षमताओं की संकल्पना
  • ✦ भाषायी क्षमताओं के बीच आपसी संबंध
  • ✦ निष्कर्ष

भूमिका
भाषा मानव संचार का सबसे प्रभावी माध्यम है। किसी भी भाषा को सीखने और प्रयोग करने के लिए व्यक्ति में कुछ मूलभूत क्षमताओं का विकास आवश्यक होता है, जिन्हें भाषायी क्षमताएँ कहा जाता है। ये क्षमताएँ व्यक्ति को सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने में दक्ष बनाती हैं।

भाषायी क्षमताओं की संकल्पना
भाषायी क्षमताएँ वे योग्यता एवं कौशल हैं जिनके माध्यम से व्यक्ति भाषा को समझता, अभिव्यक्त करता तथा प्रभावी संचार स्थापित करता है। यह केवल शब्दों के ज्ञान तक सीमित नहीं होती, बल्कि अर्थ ग्रहण, अभिव्यक्ति, तथा संदर्भ के अनुसार भाषा के उचित प्रयोग की क्षमता भी इसमें शामिल होती है।

✦ विभिन्न भाषायी क्षमताएँ

(i) श्रवण क्षमता (Listening Skill)
यह भाषा सीखने की प्रथम और आधारभूत क्षमता है। इसके माध्यम से बच्चा ध्वनियों, शब्दों और वाक्यों को सुनकर उनके अर्थ को समझता है। अच्छी श्रवण क्षमता से भाषा अधिगम की मजबूत नींव बनती है।

(ii) वाचन क्षमता (Speaking Skill)
यह वह क्षमता है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को मौखिक रूप से व्यक्त करता है। सही उच्चारण, शब्द चयन और प्रवाह इसमें महत्वपूर्ण होते हैं।

(iii) पठन क्षमता (Reading Skill)
पठन के माध्यम से व्यक्ति लिखित भाषा को समझता है। इसमें शब्द पहचान, अर्थ ग्रहण और भाव समझने की क्षमता शामिल होती है। यह ज्ञानार्जन का प्रमुख साधन है।

(iv) लेखन क्षमता (Writing Skill)
यह विचारों को लिखित रूप में व्यक्त करने की क्षमता है। इसमें भाषा की शुद्धता, व्याकरण, संरचना और अभिव्यक्ति का विशेष महत्व होता है।

✦ भाषायी क्षमताओं के बीच आपसी संबंध
भाषायी क्षमताएँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी होती हैं और एक का विकास दूसरी को प्रभावित करता है। श्रवण क्षमता के बिना सही वाचन संभव नहीं है, क्योंकि बच्चा पहले सुनकर ही बोलना सीखता है। इसी प्रकार, पठन क्षमता लेखन को मजबूत बनाती है, क्योंकि पढ़ने से शब्द भंडार और वाक्य संरचना का ज्ञान बढ़ता है।

वास्तव में, ये चारों क्षमताएँ एक क्रम में विकसित होती हैं—पहले सुनना, फिर बोलना, उसके बाद पढ़ना और अंत में लिखना। अतः इनका समन्वित विकास भाषा शिक्षण का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।

✦ निष्कर्ष
भाषायी क्षमताएँ भाषा अधिगम की आधारशिला हैं। इनका संतुलित और समन्वित विकास ही प्रभावी संचार और सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास में सहायक होता है। इसलिए शिक्षण प्रक्रिया में सभी भाषायी क्षमताओं पर समान ध्यान देना आवश्यक है।
 

प्रश्न (11): सुनने एवं बोलने से आप क्या समझते हैं? दोनों की परिभाषा स्पष्ट करते हुए उनके बीच संबंध का वर्णन कीजिए।

उत्तर –

  • भूमिका
  • सुनने का अर्थ 
  • बोलने का अर्थ 
  • सुनने और बोलने के बीच संबंध
  • निष्कर्ष

भूमिका

भाषा-अधिगम की प्रक्रिया में सुनना और बोलना दो अत्यंत महत्वपूर्ण कौशल हैं। ये दोनों मौखिक संप्रेषण के आधार स्तंभ हैं और व्यक्ति के सामाजिक तथा शैक्षिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सुनने का अर्थ (Listening)

सुनना एक सक्रिय प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति केवल ध्वनि को सुनता ही नहीं, बल्कि उसे समझता, उसका विश्लेषण करता और उसके अर्थ का निर्माण करता है। इसमें ध्यान, एकाग्रता तथा संदर्भ की समझ आवश्यक होती है। प्रभावी सुनना भाषा सीखने का पहला चरण है, क्योंकि इसके माध्यम से व्यक्ति नए शब्द, उच्चारण और भाषा की संरचना को ग्रहण करता है।

बोलने का अर्थ (Speaking)

बोलना वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करता है। इसमें सही उच्चारण, शब्द चयन, स्वर, लय तथा भाव का समुचित उपयोग आवश्यक होता है। बोलना व्यक्ति की भाषा दक्षता और उसकी अभिव्यक्ति क्षमता का प्रत्यक्ष रूप है।

सुनने और बोलने के बीच संबंध

सुनना और बोलना एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रभावी बोलने के लिए पहले ध्यानपूर्वक सुनना आवश्यक होता है, क्योंकि सुनने से ही व्यक्ति शब्दावली, वाक्य संरचना और सही उच्चारण सीखता है। भाषा-अधिगम की प्रक्रिया में पहले सुनने की क्षमता विकसित होती है और उसके आधार पर बोलने की क्षमता सुदृढ़ होती है। अतः दोनों कौशल एक-दूसरे पर निर्भर और परस्पर सहायक हैं।

निष्कर्ष

इस प्रकार, सुनना और बोलना भाषा के दो अभिन्न अंग हैं, जो प्रभावी संप्रेषण के लिए आवश्यक हैं। इन दोनों के संतुलित विकास से ही व्यक्ति की भाषा दक्षता पूर्ण रूप से विकसित होती है।

प्रश्न (12): सुनने एवं बोलने को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए। 

उत्तर –

  • भूमिका
  • सुनने एवं बोलने को प्रभावित करने वाले कारक
  • निष्कर्ष

भूमिका
सुनना और बोलना भाषा अधिगम के मूलभूत कौशल हैं, जो बच्चों के समग्र व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन कौशलों का विकास स्वतः नहीं होता, बल्कि विभिन्न मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं शैक्षिक कारकों से प्रभावित होता है।

सुनने एवं बोलने को प्रभावित करने वाले कारक

(i) पारिवारिक वातावरण
बच्चों के सुनने और बोलने की क्षमता पर परिवार का गहरा प्रभाव पड़ता है। जिस परिवार में संवाद, कहानी-कहानी, चर्चा और विचार-विनिमय का वातावरण होता है, वहाँ बच्चे अधिक आत्मविश्वास के साथ अपनी बात व्यक्त करना सीखते हैं। इसके विपरीत, संवादहीन या दमनात्मक वातावरण बच्चों की अभिव्यक्ति को सीमित कर देता है।

(ii) विद्यालयी वातावरण
विद्यालय में शिक्षक का व्यवहार, कक्षा का माहौल तथा शिक्षण विधियाँ सुनने-बोलने के विकास को प्रभावित करती हैं। यदि कक्षा में बच्चों को बोलने के अवसर, समूह चर्चा, कहानी सुनाने, प्रश्न पूछने आदि के लिए प्रेरित किया जाता है, तो उनकी भाषा दक्षता में वृद्धि होती है।

(iii) मनोवैज्ञानिक कारक
आत्मविश्वास, रुचि, प्रेरणा एवं भावनात्मक स्थिति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जो बच्चे झिझकते हैं या डरते हैं, वे खुलकर नहीं बोल पाते। वहीं, प्रोत्साहन मिलने पर वे धीरे-धीरे सक्रिय सहभागिता करने लगते हैं।

(iv) सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश
समाज और संस्कृति भी भाषा के प्रयोग को प्रभावित करते हैं। विभिन्न सामाजिक परिवेशों में भाषा की शैली, शब्दावली और अभिव्यक्ति भिन्न होती है, जिससे बच्चों की सुनने और बोलने की शैली विकसित होती है।

(v) भाषा का संपर्क (Exposure)
बच्चों को जितना अधिक भाषा सुनने और प्रयोग करने का अवसर मिलता है, उनकी क्षमता उतनी ही विकसित होती है। घर, स्कूल और समाज में समृद्ध भाषायी संपर्क (जैसे—कहानी, कविता, वार्तालाप) सुनने-बोलने के कौशल को सुदृढ़ बनाता है।

(vi) शिक्षण-सामग्री एवं गतिविधियाँ
चित्र, कहानी-पुस्तकें, ऑडियो-विजुअल सामग्री, रोल प्ले, संवादात्मक गतिविधियाँ आदि बच्चों को सक्रिय बनाती हैं और उनके भाषा कौशल को विकसित करती हैं।

(vii) स्वास्थ्य एवं शारीरिक स्थिति
सुनने की शारीरिक क्षमता (जैसे कानों की समस्या) या बोलने में कठिनाई (जैसे उच्चारण दोष) भी इन कौशलों को प्रभावित कर सकती है। स्वस्थ शारीरिक स्थिति आवश्यक है।

निष्कर्ष

स्पष्ट है कि सुनने एवं बोलने की क्षमताएँ अनेक कारकों से प्रभावित होती हैं। यदि परिवार, विद्यालय और समाज मिलकर सकारात्मक एवं प्रोत्साहनपूर्ण वातावरण प्रदान करें, तो बच्चों में इन कौशलों का प्रभावी विकास संभव है।

प्रश्न (13): प्राथमिक स्तर के बच्चों के सुनने एवं बोलने की क्षमताओं के विकास की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।

उत्तर –

  • भूमिका 
  • प्राथमिक स्तर के बच्चों के सुनने एवं बोलने की क्षमताओं के विकास की प्रक्रिया
  • निष्कर्ष

भूमिका 
प्राथमिक स्तर पर सुनने (Listening) और बोलने (Speaking) की क्षमताएँ भाषा अधिगम की आधारशिला होती हैं। ये कौशल क्रमिक (gradual) प्रक्रिया के माध्यम से विकसित होते हैं, जिसमें बच्चों को उपयुक्त वातावरण, अवसर और गतिविधियाँ प्रदान करना आवश्यक होता है।

प्राथमिक स्तर के बच्चों के सुनने एवं बोलने की क्षमताओं के विकास की प्रक्रिया

(i) प्रारम्भिक संपर्क एवं अनुकरण (Exposure and Imitation)
विकास की शुरुआत बच्चों के सुनने से होती है। वे पहले अपने आसपास के लोगों—माता-पिता, शिक्षक और साथियों—की भाषा को सुनते हैं और उसका अनुकरण करते हैं। इस चरण में बार-बार सुनना, ध्वनियों की पहचान और शब्दों का अनुकरण प्रमुख होता है।

(ii) समझ का विकास (Development of Comprehension)
धीरे-धीरे बच्चे सुनी हुई बातों का अर्थ समझने लगते हैं। वे निर्देशों का पालन करते हैं, प्रश्नों के उत्तर देते हैं और सरल वार्तालाप में भाग लेते हैं। यह चरण सुनने की क्षमता को मजबूत करता है।

(iii) अभिव्यक्ति का आरम्भ (Initial Expression)
समझ विकसित होने के बाद बच्चे छोटे-छोटे शब्दों और वाक्यों के माध्यम से अपनी बात व्यक्त करना शुरू करते हैं। वे अपने अनुभव, भावनाएँ और आवश्यकताएँ बोलकर व्यक्त करने लगते हैं।

(iv) शब्द-भंडार एवं वाक्य-विन्यास का विस्तार
समय के साथ बच्चों का शब्द-भंडार (Vocabulary) बढ़ता है और वे अधिक स्पष्ट तथा व्यवस्थित वाक्य बोलने लगते हैं। इस चरण में शिक्षक विभिन्न गतिविधियों (जैसे—कहानी, कविता, चित्र-वर्णन) के माध्यम से भाषा को समृद्ध करते हैं।

(v) संवादात्मक सहभागिता (Interactive Participation)
बच्चे समूह चर्चा, बातचीत, रोल प्ले, प्रश्नोत्तर आदि गतिविधियों में सक्रिय भाग लेने लगते हैं। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे प्रभावी ढंग से अपनी बात रखने लगते हैं।

(vi) सृजनात्मक अभिव्यक्ति (Creative Expression)
अंतिम चरण में बच्चे स्वयं कहानी, कविता, नाटक आदि का निर्माण और प्रस्तुति करने लगते हैं। वे सुनी हुई बातों को संक्षिप्त या विस्तारित रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं और सम-सामयिक विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते हैं।

निष्कर्ष

इस प्रकार, सुनने एवं बोलने की क्षमताओं का विकास एक सतत और क्रमिक प्रक्रिया है, जो सुनने से शुरू होकर सृजनात्मक अभिव्यक्ति तक पहुँचती है। यदि बच्चों को समृद्ध भाषायी वातावरण, प्रोत्साहन और पर्याप्त अवसर दिए जाएँ, तो ये कौशल प्रभावी रूप से विकसित किए जा सकते हैं।

प्रश्न (14) भाषा विकास में कविता और  बाल गीत की क्या भूमिका है ? 

उत्तर –

  • भूमिका
  • भाषा विकास में कविता की भूमिका
  • भाषा विकास बाल गीत की भूमिका
  • रचनात्मकता का विकास
  • निष्कर्ष

भूमिका

बालक के भाषा विकास में कविता और बाल गीत का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है। छोटे बच्चे स्वाभाविक रूप से लय, ताल और तुकांत शब्दों की ओर आकर्षित होते हैं। कविता और बाल गीत बच्चों के लिए भाषा को सरल, रोचक और आनंददायक बना देते हैं। इनके माध्यम से बच्चा बिना दबाव के नई भाषा सीखता है और अपनी अभिव्यक्ति को विकसित करता है।

भाषा विकास में कविता की भूमिका

कविता बच्चों के मन में भाषा के प्रति रुचि उत्पन्न करती है। कविता के माध्यम से बच्चा नए शब्दों को सुनता है और उन्हें दोहराने का प्रयास करता है। इससे उसकी शब्द-संपदा बढ़ती है। कविता में प्रयुक्त लय और तुक बच्चे की स्मरण शक्ति को मजबूत करती है, जिससे वह शब्दों और वाक्यों को जल्दी याद कर पाता है। कविता सुनने और बोलने दोनों कौशलों को विकसित करती है क्योंकि बच्चा पहले सुनता है और फिर उसे बोलने का प्रयास करता है।

भाषा विकास बाल गीत की भूमिका

बाल गीत भाषा को व्यवहारिक रूप में सिखाने का माध्यम है। बाल गीतों के द्वारा बच्चे उच्चारण की शुद्धता सीखते हैं। जब बच्चा गीत गाता है, तो उसके मुख, जीभ और स्वर तंत्र का अभ्यास होता है जिससे उसका उच्चारण स्पष्ट होता है। बाल गीत बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ाते हैं और वे समूह में गाने के माध्यम से दूसरों के साथ संवाद करना सीखते हैं। इससे सामाजिक और भाषाई विकास साथ-साथ होता है।

रचनात्मकता का विकास

कविता और बाल गीत बच्चों की कल्पनाशक्ति को विकसित करते हैं। वे शब्दों के माध्यम से चित्र बनाने लगते हैं और अपनी भाषा में नए वाक्य बनाने की कोशिश करते हैं। इससे उनकी मौखिक अभिव्यक्ति बेहतर होती है। बच्चा अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करना सीखता है।

सुनने और बोलने की क्षमता का विकास

कविता और गीत बच्चों को ध्यानपूर्वक सुनना सिखाते हैं। जब वे शिक्षक या अभिभावक से कविता सुनते हैं, तो उनके भीतर सही शब्दों और ध्वनियों को पहचानने की क्षमता विकसित होती है। बार-बार दोहराने से उनका बोलना अधिक प्रभावशाली और स्पष्ट बनता है।

निष्कर्ष

इस प्रकार कविता और बाल गीत भाषा विकास के प्रभावी साधन हैं। ये बच्चों में भाषा के चारों कौशल—सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना—के विकास में सहायता करते हैं। साथ ही भाषा सीखने की प्रक्रिया को आनंदपूर्ण बनाकर बच्चों को सहज रूप से भाषा से जोड़ते हैं।

 

प्रश्न(15) भाषा विकास में कहानी की क्या भूमिका है ? 

उत्तर

  • भूमिका
  • भाषा विकास में कहानी की भूमिका
  • निष्कर्ष

भूमिका

भाषा विकास एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें बच्चे सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने की क्षमताएँ धीरे-धीरे अर्जित करते हैं। इस प्रक्रिया में कहानी (Storytelling) एक अत्यंत प्रभावी माध्यम है, क्योंकि यह बच्चों की कल्पना, अनुभव और भाषा—तीनों को एक साथ सक्रिय करती है।

भाषा विकास में कहानी की भूमिका

1. शब्द भंडार (Vocabulary) का विस्तार
कहानियों के माध्यम से बच्चों को नए-नए शब्द, वाक्य संरचनाएँ और अभिव्यक्तियाँ सीखने का अवसर मिलता है। वे संदर्भ (context) के साथ शब्दों का अर्थ समझते हैं, जिससे उनका शब्द भंडार समृद्ध होता है।

2. सुनने की क्षमता का विकास
जब बच्चे कहानी सुनते हैं, तो वे ध्यानपूर्वक सुनना सीखते हैं। इससे उनकी एकाग्रता (concentration) और श्रवण कौशल (listening skills) मजबूत होते हैं।

3. बोलने की क्षमता में सुधार
कहानी सुनने के बाद बच्चे उसे दोहराने, अपने शब्दों में बताने या उस पर चर्चा करने का प्रयास करते हैं। इससे उनकी मौखिक अभिव्यक्ति (oral expression) बेहतर होती है।

4. कल्पनाशक्ति एवं रचनात्मकता का विकास
कहानियाँ बच्चों की कल्पनाशक्ति को उड़ान देती हैं। वे पात्रों, घटनाओं और स्थानों की कल्पना करते हैं, जिससे उनकी सृजनात्मक सोच विकसित होती है।

5. वाक्य निर्माण और भाषा संरचना की समझ
कहानी के माध्यम से बच्चे सही वाक्य गठन, व्याकरणिक संरचना और भाषा के प्रवाह को स्वाभाविक रूप से सीखते हैं।

6. पढ़ने की रुचि (Reading Interest) का विकास
रोचक कहानियाँ बच्चों में पढ़ने के प्रति रुचि उत्पन्न करती हैं। यह आगे चलकर उनकी पठन क्षमता को मजबूत बनाती है।

7. भावनात्मक एवं सामाजिक विकास
कहानियों में विभिन्न भावनाएँ और सामाजिक परिस्थितियाँ होती हैं, जिससे बच्चे सहानुभूति (empathy), नैतिकता और सामाजिक व्यवहार सीखते हैं। यह अप्रत्यक्ष रूप से उनकी भाषा अभिव्यक्ति को भी समृद्ध करता है।

निष्कर्ष
भाषा विकास में कहानी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुआयामी है। यह न केवल बच्चों के भाषाई कौशल (सुनना, बोलना, पढ़ना, लिखना) को विकसित करती है, बल्कि उनकी कल्पनाशक्ति, सोचने की क्षमता और सामाजिक समझ को भी बढ़ाती है। इसलिए, प्राथमिक स्तर पर भाषा शिक्षण में कहानी का समुचित उपयोग अत्यंत आवश्यक है।

 

प्रश्न (16) प्राथमिक शिक्षा में शिक्षण की भाषा मातृभाषा क्यों होना चाहिए ?

उतर

  • भूमिका
  • प्राथमिक शिक्षा में शिक्षण की भाषा मातृभाषा क्यों
  • निष्कर्ष

भूमिका :
प्राथमिक शिक्षा बच्चे के बौद्धिक, भावनात्मक तथा भाषाई विकास की नींव होती है। इस स्तर पर यदि शिक्षण ऐसी भाषा में हो जिसे बच्चा सहज रूप से समझता हो, तो उसका सीखना अधिक प्रभावी बनता है। इसलिए मातृभाषा को शिक्षण का माध्यम बनाना अत्यंत आवश्यक माना गया है।

प्राथमिक शिक्षा में शिक्षण की भाषा मातृभाषा क्यों

मातृभाषा में शिक्षण होने से बच्चा बिना किसी मानसिक दबाव के अपनी बात समझ और व्यक्त कर पाता है। प्रारम्भिक अवस्था में बच्चे की सोच, अनुभव और परिवेश उसकी मातृभाषा से ही जुड़ा होता है, इसलिए उसी भाषा में पढ़ाने से ज्ञान ग्रहण करना आसान हो जाता है। यदि किसी अन्य भाषा में शिक्षण दिया जाए, तो बच्चा पहले भाषा को समझने में ही ऊर्जा खर्च करता है, जिससे विषय-वस्तु का अधिगम प्रभावित होता है।

मातृभाषा में शिक्षा देने से बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है तथा वे कक्षा में सक्रिय भागीदारी करते हैं। यह भाषा उनके सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश से जुड़ी होती है, जिससे वे अपने अनुभवों को शिक्षा से जोड़ पाते हैं। इसके अतिरिक्त, मातृभाषा में मजबूत आधार बनने से आगे चलकर अन्य भाषाओं को सीखना भी सरल हो जाता है।

शोध और शैक्षिक नीतियाँ भी इस बात का समर्थन करती हैं कि प्रारम्भिक कक्षाओं में मातृभाषा के माध्यम से शिक्षण अधिक प्रभावी होता है, क्योंकि इससे समझ, रचनात्मकता और अभिव्यक्ति का समुचित विकास होता है।

निष्कर्ष
अतः स्पष्ट है कि प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षण बच्चों के समग्र विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह न केवल उनके सीखने को सरल और प्रभावी बनाता है, बल्कि उनके आत्मविश्वास, अभिव्यक्ति और बौद्धिक विकास को भी सुदृढ़ करता है।

 

इकाई 4: PREMIUM NOTES

इकाई 4: पढ़ने की क्षमता का विकास

    • पढ़ने का अर्थ : शुरुआती पढ़ना क्या है, शुरुआती पढ़ना’ की चरणबद्ध प्रक्रिया को समझना।
    • पढने की प्रक्रिया और विभिन्न सोपानों में अनुमान लगाने, अर्थ समझने, लिपि पहचानने, पढ़कर प्रतिक्रिया देने, पढ़कर सार प्रस्तुत करने का तात्पर्य और महत्त्व।
    • पढ़ने के प्रकार : सस्वर, मौन पठन, गहन पठन, विस्तृत पठन, शब्द और अर्थ का अनुमान लगाते हए पढना. स्किप रीडिंग, स्कैन रीडिंग, आदि।
    • पढ़ना सिखाने के विभिन्न तरीके और उनकी समीक्षात्मक समझ : वर्ण विधि, शब्द विधि, वाक्य विधि अर्थपूर्ण सन्दर्भ आधारित उपागम।
    • पढ़ना सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बाल साहित्य की भूमिका।
    • भाषा सीखने के संकेतक : पढ़ने के सन्दर्भ में।

प्रश्न (17) : प्राथमिक स्तर के बच्चों में पढ़ने की क्षमता के विकास की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए तथा इसे प्रभावी बनाने के उपायों को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

  • भूमिका
  • पढ़ने की क्षमता के विकास की प्रक्रिया
  • पढ़ने की क्षमता को प्रभावी बनाने के उपाय
  • निष्कर्ष

भूमिका 

प्राथमिक स्तर पर पढ़ने की क्षमता (Reading Skill) का विकास भाषा अधिगम का एक महत्वपूर्ण आधार है। यह केवल अक्षरों को पहचानने तक सीमित नहीं है, बल्कि अर्थ समझने, विचार ग्रहण करने और अभिव्यक्ति से भी जुड़ा होता है। इस स्तर पर विकसित की गई पढ़ने की क्षमता आगे के संपूर्ण शैक्षिक जीवन को प्रभावित करती है।

(i) पढ़ने की क्षमता के विकास की प्रक्रिया :

पढ़ने की क्षमता क्रमिक रूप से विकसित होती है, जिसमें निम्न चरण शामिल होते हैं—

अक्षर पहचान (Letter Recognition):
बच्चा सबसे पहले वर्णमाला के अक्षरों को पहचानना सीखता है।
ध्वनि-बोध (Phonemic Awareness):
अक्षरों और ध्वनियों के संबंध को समझना, जैसे ‘क’ से ‘कमल’।
शब्द पहचान (Word Recognition):
बच्चा शब्दों को पहचानकर पढ़ना शुरू करता है।
वाक्य पढ़ना (Sentence Reading):
धीरे-धीरे शब्दों को जोड़कर वाक्य पढ़ने लगता है।
अर्थ ग्रहण (Comprehension):
पढ़े गए पाठ का अर्थ समझना, जो पढ़ने का मुख्य उद्देश्य है।

(ii) पढ़ने की क्षमता को प्रभावी बनाने के उपाय :
चित्र एवं कहानी का उपयोग :
रोचक चित्रों और कहानियों के माध्यम से बच्चों की रुचि बढ़ाई जा सकती है।
उदाहरण: चित्र देखकर कहानी बनाना।
जोर से पढ़ना (Reading Aloud):
शिक्षक द्वारा पढ़कर सुनाने से उच्चारण और प्रवाह में सुधार होता है।
समूह में पढ़ना (Group Reading):
बच्चों को मिलकर पढ़ने के अवसर देने से आत्मविश्वास बढ़ता है।
पुस्तकालय का उपयोग :
विविध पुस्तकों के संपर्क से पढ़ने की आदत विकसित होती है।
भाषाई खेल (Language Games):
शब्द खेल, पहेलियाँ आदि के माध्यम से सीखना रोचक बनता है।
नियमित अभ्यास :
रोज़ पढ़ने के अभ्यास से गति और समझ दोनों में सुधार होता है।

निष्कर्ष :

इस प्रकार, पढ़ने की क्षमता का विकास एक सतत और क्रमिक प्रक्रिया है, जिसे उचित विधियों और रोचक गतिविधियों के माध्यम से प्रभावी बनाया जा सकता है। प्राथमिक स्तर पर इसका सुदृढ़ विकास बच्चों के संपूर्ण भाषा एवं बौद्धिक विकास की नींव रखता है।

 

प्रश्न(18) पढ़ने से आप क्या समझते हैं? ‘शुरुआती पढ़ना’ की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए इसकी चरणबद्ध प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।

उत्तर

  • भूमिका
  • पढ़ने का अर्थ 
  • शुरुआती पढ़ना’ की अवधारणा
  • शुरुआती पढ़ना की चरणबद्ध प्रक्रिया :
  • निष्कर्ष

भूमिका
पढ़ना भाषा अधिगम का एक महत्वपूर्ण कौशल है, जिसके माध्यम से बच्चा लिखित प्रतीकों को समझकर अर्थ ग्रहण करता है। प्राथमिक स्तर पर “शुरुआती पढ़ना” बच्चों के समग्र भाषा विकास की आधारशिला होता है।
पढ़ने का अर्थ :

पढ़ना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें बच्चा अक्षरों, शब्दों और वाक्यों को पहचानकर उनका अर्थ समझता है। यह केवल शब्दों को बोलना नहीं, बल्कि अर्थ ग्रहण (Comprehension) करने की प्रक्रिया है। इसमें ध्वनि, प्रतीक और अर्थ का समन्वय होता है।

शुरुआती पढ़ना’ की अवधारणा 

शुरुआती पढ़ना (Early Reading) वह प्रारम्भिक अवस्था है जब बच्चा पहली बार पढ़ने की प्रक्रिया से परिचित होता है। इस दौरान वह अक्षरों की पहचान, ध्वनियों का ज्ञान और शब्दों को जोड़कर पढ़ना सीखता है। यह अवस्था मुख्यतः प्राथमिक कक्षाओं में विकसित होती है और आगे के अध्ययन का आधार बनती है।

शुरुआती पढ़ना की चरणबद्ध प्रक्रिया :

(i) पूर्व-पढ़ाई अवस्था (Pre-reading Stage) :

बच्चा चित्रों, संकेतों और प्रतीकों के माध्यम से अर्थ समझता है।
उदाहरण: चित्र देखकर कहानी बनाना।

(ii) अक्षर पहचान (Letter Recognition) :

बच्चा वर्णमाला के अक्षरों को पहचानता और उन्हें याद करता है।

(iii) ध्वनि-जागरूकता (Phonemic Awareness) :

अक्षरों और उनकी ध्वनियों के बीच संबंध स्थापित करता है।
उदाहरण: ‘क’ से ‘कमल’, ‘स’ से ‘सूरज’।

(iv) शब्द पहचान (Word Recognition) :

बच्चा अक्षरों को जोड़कर शब्द पढ़ना और पहचानना सीखता है।

(v) वाक्य पढ़ना (Sentence Reading) :

शब्दों को जोड़कर सरल वाक्य पढ़ने लगता है।

(vi) अर्थ ग्रहण (Comprehension) :

पढ़े गए वाक्य या पाठ का अर्थ समझता है, जो पढ़ने का मुख्य उद्देश्य है।

निष्कर्ष :

इस प्रकार, पढ़ना एक अर्थपूर्ण और क्रमिक प्रक्रिया है, जिसमें “शुरुआती पढ़ना” की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि इस चरण को सही ढंग से विकसित किया जाए, तो बच्चों की पढ़ने की क्षमता मजबूत होती है और उनका समग्र शैक्षिक विकास सुनिश्चित होता है।

 

प्रश्न(19): पढ़ने के विभिन्न प्रकारों सस्वर पठन, मौन पठन, गहन पठन एवं विस्तृत पठन का वर्णन कीजिए तथा इनके शैक्षिक महत्व को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

  • भूमिका
  • पढ़ने के विभिन्न प्रकार
  • शैक्षिक महत्व
  • निष्कर्ष

भूमिका

पढ़ना भाषा अधिगम की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से बालक न केवल लिखित शब्दों को समझता है, बल्कि अर्थ निर्माण, चिंतन और ज्ञान अर्जन भी करता है। विभिन्न परिस्थितियों और उद्देश्यों के अनुसार पढ़ने के अलग-अलग प्रकार विकसित हुए हैं, जिनका शिक्षण में विशेष महत्व है।

पढ़ने के विभिन्न प्रकार

(1) सस्वर पठन (Loud Reading)
सस्वर पठन में छात्र शब्दों को स्पष्ट उच्चारण के साथ जोर से पढ़ता है। यह प्रारंभिक कक्षाओं में अधिक उपयोगी होता है क्योंकि इससे उच्चारण, स्वर, लय तथा प्रवाह (fluency) का विकास होता है।
उदाहरण: शिक्षक के सामने कविता या गद्यांश को जोर से पढ़ना।

(2) मौन पठन (Silent Reading)
मौन पठन में छात्र बिना आवाज किए मन ही मन पढ़ता है। इसका मुख्य उद्देश्य समझ (comprehension) विकसित करना होता है। यह उच्च कक्षाओं में अधिक प्रभावी माना जाता है।
उदाहरण: परीक्षा की तैयारी करते समय चुपचाप पाठ पढ़ना।

(3) गहन पठन (Intensive Reading)
गहन पठन में पाठ को गहराई से, शब्द-शब्द और अर्थ-अर्थ समझने पर जोर दिया जाता है। इसमें शब्दार्थ, व्याकरण, भाव और सूक्ष्म अर्थों का विश्लेषण किया जाता है।
उदाहरण: किसी कहानी या पाठ का विस्तार से अध्ययन करके उसके प्रश्नों के उत्तर देना।

(4) विस्तृत पठन (Extensive Reading)
विस्तृत पठन में छात्र अधिक मात्रा में, तेजी से और सामान्य समझ के लिए पढ़ता है। इसका उद्देश्य आनंद प्राप्त करना और सामान्य जानकारी बढ़ाना होता है।
उदाहरण: कहानी की किताबें, समाचार पत्र या पत्रिकाएँ पढ़ना।

शैक्षिक महत्व

पढ़ने के ये सभी प्रकार विद्यार्थियों के सर्वांगीण भाषा विकास में सहायक होते हैं। सस्वर पठन उच्चारण और आत्मविश्वास बढ़ाता है, जबकि मौन पठन समझ और एकाग्रता को विकसित करता है। गहन पठन विश्लेषणात्मक सोच और भाषा की गहराई को समझने में मदद करता है, वहीं विस्तृत पठन ज्ञान के विस्तार और पढ़ने की रुचि को बढ़ाता है। इन सभी प्रकारों का संतुलित प्रयोग शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी और रोचक बनाता है।
निष्कर्ष

अतः स्पष्ट है कि पढ़ने के विभिन्न प्रकार अपने-अपने उद्देश्यों के अनुसार महत्वपूर्ण हैं। शिक्षक को चाहिए कि वह कक्षा में इन सभी पठन विधियों का समुचित उपयोग करे, ताकि विद्यार्थियों का भाषा विकास संतुलित और प्रभावी रूप से हो सके।

प्रश्न(20) शब्द और अर्थ का अनुमान लगाते हुए पढ़ना क्या है? इस पठन कौशल की प्रक्रिया तथा शैक्षिक महत्व को स्पष्ट कीजिए

उत्तर –

  • भूमिका :
  • अर्थ एवं संकल्पना :
  • पठन  कौसल की प्रक्रिया :
  • शैक्षिक महत्व :
  • निष्कर्ष :

भूमिका :
पठन एक महत्वपूर्ण भाषा कौशल है, जिसके माध्यम से व्यक्ति न केवल शब्दों को पढ़ता है बल्कि उनके अर्थ को समझकर ज्ञान अर्जित करता है। कई बार पाठ में ऐसे शब्द होते हैं जिनका अर्थ पाठक को सीधे ज्ञात नहीं होता, ऐसे में वह संदर्भ के आधार पर उनके अर्थ का अनुमान लगाता है। यही प्रक्रिया “शब्द और अर्थ का अनुमान लगाते हुए पढ़ना” कहलाती है।

अर्थ एवं संकल्पना :
शब्द और अर्थ का अनुमान लगाते हुए पढ़ना वह पठन कौशल है, जिसमें पाठक अपरिचित शब्दों या वाक्यों का अर्थ संदर्भ, पूर्व ज्ञान, चित्रों या संकेतों के आधार पर स्वयं समझने का प्रयास करता है। इसमें शब्दकोश पर निर्भरता कम होती है और समझ विकसित करने पर अधिक बल दिया जाता है।

पठन  कौसल की प्रक्रिया :
(i) पाठ के संदर्भ को समझना – वाक्य या अनुच्छेद के आस-पास के शब्दों से संकेत लेना।
(ii) पूर्व ज्ञान का उपयोग – पहले से ज्ञात जानकारी के आधार पर अर्थ जोड़ना।
(iii) संकेतों की पहचान – चित्र, शीर्षक, उपशीर्षक आदि से सहायता लेना।
(iv) तार्किक निष्कर्ष निकालना – उपलब्ध जानकारी के आधार पर सही अर्थ का अनुमान लगाना।
(v) पुनः जाँच करना – पूरे वाक्य को पढ़कर यह देखना कि अनुमानित अर्थ सही बैठ रहा है या नहीं।

शैक्षिक महत्व :
यह पठन कौशल विद्यार्थियों में स्वाध्याय की क्षमता विकसित करता है। इससे उनकी शब्दावली (Vocabulary) बढ़ती है और वे बिना किसी बाहरी सहायता के पाठ को समझने में सक्षम बनते हैं। यह कौशल सोचने-समझने की क्षमता को भी बढ़ाता है तथा भाषा के प्रति आत्मविश्वास विकसित करता है। इसके माध्यम से विद्यार्थी पढ़ने में रुचि लेते हैं और उनकी समझ अधिक गहन हो जाती है।
निष्कर्ष :
अतः स्पष्ट है कि शब्द और अर्थ का अनुमान लगाते हुए पढ़ना एक प्रभावी पठन कौशल है, जो विद्यार्थियों को स्वतंत्र, सक्रिय एवं कुशल पाठक बनने में सहायता करता है।
 

प्रश्न(21). स्किप रीडिंग क्या है? इसके उद्देश्य, प्रक्रिया तथा शिक्षण-अधिगम में इसके महत्व को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

  • भूमिका 
  •  स्किप रीडिंग का अर्थ 
  • स्किप रीडिंग के उद्देश्य
  •  स्किप रीडिंग की प्रक्रिया
  • स्किप रीडिंग का शैक्षिक महत्व
  • निष्कर्ष 

भूमिका –
स्किप रीडिंग (Skip Reading) एक ऐसी पठन विधि है जिसमें पाठक पूरे पाठ को विस्तार से पढ़ने के बजाय केवल महत्वपूर्ण अंशों को पढ़ता है और कम महत्त्वपूर्ण या अनावश्यक भागों को छोड़ देता है। यह विधि तब उपयोगी होती है जब सीमित समय में किसी पाठ का मुख्य विचार या सार समझना हो। इसके माध्यम से पाठक तेजी से जानकारी प्राप्त कर सकता है और आवश्यक बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करता है।

I. स्किप रीडिंग का अर्थ (Meaning):
स्किप रीडिंग वह प्रक्रिया है जिसमें पाठक पाठ के मुख्य विचारों, महत्वपूर्ण तथ्यों एवं आवश्यक जानकारी को ही पढ़ता है तथा शेष कम महत्त्वपूर्ण भागों को छोड़ देता है।
II. स्किप रीडिंग के उद्देश्य (Objectives):

कम समय में अधिक जानकारी प्राप्त करना

पाठ के मुख्य विचारों को शीघ्र समझना

अध्ययन को प्रभावी एवं सरल बनाना

अनावश्यक विवरण से बचना

III. स्किप रीडिंग की प्रक्रिया (Process):

पढ़ने का उद्देश्य निर्धारित करना

शीर्षक एवं उपशीर्षक पर ध्यान देना

मुख्य शब्दों (Keywords) को पहचानना

अनुच्छेद के प्रारंभ एवं अंतिम वाक्यों को पढ़ना

अनावश्यक विवरण को छोड़ देना

IV. स्किप रीडिंग का शैक्षिक महत्व (Educational Importance):

विद्यार्थियों में त्वरित पठन क्षमता का विकास करता है

समय प्रबंधन की क्षमता बढ़ाता है

परीक्षा की तैयारी में सहायक होता है

महत्वपूर्ण तथ्यों की पहचान करने की क्षमता विकसित करता है

निष्कर्ष 

इस प्रकार, स्किप रीडिंग शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, तेज एवं उद्देश्यपूर्ण बनाती है।

प्रश्न(22). स्कैन रीडिंग क्या है? इसकी प्रक्रिया, विशेषताएँ तथा शिक्षण-अधिगम में इसके उपयोग को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

  • भूमिका 
  • स्कैन रीडिंग का अर्थ
  • स्कैन रीडिंग की प्रक्रिया (Process):
  • स्कैन रीडिंग की विशेषताएँ
  • शिक्षण-अधिगम में स्कैन रीडिंग का उपयोग
  • निष्कर्ष 

भूमिका 
स्कैन रीडिंग (Scan Reading) एक ऐसी पठन विधि है जिसमें पाठक किसी विशेष जानकारी (जैसे—तिथि, नाम, संख्या, शब्द आदि) को खोजने के लिए पूरे पाठ को तेजी से देखता है। इसमें पूरा पाठ समझना आवश्यक नहीं होता, बल्कि केवल लक्षित सूचना को ढूँढना ही मुख्य उद्देश्य होता है। यह विधि विशेष रूप से तब उपयोगी होती है जब हमें किसी बड़े पाठ से कोई निश्चित जानकारी शीघ्र प्राप्त करनी हो।

I. स्कैन रीडिंग का अर्थ (Meaning):
स्कैन रीडिंग वह प्रक्रिया है जिसमें पाठक किसी विशेष तथ्य या जानकारी को खोजने के लिए पाठ को तेज गति से देखता है।
II. स्कैन रीडिंग की प्रक्रिया (Process):

  • सबसे पहले आवश्यक जानकारी (जैसे—नाम, तिथि, संख्या) को स्पष्ट करना
  • पूरे पाठ पर आँखों को तेजी से घुमाना
  • प्रमुख संकेतों (Keywords) की पहचान करना
  • वांछित जानकारी मिलते ही उस भाग पर ध्यान केंद्रित करना
  • केवल आवश्यक अंश को पढ़ना, बाकी को छोड़ देना

III. स्कैन रीडिंग की विशेषताएँ (Characteristics):

  • तेज गति से पठन
  • लक्ष्य-केन्द्रित (Specific purpose)
  • चयनात्मक पठन (Selective reading)
  • केवल आवश्यक जानकारी पर ध्यान

IV. शिक्षण-अधिगम में स्कैन रीडिंग का उपयोग (Educational Use):

  • छात्रों को जल्दी जानकारी खोजने में सक्षम बनाता है
  • प्रश्नों के उत्तर ढूँढने में सहायक होता है
  • शब्दकोश, अनुक्रमणिका, तालिका आदि के उपयोग में मदद करता है
  • समय प्रबंधन एवं परीक्षा की तैयारी में उपयोगी होता है

निष्कर्ष –

इस प्रकार, स्कैन रीडिंग एक महत्वपूर्ण पठन कौशल है जो शिक्षण-अधिगम को अधिक प्रभावी, तेज एवं उद्देश्यपूर्ण बनाता है।

 

 

प्रश्न(23). पढ़ना सिखाने के विभिन्न तरीकों—वर्ण विधि, शब्द विधि, वाक्य विधि तथा अर्थपूर्ण सन्दर्भ आधारित उपागम—का वर्णन कीजिए तथा उनकी समीक्षात्मक समझ प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर –

  • भूमिका 
  • I. वर्ण विधि (Alphabet Method)
  • II. शब्द विधि (Word Method)
  • III. वाक्य विधि (Sentence Method)
  • IV. अर्थपूर्ण सन्दर्भ आधारित उपागम
  • समग्र समीक्षात्मक दृष्टि
  • निष्कर्ष

भूमिका –
पढ़ना भाषा-अधिगम की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से विद्यार्थी ज्ञान, विचार और अनुभव प्राप्त करते हैं। प्रारम्भिक कक्षाओं में पढ़ना सिखाने के लिए विभिन्न विधियों का उपयोग किया जाता है। प्रमुख विधियाँ हैं—वर्ण विधि, शब्द विधि, वाक्य विधि तथा अर्थपूर्ण सन्दर्भ आधारित उपागम। प्रत्येक विधि की अपनी विशेषताएँ, सीमाएँ और उपयोगिता होती है, इसलिए इनका समीक्षात्मक अध्ययन आवश्यक है।

I. वर्ण विधि (Alphabet Method)

वर्ण विधि में पढ़ना सिखाने की शुरुआत वर्णों (अक्षरों) से की जाती है। पहले बच्चों को स्वर और व्यंजन सिखाए जाते हैं, फिर उन्हें जोड़कर शब्द और वाक्य बनाना सिखाया जाता है।

समीक्षात्मक समझ:
यह विधि संरचनात्मक (structural) दृष्टि से सरल और व्यवस्थित है, जिससे बच्चों को भाषा की मूल इकाइयों की पहचान होती है। परन्तु यह विधि यांत्रिक (mechanical) हो जाती है, क्योंकि इसमें अर्थ पर कम और अक्षरों के ज्ञान पर अधिक ध्यान दिया जाता है। छोटे बच्चों के लिए यह उबाऊ भी हो सकती है और पढ़ने में रुचि कम कर सकती है।

II. शब्द विधि (Word Method)

इस विधि में पढ़ना सिखाने की शुरुआत सीधे शब्दों से की जाती है। बच्चे पहले पूरे शब्द को पहचानते हैं और फिर उसके अक्षरों को समझते हैं।

समीक्षात्मक समझ:
यह विधि बच्चों को अर्थपूर्ण पठन की ओर ले जाती है, जिससे उनकी रुचि बनी रहती है। बच्चे चित्रों और शब्दों के संबंध से जल्दी सीखते हैं। लेकिन इसकी सीमा यह है कि बच्चे नए शब्दों को पहचानने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं, क्योंकि वे अक्षरों की गहराई से समझ नहीं बना पाते।

III. वाक्य विधि (Sentence Method)

वाक्य विधि में पढ़ना सिखाने की शुरुआत पूरे वाक्य से की जाती है। बच्चे पहले वाक्य को समझते हैं, फिर उसमें से शब्द और वर्णों को पहचानते हैं।

समीक्षात्मक समझ:
यह विधि अर्थपूर्ण और संदर्भयुक्त होती है, जिससे बच्चों की समझ बेहतर होती है। यह संप्रेषण (communication) को भी बढ़ावा देती है। लेकिन शुरुआती स्तर पर यह विधि थोड़ी जटिल हो सकती है, क्योंकि छोटे बच्चों के लिए पूरे वाक्य को समझना कठिन हो सकता है।

IV. अर्थपूर्ण सन्दर्भ आधारित उपागम (Meaningful Context-Based Approach)

इस उपागम में पढ़ना सिखाने के लिए वास्तविक जीवन के संदर्भ, कहानियाँ, चित्र, संवाद आदि का उपयोग किया जाता है। इसमें भाषा को अर्थ और अनुभव के साथ जोड़ा जाता है।

समीक्षात्मक समझ:
यह आधुनिक और बाल-केंद्रित दृष्टिकोण है, जो बच्चों की रुचि, अनुभव और समझ को प्राथमिकता देता है। इससे पढ़ना स्वाभाविक और आनंददायक बनता है। बच्चे सक्रिय रूप से सीखते हैं और भाषा का प्रयोग भी करते हैं। हालांकि, इस विधि को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक और उचित संसाधनों की आवश्यकता होती है।

समग्र समीक्षात्मक दृष्टि

इन सभी विधियों का अपना-अपना महत्व है। वर्ण विधि बुनियादी संरचना सिखाती है, शब्द विधि अर्थ की ओर ले जाती है, वाक्य विधि संप्रेषण को बढ़ावा देती है और सन्दर्भ आधारित उपागम सीखने को वास्तविक और रोचक बनाता है। आधुनिक शिक्षा में किसी एक विधि पर निर्भर रहने के बजाय समन्वित (eclectic) दृष्टिकोण अपनाना अधिक प्रभावी माना जाता है, जिसमें सभी विधियों के गुणों को मिलाकर पढ़ाना शामिल होता है।

निष्कर्ष

अतः, पढ़ना सिखाने की विभिन्न विधियाँ शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को समृद्ध बनाती हैं। प्रत्येक विधि की उपयोगिता उसके उचित संदर्भ और स्तर पर निर्भर करती है। यदि शिक्षक इन सभी विधियों का संतुलित और समझदारीपूर्ण उपयोग करे, तो विद्यार्थियों में पढ़ने की क्षमता प्रभावी ढंग से विकसित की जा सकती है।

प्रश्न(24). पढ़ना सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बाल साहित्य की क्या भूमिका है? इसके शैक्षिक महत्व को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

  • भूमिका
  • पढ़ना सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बाल साहित्य की भूमिका
  • पढ़ना सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बाल साहित्य के शैक्षिक महत्व
  • निष्कर्ष-

भूमिका

पढ़ना सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बाल साहित्य एक प्रभावी शैक्षिक साधन के रूप में कार्य करता है। यह बच्चों को भाषा के साथ जोड़ते हुए पढ़ने को रोचक, अर्थपूर्ण और अनुभवात्मक बनाता है। बाल साहित्य बच्चों की आयु, रुचि और मानसिक स्तर के अनुरूप होने के कारण पठन-अधिगम को सहज बनाता है।

पढ़ना सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बाल साहित्य की भूमिका

(i) पठन के प्रति रुचि एवं प्रेरणा का विकास :
बाल साहित्य पढ़ने को आनंददायक बनाता है, जिससे बच्चों में स्वाभाविक रूप से पढ़ने की रुचि उत्पन्न होती है और वे स्वयं पढ़ने के लिए प्रेरित होते हैं।

(ii) भाषा विकास एवं शब्द-भंडार में वृद्धि :
कहानियाँ, कविताएँ और बाल गीत बच्चों को नए शब्दों और वाक्य संरचनाओं से परिचित कराते हैं, जिससे उनकी भाषा क्षमता विकसित होती है।

(iii) अर्थ-निर्माण (Comprehension) कौशल का विकास :
बाल साहित्य के माध्यम से बच्चे संदर्भ के आधार पर अर्थ निकालना सीखते हैं, जिससे उनकी समझने की क्षमता मजबूत होती है।

(iv) कल्पनाशक्ति एवं सृजनात्मकता का विकास :
रोचक कथाएँ और चित्रात्मक सामग्री बच्चों की कल्पना को प्रोत्साहित करती हैं, जिससे वे सृजनात्मक रूप से सोचने लगते हैं।

(v) नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का विकास :
बाल साहित्य बच्चों को नैतिक शिक्षा, सामाजिक व्यवहार और जीवन मूल्यों की समझ प्रदान करता है।

(vi) सक्रिय एवं सहभागी अधिगम को बढ़ावा :
कहानी-कथन, भूमिकानुभव (role play) आदि के माध्यम से बच्चे सक्रिय रूप से सीखते हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है।

पढ़ना सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बाल साहित्य के शैक्षिक महत्व

बाल साहित्य का शैक्षिक महत्व अत्यंत व्यापक है। यह न केवल भाषा विकास में सहायक होता है, बल्कि बच्चों के बौद्धिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास में भी योगदान देता है। कहानियाँ बच्चों को नैतिक मूल्यों, जीवन कौशल और सामाजिक व्यवहार की समझ प्रदान करती हैं। इसके साथ ही, यह उनकी कल्पनाशक्ति, सृजनात्मकता और चिंतन क्षमता को भी विकसित करता है। बाल साहित्य के माध्यम से बच्चे विभिन्न परिस्थितियों, संस्कृतियों और अनुभवों से परिचित होते हैं, जिससे उनका दृष्टिकोण व्यापक बनता है।

उदाहरण सहित स्पष्टिकरण

उदाहरण के लिए, यदि शिक्षक कक्षा में चित्रों वाली कहानी-पुस्तक का उपयोग करता है, तो बच्चे चित्रों को देखकर कहानी का अनुमान लगाते हैं और शब्दों को समझने का प्रयास करते हैं। इसी प्रकार, बाल कविताएँ और गीत बच्चों को लय और ध्वनि के माध्यम से शब्दों को पहचानने और याद रखने में सहायता करते हैं। “पंचतंत्र” या “अकबर-बीरबल” की कहानियाँ बच्चों को न केवल पढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं, बल्कि उन्हें नैतिक शिक्षा और तार्किक सोच भी प्रदान करती हैं।

निष्कर्ष-

अतः स्पष्ट है कि पढ़ना सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बाल साहित्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह बच्चों में पढ़ने की रुचि उत्पन्न करता है, भाषा कौशल को विकसित करता है और उनके समग्र व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। इसलिए शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में बाल साहित्य का समुचित और योजनाबद्ध उपयोग किया जाना चाहिए।

प्रश्न(25). बाल साहित्य का शैक्षिक महत्व क्या है? इसके विभिन्न आयामों को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए?

उत्तर –

  • भूमिका
  • बाल साहित्य का शैक्षिक महत्व : विभिन्न आयाम
  • उदाहरण सहित स्पष्टिकरण
  • निष्कर्ष

भूमिका

बाल साहित्य शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उपकरण है, जो बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहायक होता है। यह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भाषा, चिंतन, मूल्यबोध और सामाजिक समझ को विकसित करने का प्रभावी माध्यम बनता है। बच्चों की आयु, रुचि और मानसिक स्तर के अनुरूप होने के कारण यह शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक सहज और प्रभावी बनाता है।

बाल साहित्य का शैक्षिक महत्व : विभिन्न आयाम

(i) भाषाई विकास का आयाम :
बाल साहित्य बच्चों को समृद्ध भाषा वातावरण प्रदान करता है। कहानियाँ, कविताएँ और बाल गीत नए शब्दों, वाक्य संरचनाओं और अभिव्यक्तियों से परिचित कराते हैं, जिससे पढ़ने, लिखने और बोलने की क्षमता विकसित होती है।

(ii) पठन कौशल एवं समझ (Comprehension) का आयाम :
रोचक और संदर्भयुक्त सामग्री बच्चों में पढ़ने की रुचि जगाती है। वे केवल शब्द पहचानने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अर्थ निकालना, निष्कर्ष निकालना और अनुमान लगाना सीखते हैं।

(iii) बौद्धिक एवं चिंतनात्मक विकास का आयाम :
बाल साहित्य बच्चों को सोचने, प्रश्न करने और तर्क करने के लिए प्रेरित करता है। इससे उनकी विश्लेषणात्मक क्षमता, समस्या-समाधान कौशल और निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है।

(iv) कल्पनाशक्ति एवं सृजनात्मकता का आयाम :
कहानियाँ और चित्रात्मक पुस्तकें बच्चों की कल्पना को विस्तृत करती हैं। वे नई परिस्थितियों की कल्पना करते हैं और रचनात्मक अभिव्यक्ति की ओर अग्रसर होते हैं।

(v) नैतिक एवं चारित्रिक विकास का आयाम :
बाल साहित्य के माध्यम से बच्चों को सत्य, ईमानदारी, सहयोग, करुणा जैसे जीवन मूल्यों की शिक्षा मिलती है, जो उनके व्यक्तित्व निर्माण में सहायक होती है।

(vi) सामाजिक एवं भावनात्मक विकास का आयाम :
विभिन्न पात्रों और परिस्थितियों के माध्यम से बच्चे समाज, संबंधों और भावनाओं को समझते हैं। इससे उनमें सहानुभूति, सहयोग और संवेदनशीलता विकसित होती है।

उदाहरण सहित स्पष्टिकरण

उदाहरण के लिए, यदि शिक्षक कक्षा में चित्र-पुस्तक के माध्यम से कहानी सुनाता है, तो बच्चे चित्रों को देखकर घटनाओं का अनुमान लगाते हैं और शब्दों के अर्थ समझते हैं। इसी प्रकार, बाल कविताएँ बच्चों को लय और ध्वनि के माध्यम से भाषा सीखने में मदद करती हैं। “पंचतंत्र” की कहानियाँ बच्चों को न केवल पढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं, बल्कि उन्हें नैतिक शिक्षा और जीवन के व्यावहारिक ज्ञान से भी परिचित कराती हैं।

निष्कर्ष

अतः स्पष्ट है कि बाल साहित्य का शैक्षिक महत्व बहुआयामी है। यह भाषा विकास से लेकर नैतिक, सामाजिक और बौद्धिक विकास तक बच्चों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में बाल साहित्य का समुचित उपयोग अत्यंत आवश्यक है।

प्रश्न(26) भाषा सीखने के संकेतक क्या हैं? पढ़ने के संदर्भ में इन संकेतकों का वर्णन करते हुए उनके शैक्षिक महत्व को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

  • भूमिका
  • भाषा सीखने के संकेतक 
  • पढ़ने के संदर्भ में संकेतकों शैक्षिक महत्व
  • निष्कर्ष

भूमिका
भाषा सीखना एक सतत और विकासात्मक प्रक्रिया है, जिसमें बच्चे धीरे-धीरे विभिन्न कौशलों—सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना—को अर्जित करते हैं। इस प्रक्रिया की प्रगति को समझने के लिए “भाषा सीखने के संकेतक” (Learning Indicators) अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। पढ़ने के संदर्भ में ये संकेतक यह दर्शाते हैं कि बच्चा किस स्तर पर है और वह किस प्रकार पढ़ने के कौशल विकसित कर रहा है।

भाषा सीखने के संकेतक 

पढ़ने के संदर्भ में भाषा सीखने के संकेतक उन व्यवहारों और क्षमताओं को दर्शाते हैं, जिनसे यह पता चलता है कि बच्चा पढ़ना कैसे सीख रहा है और उसकी प्रगति किस दिशा में हो रही है।
(i) अक्षर एवं ध्वनि की पहचान :
बच्चा अक्षरों को पहचानता है और उनसे जुड़ी ध्वनियों को समझने लगता है। यह प्रारंभिक पठन का आधार है।
(ii) शब्द पहचान एवं उच्चारण :
बच्चा सरल शब्दों को पहचानकर उनका सही उच्चारण करता है, जिससे उसकी पठन प्रवाहशीलता (fluency) विकसित होती है।
(iii) वाक्य पढ़ना एवं अर्थ समझना :
बच्चा वाक्यों को पढ़कर उनका अर्थ समझने लगता है, जिससे उसकी समझ (comprehension) क्षमता विकसित होती है।
(iv) संदर्भ के आधार पर अर्थ निकालना :
बच्चा पढ़ते समय संदर्भ से नए शब्दों का अर्थ अनुमानित करता है, जो उन्नत पठन कौशल का संकेत है।
(v) प्रवाहपूर्ण (Fluent) पठन :
बच्चा बिना रुकावट के उचित गति और भाव के साथ पढ़ता है, जिससे पढ़ना स्वाभाविक बन जाता है।
(vi) पठन के प्रति रुचि एवं स्वायत्तता :
बच्चा स्वयं पढ़ने में रुचि दिखाता है और विभिन्न प्रकार की सामग्री पढ़ने का प्रयास करता है।

पढ़ने के संदर्भ में संकेतकों शैक्षिक महत्व

पढ़ने के संदर्भ में भाषा सीखने के संकेतकों का शैक्षिक महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये संकेतक शिक्षक को यह समझने में सहायता करते हैं कि बच्चा किस स्तर पर है और उसे किस प्रकार के सहयोग या हस्तक्षेप की आवश्यकता है। इसके आधार पर शिक्षक उपयुक्त शिक्षण विधियाँ, सामग्री और गतिविधियाँ चुन सकता है।
इसके अतिरिक्त, ये संकेतक मूल्यांकन की प्रक्रिया को भी प्रभावी बनाते हैं, क्योंकि इनके माध्यम से बच्चों की प्रगति का सतत एवं समग्र आकलन किया जा सकता है। यह बच्चों की व्यक्तिगत भिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षण को अधिक लचीला और अनुकूल बनाता है।

उदाहरण सहित स्पष्टिकरण
उदाहरण के लिए, यदि कोई बच्चा चित्र देखकर कहानी का अनुमान लगाता है और सरल शब्दों को पहचानता है, तो यह उसके प्रारंभिक पठन संकेतकों को दर्शाता है। वहीं, यदि बच्चा किसी अनुच्छेद को पढ़कर उसका सार बता सकता है, तो यह उसकी उच्च स्तर की समझ क्षमता का संकेत है।
निष्कर्ष
अतः स्पष्ट है कि पढ़ने के संदर्भ में भाषा सीखने के संकेतक बच्चों के पठन कौशल के विकास को समझने और उसे दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके आधार पर शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, उद्देश्यपूर्ण और बाल-केंद्रित बनाया जा सकता है।

 

 

हिंदी का शिक्षण शास्त्र -1 (प्राथमिक स्तर ) नोट्स 

प्रश्न(01) प्राथमिक स्तर पर हिंदी की प्रकृति एवं शिक्षण के उद्देश्य का वर्णन करे 

उत्तर –

  • भूमिका
  • हिंदी की प्रकृति 
  • हिंदी शिक्षण के उद्देश्य
  • निष्कर्ष

भूमिका

प्राथमिक स्तर बालक के भाषा विकास की आधारशिला होता है। इस स्तर पर हिंदी शिक्षण का उद्देश्य केवल भाषा सिखाना नहीं, बल्कि बालक के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करना होता है। हिंदी भाषा बालक के विचार, अनुभव एवं भावनाओं को व्यक्त करने का प्रमुख माध्यम है, इसलिए इसका शिक्षण सरल, रोचक एवं बालक-केंद्रित होना चाहिए।

हिंदी की प्रकृति (Nature of Hindi at Primary Level)

प्राथमिक स्तर पर हिंदी भाषा की प्रकृति निम्नलिखित बिंदुओं में समझी जा सकती है—

(i) संप्रेषणीय प्रकृति

हिंदी एक संचार माध्यम है, जिसके द्वारा बालक अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करता है तथा दूसरों को समझता है।

(ii) मातृभाषा आधारित

अधिकांश बच्चों के लिए हिंदी या उससे संबंधित भाषा मातृभाषा होती है, इसलिए इसका अधिगम सहज एवं स्वाभाविक होता है।

(iii) कौशल-आधारित भाषा

हिंदी शिक्षण चार प्रमुख भाषा कौशलों पर आधारित होता है—

श्रवण (Listening)
वाचन (Reading)
वाचन (Speaking)
लेखन (Writing)
(iv) सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप

हिंदी भाषा समाज, संस्कृति, परंपराओं एवं मूल्यों को व्यक्त करती है, जिससे बालक सामाजिक रूप से विकसित होता है।

(v) अनुभव आधारित

बालक अपने दैनिक जीवन के अनुभवों के माध्यम से भाषा सीखता है, इसलिए हिंदी शिक्षण जीवन से जुड़ा होना चाहिए।

(vi) सरल एवं लचीली भाषा

प्राथमिक स्तर पर हिंदी सरल, स्पष्ट एवं बालकों के स्तर के अनुरूप होनी चाहिए।

✦ हिंदी शिक्षण के उद्देश्य (Objectives of Teaching Hindi)

प्राथमिक स्तर पर हिंदी शिक्षण के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—

(i) भाषा कौशलों का विकास

बालकों में सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने की क्षमता का समुचित विकास करना।

(ii) शुद्ध उच्चारण एवं स्पष्ट अभिव्यक्ति

छात्रों को सही उच्चारण एवं प्रभावी अभिव्यक्ति का अभ्यास कराना।

(iii) शब्द भंडार का विकास

नए शब्दों का ज्ञान एवं उनका सही प्रयोग सिखाना।

(iv) पठन कौशल एवं रुचि का विकास

बालकों में कहानी, कविता आदि पढ़ने की आदत एवं रुचि विकसित करना।

(v) लेखन क्षमता का विकास

सरल वाक्य, अनुच्छेद एवं रचनात्मक लेखन की क्षमता विकसित करना।

(vi) रचनात्मकता का विकास

कहानी लेखन, चित्र वर्णन, कविता आदि के माध्यम से सृजनात्मकता को बढ़ावा देना।

(vii) सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों का विकास

पाठ्य सामग्री के माध्यम से नैतिकता, सहयोग, अनुशासन एवं सहानुभूति जैसे गुणों का विकास करना।

(viii) चिंतन एवं समझ का विकास

भाषा के माध्यम से तार्किक सोच एवं समझ विकसित करना।

(ix) आत्मविश्वास का विकास

सही भाषा प्रयोग से बालकों में आत्मविश्वास बढ़ाना।

(x) अन्य विषयों के अधिगम में सहायक

हिंदी भाषा अन्य विषयों को समझने एवं सीखने में आधार प्रदान करती है।

✦ निष्कर्ष

अतः स्पष्ट है कि प्राथमिक स्तर पर हिंदी भाषा की प्रकृति सरल, अनुभव-आधारित एवं संप्रेषणीय होती है। हिंदी शिक्षण का मुख्य उद्देश्य केवल भाषा ज्ञान देना नहीं, बल्कि बालक के बौद्धिक, सामाजिक एवं भावनात्मक विकास को सुनिश्चित करना है। इसलिए हिंदी शिक्षण को बालक-केंद्रित, गतिविधि-आधारित एवं रोचक बनाना अत्यंत आवश्यक है।

प्रश्न(02). बच्चों की दुनिया में हिंदी

उत्तर –

  • भूमिका
  • बच्चों की दुनिया में हिंदी
  • निष्कर्ष

भूमिका

बच्चों की दुनिया कल्पनाओं, अनुभवों, खेल और सीखने की दुनिया होती है। इस दुनिया में भाषा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। हिंदी, जो भारत की प्रमुख भाषाओं में से एक है, बच्चों के भावनात्मक, बौद्धिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

बच्चों की दुनिया में हिंदी

1. बच्चों की भाषा के रूप में हिंदी
हिंदी बच्चों की मातृभाषा या प्रथम भाषा के रूप में कार्य करती है।
यह बच्चों को अपने विचार, भावनाएँ और अनुभव व्यक्त करने में सहायता करती है।
सरल, सहज और बोलचाल की भाषा होने के कारण बच्चे इसे जल्दी सीखते हैं।
2. संज्ञानात्मक (बौद्धिक) विकास में भूमिका
हिंदी के माध्यम से बच्चे सोचने, समझने और तर्क करने की क्षमता विकसित करते हैं।
कहानियाँ, कविताएँ और बाल साहित्य बच्चों की कल्पनाशक्ति को बढ़ाते हैं।
भाषा के माध्यम से बच्चे नई अवधारणाओं और ज्ञान से परिचित होते हैं।
3. सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास
हिंदी बच्चों को समाज और संस्कृति से जोड़ती है।
लोककथाएँ, मुहावरे, कहावतें और त्योहारों से संबंधित भाषा बच्चों में सांस्कृतिक जागरूकता लाती है।
यह बच्चों में सामाजिक व्यवहार और संवाद कौशल का विकास करती है।
4. भावनात्मक विकास
हिंदी के माध्यम से बच्चे अपने भावों (खुशी, दुख, डर, उत्साह) को व्यक्त करना सीखते हैं।
कहानियाँ और कविताएँ बच्चों में संवेदनशीलता और सहानुभूति का विकास करती हैं।
5. शिक्षा में हिंदी की भूमिका
प्रारंभिक शिक्षा में हिंदी माध्यम बच्चों के लिए सीखने को आसान बनाता है।
यह अन्य विषयों (गणित, पर्यावरण आदि) को समझने का आधार बनती है।
भाषा के माध्यम से बच्चे पठन, लेखन और श्रवण कौशल विकसित करते हैं।
6. बाल साहित्य का महत्व
हिंदी बाल साहित्य (कहानियाँ, कविताएँ, चित्र पुस्तकें) बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहायक है।
जैसे पंचतंत्र की कहानियाँ, लोककथाएँ, और आधुनिक बाल साहित्य बच्चों में नैतिक मूल्यों का विकास करते हैं।

निष्कर्ष

बच्चों की दुनिया में हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि सीखने, सोचने और व्यक्त करने का माध्यम है। यह बच्चों के बौद्धिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक विकास में आधारभूत भूमिका निभाती है। इसलिए शिक्षा और परिवार दोनों में हिंदी को उचित स्थान देना आवश्यक है, ताकि बच्चों का समग्र विकास सुनिश्चित किया जा सके।

प्रश्न(03) भाषा, लिपि तथा हिंदी भाषा की प्रकृति को परिभाषित करें।

उत्तर –
भाषा –
भाषा शब्द संस्कृत के ‘भाष’ धातु से बना है। जिसका अर्थ है- बोलना । कक्षा में अध्यापक अपनी बात बोलकर समझाते हैं और छात्र सुनकर उनकी बात समझते हैं। बच्चा माता-पिता से बोलकर अपने मन के भाव प्रकट करता है और वे उसकी बात सुनकर समझते हैं। इसी प्रकार, छात्र भी अध्यापक द्वारा समझाई गई बात को लिखकर प्रकट करते हैं और अध्यापक उसे पढ़कर मूल्यांकन करते हैं। सभी प्राणियों द्वारा मन के भावों का आदान-प्रदान करने के लिए भाषा का प्रयोग किया जाता है। पशु-पक्षियों की बोलियों को भाषा नहीं कहा जाता ।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य बोलकर, सुनकर, लिखकर व पढ़कर अपने मन के भावों या विचारों का आदान-प्रदान करता है।

दूसरे शब्दों में – जिसके द्वारा हम अपने भावों को लिखित अथवा कथित रूप से दूसरों को समझा सके और दूसरों के भावो को समझ सके उसे भाषा कहते है। यह उच्चारित यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकों की वह व्यवस्था है जिसके द्वारा समाज विशेष के लोग भावों, विचारों का आदान प्रदान करते हैं।

लिपि –

लिपि या लेखन प्रणाली का अर्थ होता है किसी भी भाषा की लिखावट या लिखने का ढंग । ध्वनियों को लिखने के लिए जिन चिह्नों का प्रयोग किया जाता है, वही लिपि कहलाती है। लिपि और भाषा दो अलग अलग चीजें होती हैं। भाषा वो चीज होती है जो बोली जाती है, लिखने को तो उसे किसी भी लिपि में लिख सकते हैं। लिपि का शाब्दिक अर्थ होता है -लिखित या चित्रित करना । ध्वनियों को लिखने के लिए जिन चिह्नों का प्रयोग किया जाता है, वही लिपि कहलाती है। हिन्दी की लिपि देवनागरी है। हिन्दी के अलावा -संस्कृत, मराठी, कोंकणी, नेपाली आदि भाषाएँ भी देवनागरी में लिखी जाती है।

प्रकृति- मानव स्वभाव की तरह भाषा का भी अपना स्वभाव होता है। उसका यह स्वभाव प्रकृति, भौगोलिक परिवेश, जीवन पद्धति, ऐतिहासिक घटनाक्रम, सामाजिक, सांस्कृतिक और विज्ञान के क्षेत्र में होने वाले विकास आदि के अनुरूप बनता और ढलता है। भाषा के अपने गुण या स्वभाव को भाषा की प्रकृति कहते हैं। हर भाषा की अपनी प्रकृति, आंतरिक गुण-अवगुण होते है। भाषा एक सामाजिक शक्ति है, जो मनुष्य को प्राप्त होती है। मनुष्य उसे अपने पूवर्जो से सीखता है और उसका विकास करता है।

भाषा की प्रकृति निम्नलिखित है

क. सामाजिकता- भाषा के लिए समाज का होना आवश्यक है। समाज के बिना भाषा की कल्पना नहीं की जा सकती। अतः भाषा एक सामाजिक संस्था है ।

ख. अर्जन – भाषा संस्कार रूप में ग्रहण करते है। व्यक्ति अनुकरण, व्यवहार, अभ्यास से भाषा को ग्रहण करता है।

ग. परिवर्तनशीलता – भाषा निरंतर परिवर्तनशील रहती है। कुछ परिवर्तन प्रयोग से घिसने तथा बाहरी प्रभाव के कारण आते हैं।

घ. गतिशीलता – भाषा का कोई अंतिम रूप नहीं है। वह सदा गतिमान रहकर विकास करती है। भाषा को ‘बहता नीर’ कहा गया है।

ड़. कठिनता से सरलता की ओर-  भाषा कठिन से सरलता की ओर चलती है। कठिन लगने वाली ध्वनियां भाषाओं में कम होती है। आदमी आसानी चाहता है। कम से कम शब्दों में काम चलाना चाहता है।

च. भौगोलिक तथा ऐतिहासिक सीमा-  प्रत्येक भाषा की अपनी भौगोलिक और ऐतिहासिक सीमा होती है। प्रत्येक भाषा किसी विशेष काल से आरंभ होकर इतिहास के निश्चित काल तक व्यवहार में रहती है ।

छ. निजी संरचना – प्रत्येक भाषा की अपनी संरचना अलग-अलग होती है। लिंग, वचन, कारक के अतिरिक्त वाक्य गठन आदि क्षेत्रों में हर एक भाषा अपनी निजी विशेषता लिए होती है, आदि।




प्रश्न(04) राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा, 2005 के विशेष सन्दर्भ में हिन्दी भाषा शिक्षण के उद्देश्य पर प्रकाश डालें।

उत्तर- प्रत्येक बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण में उसकी मातृभाषा की अमूल्य और आध रभूत भूमिका होती है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 विशेष रूप से इसे मानती है। साथ ही हिंदी भाषा के उद्देश्यों के समझ भाषाई कौशलों (सुनना, बोलना, पढ़ना, लिखना) के समुचित विकास के लिए प्रयत्नशील है।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा, 2005 के विशेष सन्दर्भ में हिन्दी भाषा शिक्षण के उद्देश्य

1.भाषा शिक्षण बहुभाषी होना चाहिए। केवल कई भाषाओं के शिक्षण के अर्थ में ही नहीं बल्कि रणनीति तैयार करने के लिहाज से भी ताकि बहुभाषी कक्षा को एक संसाधन के तौर पर प्रयोग में लाया जाए। इससे उच्च स्तरीय भाषा कौशल का हिंदी में सरलतापूर्वक स्थानांतरण किया जा सकता है। बस आवश्यकता इस बात की है कि हम विद्यालय स्तर पर यथासंभव प्रयास करें जिससे भाषा में सतत् शिक्षा को पूर्णत: विकसित किया जा सके।

2. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने माना है कि विद्यालय आने से पूर्व बच्चे अपनी भाषाई ज्ञान को आरंभ में विद्यालय परिवार के साथ थोड़ी झिझक के साथ रखते हैं। इसका कारण है विद्यालय और उनके परिवेश की भाषा के बीच का मानक स्तर। इस भाषाई विविधता और बहुभाषिकता का उपयोग एक भाषा शिक्षक विभिन्न क्रियाकलापों एवं कार्यक्रमों की मदद से बच्चों के भाषाई कौशलों को विकसित करने के संदर्भ में कर सकता है।

3. गैर हिंदी भाषी राज्यों में बच्चे हिंदी सीखते हैं। हिंदी प्रदेशों के मामले में बच्चे वह भाषा सीखें जो उस इलाके में नहीं बोली जाती है।

4. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 के आलोक में हिंदी शिक्षण का उद्देश्य तनाव से मुक्त, सुरक्षित और भयहीन होना चाहिए। जिससे बच्चे की अधिगम प्रक्रिया उसके स्वतंत्र अभिव्यक्ति को बाधित ना कर सके। बच्चे की भाषा कौशलों का विकास इस स्तर पर समृद्ध होना चाहिए जिससे कि वे अपने परिवेश को आसानी से समझ सकें, आदि ।

विचारों के आदान-प्रदान के लिए मनुष्य निम्न चार प्रकार की क्रियाएँ करता हैं सुनना, बोलना,और लिखना। आदान अर्थात् ग्रहण करना, सीखना। प्रदान अर्थात् अभिव्यक्ति करना।

आदान में सुनना व पढ़ना क्रिया होती है।
प्रदान में—बोलना तथा लिखना क्रिया होती है।

इन चारों क्रियाओं में (सुनना, पढ़ना, बोलना, लिखना) कुशलता अर्जित करना ही भाषा शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य है। ये ही भाषा के मूल उद्देश्य कहलाते हैं।

A. सुनना:

1. भाषा के सभी ध्वनि-रूपों के शुद्ध उच्चारण को समझना ।

2. विषय-वस्तु में आए विचारों, भावों, घटनाओं, तथ्यों आदि में प्रसंगानुसार सम्बन्ध स्थापित करने हुए समझना ।

3. विषय-वस्तु, केन्द्रीय भावों, प्रमुख विचारों और निष्कर्षों को समझना।

4. सुनने के शिष्टाचार का पालन करने की क्षमता का विकास करना।

शिष्टाचारपूर्वक सुनने में बालक की निम्न प्रकार की शारीरिक, मानसिक स्थिति होती है—

1. श्रोता बालक वक्ता की ओर मुँह करके बैठे।

2.श्रोता चुपचाप ध्यानपूर्वक अर्थग्रहण करते हुए सुनें।

3. सुनते समय मुँह फेरकर बैठना, साथी से वार्तालाप, वाद-विवाद नहीं करें।

4. श्रोता वक्ता के सम्मान का ध्यान रखें।

5. वक्ता को अनावश्यक परेशान न करे।

B. बोलना :

1. शुद्धता, स्पष्टता, उतार-चढ़ाव व उचित हाव-भाव का निर्वाह करते हुए समूह में अलग से सहज रूप में प्रभावी ढंग से बोलने की क्षमता का विकास करना।

2. परिचित विषय, घटना तथा परिस्थिति का अपने ढंग से वर्णन/विवरण करने की क्षमता का विकास करना।

3.समय-समय पर प्रसंगानुसार बोलने के शिष्टाचार का पालन करते हुए मौलिक रूप से तर्कपूर्ण विचार प्रकट करने की क्षमता का विकास करना।

4. अभिनय अथवा भूमिका निर्वाह करते हुए पात्रानुसार संवाद बोलने के कौशल का विकास करना।

C. पढ़ना:

1.भाषा तत्वों को प्रसंगानुसार विश्लेषण करते हुए समझना।

2. विषय-वस्तु में आए विचरों, भावों, घटनाओं, तथ्यों आदि में प्रसंगानुसार सम्बन्ध स्थापित करते हुए सझना।

3. विषय-वस्तु के सारांश, केन्द्रीय भावों और निष्कर्षों को समझना ।

4. मुद्रित व हस्तलिखित सामग्री को शुद्ध उच्चारण, उचित यति-गति, आरोह-अवरोह, विराम-चिह्नों के अनुसार अर्थ ग्रहण करते हुए स्वाभाविक रूप से वाचन करने की क्षमता का विकास करना ।

5.बाल शब्दकोश को समझने की क्षमता का विकास करना।

6. स्तरानुकूल पाठ्येत्तर कहानियाँ, सचित्र पुस्तकें आदि साहित्य को समझकर पढ़ने की क्षमता का विकास करना।

D. लिखना:

1. अक्षरों व शब्दों के सही आकार, उचित क्रम, पर्याप्त अन्तर को समझने-लिखने की क्षमता का विकास करना।

2. देखकर और सुनकर सुस्पष्ट सुन्दर, शुद्ध रूप में उचित विराम चिह्नों का ध्यान रखते हुए लिखने की क्षमता का विकास करना ।

3. सरल प्रारूपों, प्रार्थना-पत्रों, निबन्ध, वर्णन, विवरण आदि को सरल अनुच्छेदों में रचना करते हुए लिखने की क्षमता का विकास करना।

4. मौलिक रूप से तथा तर्कपूर्ण ढंग से सरल वर्णन, विवरण, निबन्ध, प्रश्नोत्तर, सारांश, कहानी, कविता, आदि को लिखने की क्षमता का विकास करना।
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प्रश्न(05) – सुनने और बोलने का अर्थ बच्चों के भाषायी कौशल के विकास के संदर्भ में स्पष्ट करें।
अथवा
भाषा शिक्षण में सुनने और बोलने के महत्व की चर्चा कीजिए।

उत्तर –

सुनना –
जब हम स्वयं या अन्य कोई व्यक्ति कुछ बोलता है तो हम उसके द्वारा उच्चारित ध्वनियों, वाक्यों संवादों आदि का श्रवण करते हैं। यह प्रक्रिया सुनना कहलाती है। सुनना मात्र कही गई बातों को श्रवण कर लेना नहीं है, बल्कि सुनकर उस कहे गए कथन के प्रति एक संप्रत्यय के साथ समझ स्थापित करना है। बच्चे विद्यालय आने के पूर्व से ढेरों शब्दों के बारे में सुनकर उनके प्रति अपने मन में एक छवि विशेष का निर्माण कर लेते हैं। भाषा शिक्षण में सुनना और बोलना काफी हद तक एक दूसरे पर निर्भर है।

बोलना —
जब हम किसी बात/शब्द को सुनकर उसके विषय में कोई विचार बना कर अपनी अभिव्यक्ति को शाब्दिक / मौखिक रूप से प्रकट करते हैं यह प्रक्रिया बोलना कहलाती है। बोलने के क्रम में कई प्रकार की मानसिक संक्रियाएं होती है- विचारों का निर्माण, तर्कों की खोज करना, वैचारिक क्रमबद्धता, शब्द निर्माण, वाक्यों का सही चयन, ध्वनियों का उचित अनुमान, शारीरिक हावभाव आदि ।

सुनना और बोलना शारीरिक रूप से सक्षम होने पर एक स्वाभाविक गुण है। पर भाषाई दक्षता के दृष्टि से मात्र बोल लेना या सुन लेना पर्याप्त नहीं है जब तक इसके साथ ‘समझ’ भी ना जुड़ी हो। अर्थात सुनकर ‘समझना’ और समझकर ‘बोलना’ ही भाषाई कौशल कहलाते हैं। समझ के बिना सुनने और बोलने का कोई अर्थ नहीं होता। उदाहरण के लिए हम किसी अपरिचित भाषा में कही गई बात को सुन तो लेते हैं पर समझ नहीं पाते तो क्या कहा जा सकता है कि हम उस भाषा को सुनने का कौशल नहीं रखते? इसी प्रकार बिना सोचे समझे कुछ भी अनर्गल प्रलाप करना भी बोलना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ना तो सुनने वाले को और ना ही बोलने वाले को पता होता है कि वह क्या बोल रहा है? उसका आशय क्या है?

सुनना और बोलना मौखिक रूप से अर्थ ग्रहण और अभिव्यक्ति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कौशल है। बच्चे एक-दूसरे की बातों को सुनते-सुनते ही बोलने का प्रयास करते हैं और इसी प्रक्रिया में धीरे-धीरे अपने विचारों और भावों (अपनी आवश्यकताओं को भी) व्यक्त करने लगते हैं। सुनने और बोलने की सामान्य परस्पर प्रक्रिया बातचीत कहलाती है। इसी के अन्य रूप चर्चा, परिचर्चा, भाषण, वाद-विवाद, संगोष्ठी आदि के रूप में देखने को मिलते हैं। ये सब बच्चों में सुनने-बोलने के कौशल विकास में सहायक होते हैं।

भाषा का सबसे महत्वपूर्ण कौशल सुनना है। अगर किसी भाषा को हम सीखना चाहते हैं तो उसे सुनने और बोलने का मौका मिलने पर हम आसानी से उस भाषा को सीख सकते हैं। इसके लिए बच्चे को कहानी सुनने और बालगीत सुनने और बोलने का मौका दिया जा सकता है। इससे बच्चे के मन में हिंदी भाषा का व्याकरण अपने आप बनता जाएगा।

किसी घटना का वर्णन, क्लास के दोस्तों के साथ बातचीत, कहानी कहना, नाटक आयोजित करना, बातचीत (संवाद), सवाल-जवाब सत्र, शब्दों का खेल, डिबेट प्रतिस्पर्धा, गीत व संगीत के कार्यक्रमों का आयोजन। खुद से सीखने की गतिविधि को बढ़ावा देने के लिए, बच्चों को उनकी रुचि की किताबें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित आदि करने में सुनने और बोलने के कौशल शामिल होते हैं। इसके अलावा भाषा शिक्षण में चित्रों वाली किताबों का उपयोग, ऐसे जो संवाद और बातचीत पर आधारित हों सुनने और बोलने के कौशल का विकास कर बच्चों की भाषा को समृद्ध करते हैं। अतः भाषा शिक्षण में सुनने और बोलने के कौशल से संबंधित ऐसी गतिविधियां बच्चों के भाषाई कौशल विकास के लिए बहुत उपयोगी साबित होती हैं।

प्रश्न (06) सुनने और बोलने को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन करें ।
उत्तर –

प्रत्येक व्यक्ति का श्रवण कौशल भिन्न -भिन्न होता है। निम्नलिखित कारकों से सुनने का कौशल प्रभावित होता है –

क. भाषिक ध्वनियों का ज्ञान ना होना सुनना की सुनने की क्रिया को प्रभावित करता है |

ख. शब्दावली पर अधिकार न होना सुनाए गए विषयों के समझने में बाधक होता है।

ग. क्रम को समझने की योग्यता ना होने से घटना, कहानी सुनने में विषय से संबंध बनाने और सुनकर समझने में सहायता नहीं मिलती है।

घ. स्मरण योग्यता न होने से क्रम को समझने में कठिनाई होती है।

ड़. उपयुक्त वातावरण सुनने की क्षमता को बढ़ाता है और अनुपयुक्त वातावरण बाधक बनता है।

च. अरुची और उदासीनता श्रवण में बाधा उत्पन्न करते हैं।

छ. अस्वस्थता के कारण सुनने के प्रति अनिच्छा, शिथिलता होती है।

ज. श्रोता एवं वक्ता के बीच तालमेल, विश्वास ना होने पर सुनने की क्रिया सार्थक नहीं होती है।

झ. श्रोता के अनुभव के दायरे में विषय को कहने / समझने की संभावना सुनने को सहज बनाती है।

ञ. वक्ता के मनोभावों, उद्देश्य, प्रयोजन, को समझ पाना ‘सुनने’ को समझने की शर्त है ।

ट. सुनने को संभव बनाने के लिए श्रोता को ‘परिचित’ विषय से ‘अपरिचित’ विषय की ओर जाना, समझाना श्रवण कौशल को प्रभावित करता है।

ठ. श्रोता के व्यक्तित्व में धैर्य, ग्रहणशीलता का गुण ना होना सुनने की क्रिया को प्रभावित करता है।

ड. श्रवण इंद्रियों में दोष सुनने की क्रिया में बाधक होता है

ढ. शिक्षक के अशुद्ध उच्चारण का शिक्षार्थी पर गलत प्रभाव पड़ता है। अतः उसका उच्चारण शुद्ध और मानक होना चाहिए ताकि शिक्षार्थी को प्रेरणा मिले।

बोलने के कौशल का विकास सुनने के द्वारा ही होता है। सुनने के कौशल में कमी या बाधा रह जाने पर बोलने के कौशल का विकास भी प्रभावित होता है। बोलने की क्षमता को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन निम्नलिखित हैं।

क. शुद्ध उच्चारण करने में सुनना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसके माध्यम से बच्चों में शुद्ध उच्चारण करने के कौशल का विकास होता है। सुनने के माध्यम से ही बच्चा बोलने में आने वाली उच्चारण संबंधी अशुद्धियों को दूर करने में सफल हो पाता है, जिसके परिणामस्वरूप उसके भाषा संबंधी कौशल में निखार आता है।

ख. मस्तिष्क की बनावट भी भाषा विकास को प्रभावित करते हैं। भाषा बोलने तथा समझने के लिए स्नायु तन्त्र, तथा वाक-यन्त्र की आवश्यकता होती है। बहुत हद तक इनकी बनावट तथा कार्य शैली तथा स्नायु नियन्त्रण भाषा को प्रभावित करते हैं।

ग. भाषा सम्बन्धी बोलने के कौशल विकास पर व्यक्ति जिस स्थान और परिस्थिति में रहता है, आचरण करता है, विचारों का आदान-प्रदान करता है उससे बोलने का विकास होता हैं। उदाहरण स्वरूप निम्न श्रेणी के परिवार व समाज के लोगों में भाषा का विकास कम होता है क्योंकि उन्हें दूसरों के सम्पर्क में आने का अवसर कम मिलता है, इसी प्रकार परिवार में कम व्यक्तियों के होने पर भी भाषा संकुचित हो जाती है।

घ. ऐसे बहुत से व्यवसाय हैं जिनमें भाषा का प्रयोग अत्यधिक होता है। उदाहरणस्वरूप अध्यापन, वकालत, व्यापार कुछ ऐसे व्यवसाय है जिनमें बोले बिना कोई कार्य नहीं चल सकता। अतएव वातावरण के अन्तर्गत इनको भी सम्मिलित किया गया है।

ड़. ध्वनि की मात्राओं के ज्ञान में कमी, सही उच्चारण बोध में अपूर्णता, दोषपूर्ण श्रवण शक्ति, अशुद्ध वर्तनी लिखकर याद रखना, ध्वनि के अनुसार उतार-चढ़ाव, सुर, बलाघात आदि का प्रयोग ना कर पाना, कुशल और दक्ष मार्गदर्शन में कमी, मौखिक (मुँह के अंगों) में दोष बोलने को प्रभावित करते हैं।

च. बालक द्वारा स्वयं यंत्रों पर नियंत्रण ना रख पाने के कारण भाषा दोष उत्पन्न होता है। जैसे ध्वनि परिवर्तन, अस्पष्ट उच्चारण, तुतलाना, हकलाना, तीव्रता स्पष्ट वाणी आदि ।

प्रश्न(07) प्राथमिक स्तर के बच्चों के सुनने और बोलने की क्षमताओं का विकास किस प्रकार करेंगे?
उत्तर –

प्राथमिक स्तर के बच्चों को सुनने और बोलने की क्षमताओं का विकास निम्नलिखित प्रकार से करेंगे

क. कक्षा में आज की बात, बातचीत, अपने बारे में बात करना, स्कूल अनुभवों पर बात करना ।

ख. आंखों देखी घटना या सुनी हुई घटनाओं के बारे में अभिव्यक्ति करना ।

ग. बालगीत, कविता सुनना-सुनाना –
कविता अपने आप को अभिव्यक्त करने तथा जीवन से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है। नियमित रूप से कविताएं और गीत सुनकर बच्चे भाषा की बुनियादी संरचनाएं ग्रहण कर लेते हैं। जैसे- कविता में आए नए शब्दों का अर्थ पकड़ लेते हैं, कविता के लय को बिना बिगाड़ के तुकबंदी भी कर लेते हैं। साथ ही कविता बच्चों को अपने अनुभवों से भी जोड़ती है। अगर एक ही कविता दो अलग-अलग बच्चों द्वारा पढ़ी जाएगी तो दोनों ही उस कविता को अपने-अपने अनुभवों से जोड़ते हुए समझेंगे।

घ. कहानी सुनना सुनाना – कहानियां सुनना-सुनाना प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों को भाषा सीखने में बहुत मदद करता है। कहानी सुनना बच्चों के लिए रुचिकर होने के साथ-साथ उनके सृजनात्मकता को भी बढ़ाने वाला होता है। कई बार बच्चे सुनी हुई कहानी में मनचाहा बदलाव करके अपने मित्रों को सुनाते हैं। इसके द्वारा बच्चे ना केवल शब्दों के अर्थ बल्कि विभिन्न घटनाओं को भी समझने लगते हैं और साथ ही यह बच्चों की कल्पनाशीलता को भी बढ़ाती है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कहानियां उनको भावी जीवन के लिए तैयार करने में भी मददगार होती है।

ड़. चित्र वर्णन – चित्र एक ऐसा माध्यम है जिससे हम प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के साथ बातचीत एवं चर्चा की बहुत सारी संभावनाएं खोज सकते हैं। छोटी कक्षाओं में बच्चों को चित्रों में बहुत ही रुचि होती है और उन्हें चित्र देखने और बनाने में मजा आता है। किसी किताब में चित्र सबसे पहले बच्चों का ध्यान आकर्षित करती है। उनके साथ चित्र पर सहज बातचीत करना आसान होता है। बच्चे चित्रों का बारीकी से अवलोकन भी करते और उस पर सारी बातचीत भी करते हैं। चित्रों से जुड़े प्रश्न बच्चों को चीजों को ढूंढने, उनके बारे में तर्क करने, कल्पना करने, भविष्यवाणी करने व चीजों और घटनाओं का अपने अनुभवों से संबंध बैठाने के लिए प्रेरित करते हैं |

च. रोलप्ले करवाना –
अभिनय को रोजमर्रा की कक्षा की गतिविधि में शामिल करने से बच्चों को आजादी और आनंद की अनुभूति होती है। इसके लिए प्राथमिक स्तर पर किसी ऐसी घटना, कहानी या कार्टून को लिया जा सकता है जो बच्चे अपने आसपास देखते हैं नाटक में बच्चों को स्वयं छोटे-छोटे समूह में नाटक के विषय चुनने, उसके संवाद लिखने एवं अभिनय करने से बच्चों में भाषाई क्षमता बढ़ेगी व उनका शब्द भंडार समृद्ध होगा ।

छ. दिए गए शब्दों से कहानी सुनाना

ज. सुने हुए विचारों को संक्षिप्त व विस्तारित कर पाना

झ. परिचित समसामयिक विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करना

ञ. बच्चों को कहानी, कविता, नाटक आदि रचने, उसे बढ़ाने तथा प्रस्तुत करने के अवसर देना, इत्यादि ।

प्रश्न (08) हिंदी भाषा सीखने के संकेतकों को सुनने, बोलने और पढ़ने के संदर्भ में स्पष्ट करें।
उत्तर –

संकेतक –
संकेतक का शाब्दिक अर्थ है – चिह्न, सूचक । अर्थात जो किसी विशेष कार्य अथवा बात की ओर इंगित करें उसे संकेतक कहते हैं। इस प्रकार सीखने के संकेतक से अभिप्राय ऐसे प्रतिमानों, सूचकों से है, जो सीखी गई बात अथवा कार्य की ओर इशारा करें। दूसरे शब्दों में सीखने के संकेतक शिक्षण-अधिगम (सीखने-सिखाने) प्रणाली एवं सीखने की प्रक्रिया में आई प्रगति के चिह्न रूप है

संकेतक एवं पाठ्यक्रम एक दूसरे से पूर्णतया संबद्ध है। वस्तुतः जैसे संकेतक होंगे वैसा ही पाठ्यक्रम निर्धारित होगा, जैसा पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को दिया जाएगा वैसा ही वह सीख पाएंगे। इसीलिए अभिष्ट संकेतों का निर्धारण अभिष्ट पाठ्यक्रम की अपेक्षा रखता है ।

सुनने और बोलने के कौशल में दक्षता से आमतौर पर यही माना जाता है कि बच्चे पढ़े और सुने को ज्यों का त्यों बोल दे। परंतु सुनने और बोलने में ‘समझ’ की प्रक्रिया को अनदेखा नहीं किया जा सकता। जैसे किसी बात पर प्रतिक्रिया ना करने वाले (ना सुनने वाले के अर्थ में) को हम यही कहते हैं कि अरे आप मेरी बात सुन नहीं रहे। स्पष्ट है कि यहां समझ के बिना सुनने का और बोलने का कोई मतलब नहीं। यह समझ ही है जो सुनने और बोलने को सार्थकता प्रदान करती है। यहां यह बात अवश्य है कि जैसे-जैसे बालक बड़ा होता जाता है उसके सुनने और बोलने के दौरान समझ शक्ति का विकास होता जाता है और वह सुनने अथवा किसी भी बात पर बोलने से पहले चिंतन करने लगता है। भाषा के संकेतको का निर्धारण इसी पक्ष को ध्यान में रखकर किया गया है।

प्राथमिक स्तर पर सुनने और बोलने के संदर्भ में भाषा सीखने के संकेतक

क. दूसरों के विचार को ध्यान से और धैर्य के साथ सुनकर अपनी सोच विकसित

ख. किस्से कहानियां सुनकर आनंद प्राप्त करना ।

ग. ऐतिहासिक घटनाएं सुनकर अपनी सांस्कृतिक धरोहर के बारे में जानना ।

घ. कविताएं सुनकर उनके अर्थ एवं भाव को समझना एवं आनंद की अनुभूति करना ।

ड़. नए शब्दों को सुनकर उनके अर्थ समझना ।

च. रोचक कहानी, कविता आदि सुनकर अपने अनुभव में वृद्धि करना।

छ. सुने गए भावों-विचारों पर चिंतन करना ।

ज. सहज रूप से अपनी बात कह पाना ।

झ. परिस्थिति एवं अवसर के अनुरूप अपनी बात कह पाना ।

ञ. सशक्त रूप से अपनी बात कहना ।

ट. बोलने के शिष्टाचार का पालन करना ।

ठ. गीत, कविता आदि को लय ताल के साथ गाना ।

ड. गति एवं हाव-भाव के अनुसार बोलना ।

ढ. प्रश्न बनाना व पूछना ।

ण. घर, परिवेश एवं विद्यालय की भाषा में तालमेल बिठाकर अपने अनुभव व्यक्त

त. सुनी हुई बात को अपने शब्दों में कहना ।

थ. पढ़ी गई सामग्री को अपने शब्दों में कहना ।

द. गीत, कविता, कहानी व अपने विचारों को अकेले तथा समूह में प्रस्तुत करना ।

ध. सुने हुए गीत, कविता, कहानी, वार्तालाप आदि में अपने अनुभवों को जोड़कर अपनी बात कहना |

न. अपने घर, परिवार, विद्यालय एवं परिवेश में होने वाली समूह चर्चा में भाग लेना और अपने विचार प्रस्तुत करना इत्यादि ।

‘पढ़ना’ कौशल में दक्षता का सीधा अर्थ है – दी गई लिखित सामग्री को पढ़ना और उसे पढ़कर समझना। पढ़ना यांत्रिक पाठन ना हो कर एक युक्ति परक एवं सुसंस्कृत क्रिया है । दी गई सामग्री का मूल भाव, लेखन शैली, हाव-भाव आदि सब का ध्यान पठन के समय रखना पड़ता है। पढ़ना पढ़कर समझने और उस पर प्रतिक्रिया करने की प्रक्रिया है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि पढ़ना बुनियादी तौर से अर्थवान गतिविधि है। हम ऐसा भी कह सकते हैं कि मुद्रित अथवा लिखित सामग्री से कुछ संदर्भ अनुमान के आधार पर अर्थ पकड़ने की कोशिश ‘पढ़ना’ है। जैसे-जैसे बालक शिक्षण अधिगम प्रक्रिया से गुजरता है वह पढ़ने की इस कला को अर्जित करते हुए प्रवीण होता जाता है।

प्राथमिक स्तर पर पढ़ने के संदर्भ में भाषा सीखने के संकेतक

क. अनुमान लगाकर पढ़ना एवं अर्थ खोजना।

ख. बच्चे द्वारा शब्दों और वाक्यों को वर्ण जोड़कर पढ़ने के बजाय इकाई के रूप में समझ कर पढ़ना ।

ग. अपने परिवेश में उपलब्ध सामग्री को अनुमान लगाकर समझते हुए पढ़ना जैसे दीवार, श्यामपट्ट, साइन बोर्ड आदि ।

घ. परिवेश में उपलब्ध संदर्भों, चित्रों का छपी हुई सामग्री को पढ़कर समझना ।

ड़. शब्दों में आपसी सहसंबंध स्थापित करते हुए प्रसंग के अनुसार पढ़ना ।

च, पढ़ने के प्रति रुचि होना। पढ़ते समय परिचित शब्दों का संदर्भ के आधार पर अनुमान लगाना ।

छ. साहित्य की विभिन्न विधाओं यथा कहानी, गीत, संवाद, निबंध आदि से परिचित होकर उन विधाओं की अन्य पुस्तकें पढ़ना ।

ज. पठन द्वारा आनंद प्राप्ति में समर्थ होना। दूसरों के विचारों को पढ़कर समझना ।

झ. पाठ में निहित मूल भाव, विचार या बिंदु को समझना ।

ञ. विषय सामग्री के माध्यम से नए शब्दों का अर्थ जानना। नए शब्दों के अर्थ शब्द कोष में ढूंढना ।

ट. विभिन्न विधाओं के माध्यम से बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक संदर्भ से जुड़ना ।

ठ. परिवेश में उपलब्ध पाठ्यसामग्री के प्रति अभिरुचि उत्पन्न करना ।

ड. पाठ्य सामग्री द्वारा प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूकता उत्पन्न होना ।

ढ. पाठ्य सामग्री, अखबार पत्र-पत्रिका आदि को पढ़कर समझना व उनपर प्रतिक्रिया व्यक्त करना ।

ब. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (जैसे टीवी, इंटरनेट, मोबाइल), परिवेश में उपलब्ध विज्ञापन आदि को पढ़कर समझ विकसित होना, इत्यादि ।

प्रश्न (09). पढ़ने का अर्थ स्पष्ट करें। शुरुआती पढ़ना क्या है? शुरुआती पढ़ने की चरणबद्ध प्रक्रिया की समझ विकसित करें।
उत्तर –

पढना लिखित / छपे चिह्नों को पढने और उनसे अर्थ गढ़ने की प्रक्रिया है । पठन प्रक्रिया के दौरान पाठक लिखित चिह्नों (अक्षरों, विरामचिह्नों, शब्दों के बीच में दिया गया स्थान, हाव-भाव) को देखकर शब्दों और वाक्यों के रूप में उनसे अर्थ ग्रहण करते हैं। पढ़ना एक विस्तृत प्रक्रिया है। इसके केवल अक्षरों व मात्राओं को पढ़ पाना ही नहीं बल्कि लिखी हुई पूरी सामग्री से अर्थ समझना भी शामिल है। पठन प्रक्रिया को तभी पूर्ण माना जाता है जब पाठक लिखित सामग्री का अर्थ समझ सके ।

पढ़ना एक समेकित प्रक्रिया है। इसमें अक्षरों की आकृतियां, उनसे जुड़ी ध्वनियाँ, वाक्य विन्यास, शब्दों और वाक्यों के अर्थ तथा अनुमान लगाने का कौशल शामिल है। पढ़ने का अर्थ है लिखित सामग्री से धारणाओं को गढ़ना, विचारों को आपस में जोड़ पाना और उन्हें अपनी स्मृति में रखना। अर्थात स्पष्ट है कि पढ़ना अनेक कुशलताओं का एक समूह है जो लिखी या छपी भाषिक सामग्री को अर्थ से जोड़ने में हमारी मदद करता है। पढ़ना कौशल की सभी परिभाषा में जिस बिंदु पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया है वह है – ‘अर्थ’ । अर्थात पढ़ने का लक्ष्य ही पढ़कर अर्थ समझने से है ।

शुरुआती पढ़ना –
शुरुआती पढ़ना, पढ़ना सीखने की शुरुआत है जो बच्चे स्मृति चिन्ह बना कर करते हैं। पढ़ना सीखने की शुरुआत सार्थक शब्दों और रुचिकर संदर्भों से होती है। उदाहरण के लिए यदि बच्चों को ‘घर’ का चित्र और चित्र के नीचे लिखा ‘घर’ शब्द दिखाते हैं तो बच्चा चित्र के बिना पर लिखा गया ‘घर’ शब्द पहचान जाता है। भले ही वह ‘घ’ व ‘र’ जैसे अक्षर नहीं पहचानता हो। एक बार जब बच्चे साथ में दिए गए चित्रों या शिक्षक के साथ बातचीत के सहारे कई शब्द पहचानने लगते हैं तब उन शब्दों में आए अक्षरों की ओर ध्यान दिलाया जाता है। मात्राओं को भी बच्चे स्वयं पहचानने लगते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि अक्सर पढ़ना सीखने की शुरुआत में अक्षर बच्चों के लिए सार्थक नहीं होते। हर अक्षर की आकृति और ध्वनि को बच्चे की स्मृति में बिठाने के लिए काफी समय और श्रम लगता है। वर्णमाला और बारह खड़ी को पूरा करते-करते महीनों बीत जाते हैं।

शुरुआती ‘पढ़ना’ की चरणबद्ध प्रक्रिया –

क. शुरुआती पढ़ना किताबों से करना कहीं अच्छा होता है। अक्षरों या रेखा चित्रों या तस्वीरों से सजाई गई कोई कहानी संग्रह, पढ़ना सीखने की शुरुआत में मददगार हो सकती है। जिसमें कविताएं, गीत, बच्चों के लिए खेल-गीतों का संग्रह हो ।

ख. चित्रों के द्वारा बातचीत के सहारे शब्दों को पहचानने और शब्दों में अक्षरों की ओर ध्यान दिलाना ।

ग. तरह-तरह के फ्लैश कार्ड, चार्ट रबर के अक्षरों जैसी प्रचलित सामग्री का उपयोग करना ।

घ. कहानी तथा कविताओं को बार-बार सुनाने से बच्चे पहले से सुनी कविता, कहानी अनुमान लगाते-लगाते पढ़ना सीख जाते हैं। वे जल्दी पढ़ भी लेते हैं। अक्षर, शब्द एवं वाक्य की पहचान भी सहज हो जाती है।

ड. अनुमान लगाते हुए पढ़ने से बच्चे लिपि पहचानने, वाक्यों में निहित अर्थ समझने एवं कहानी, कविता के प्रसंगों पर प्रतिक्रिया देने, कहानी को पढ़कर उसका सार प्रस्तुत करने की चरणबद्ध प्रक्रिया से बच्चे शुरुआत में पढ़ना सीखते हैं।

प्रश्न(10). पढ़ने की प्रक्रिया के विभिन्न सोपानों के तात्पर्य और महत्व का वर्णन करें।
उतर –

पढ़ना एक आरंभिक प्रक्रिया है जो बच्चों के पास उपलब्ध किताबों के माध्यम से संभव हो पाती है और उनकी पुस्तकों के कारण बच्चों की जिज्ञासा, लगाव, झुकाव, आकर्षण, आदि स्वतः पढ़ने को प्रेरित करने लगती है। विभिन्न प्रकार के रोचक और मनोरंजक चित्र बच्चों को पढ़ते समय उनकी किताबों से बांधे रखते हैं। प्रयोग द्वारा यह प्रमाणित किया जा चुका है कि बच्चों से चित्रों के विषय में वार्तालाप करके हम उनके पढ़ने-लिखने का विकास कर सकते हैं। पढ़ने की प्रक्रिया से आशय उन गतिविधियों से है जिनके माध्यम से छात्र पढ़ने के संबंधित क्रिया को पूर्ण करता है। पढ़ने संबंधी सपनों का क्रमबद्ध एवं आवश्यक रूप से अनुकरण करने से पठन का कार्य उचित रूप से संपन्न होता है। इसलिए पठन की क्रिया को संपन्न करने के पूर्व पठन के सोपानों का ज्ञान छात्र एवं शिक्षक दोनों को अनिवार्य रूप से होना चाहिए। पढ़ने की प्रक्रिया के निम्नलिखित सोपान है

क. किताबें उलटना-पलटना
बच्चों द्वारा किताबों का उलटना-पलटना पढ़ने की प्रक्रिया का प्रथम सोपान है। यह बच्चों में किताबों के प्रति जिज्ञासा एवं पढ़ने की इच्छा को प्रदर्शित करता है। जब कोई बच्चा ऐसा कर रहा होता है तो पूछे जाने पर उसका जवाब यही होता है कि वह किताब पढ़ रहा है। साथ ही वह इसके संबंध में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर भी दे पाता है। बच्चों की पहुंच में ढेर सारी ऐसी रंग-बिरंगी किताबों का होना उनमें किताबों से लगाव उत्पन्न करेगा। किताबों से लगाव होना पढ़ने की नींव है।

ख. चित्र पठन –
बच्चे चित्रों को ध्यान से देखते हैं और चित्र के बारे में मन में उठने वाले अपने सवालों क्या, कौन, कहां आदि का जवाब अपने पूर्व ज्ञान के आधार पर ढूंढने में लग जाते हैं। बच्चे के साथ बच्चों का यह कार्यकलाप चित्र पठन कहा जाता है। बच्चों से चित्र पठन करवाते हुए उनसे दिए गए चित्र के संबंध में बातचीत करके उनके सुनने, बोलने और लिखने के कौशलों का विकास किया जा सकता है ।

ग. अनुमान लगाते हुए पढ़ना –
हमने प्रायः देखा है कि बच्चे कविता पठन के समय कविता की पंक्तियों पर उंगलियां फेरते हैं। ऐसा बच्चे द्वारा अनुमान लगाकर पढ़ने की प्रक्रिया के द्वारा संभव होता है। इस प्रक्रिया में शब्दों के उच्चारण, पंक्तियों पर अंगुलियों की स्थितियों में वास्तविक सामंजस्य का कभी-कभी अभाव होता है। परंतु अनुमान लगाकर पढ़ना, पढ़ने के कौशल की कुंजी है। एक दक्ष पाठक एक शब्द के सारे अक्षरों या एक वाक्य के सारे शब्दों को नहीं देखता है, बल्कि पढ़ते समय उसकी आंखें मुद्रित सामग्री के एक छोटे अंश पर ही गौर करती हैं। शेष भाग वह अनुमान के आधार पर ग्रहण कर लेता है। अनुमान का आधार होता है अक्षर की आकृतियां, शब्द एवं उनके अर्थ व संयोजन और पाठक का पूर्व ज्ञान ।

घ. लिपि पहचानना –
पढ़ने की प्रक्रिया के इस सोपान में लिपियों को पहचानना, उससे जुड़ी ध्वनियों के उच्चारण एवं उसके मानसिक बिंब की रचना करना सम्मिलित हैं। शब्द के रूप, ध्वनि एवं अर्थ तीनों मिलकर हमारे मस्तिष्क में शब्द का एक चित्र या बिंब का निर्माण करते हैं। मस्तिष्क में शब्द से संबंधित चित्र या बिंब का निर्माण होना हमारे पूर्व अनुभव पर निर्भर करता है। जैसे-जैसे कलम अर्थात कलम पढ़ते समय हमारे मस्तिष्क में कलम का ही चित्र उभर कर आता है ना कि किसी अन्य वस्तु का । मस्तिष्क में शब्दों के चित्रों के निर्माण में दक्षता प्राप्त कर लेने के बाद पाठक शब्दों को अक्षरों में तोड़ कर उन लिपि चिह्नों की भी पहचान सुगमतापूर्वक कर सकता है।

ड़. अर्थ समझना –
अर्थ की समझ के बिना पठन ‘वाचन’ की श्रेणी में आता है। अतः अर्थ समझना पठन की प्रथम और अनिवार्य शर्त है । पठन सामग्री के साथ संवाद कर के अनुभवों विचारों और सैद्धांतिक संरचना के रूप में अर्थपूर्ण समझ प्रदान करना ही पढ़ना है। अर्थ ग्रहण की दक्षता पाठक के पूर्व अनुभव पर निर्भर करती है। साथ ही यह पाठक से चिंतन-मनन की भी अपेक्षा रखती है। पठन के क्रम में अर्थ ग्रहण के साथ-साथ व्याख्या एवं विश्लेषण भी चलती रहती है ताकि पाठक वहीं पहुंचे जहां लेखक उसे ले जाना चाहता है।

च. प्रतिक्रिया देना –

मानव एक चिंतनशील प्राणी है। स्वाभाविक है कि पढ़ने की सामग्री के अर्थ ग्रहण के उपरांत वह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करे। एक अच्छा पाठक पढ़ने के साथ-साथ विभिन्न दृष्टिकोण से पठित सामग्री का मूल्यांकन करते हुए उसके प्रति अपना विचार प्रकट करता जाता है। साथ ही साथ उसके मन में कुछ भावनाएं भी उत्पन्न होती है जिससे वह अपने हाव-भाव से प्रदर्शित करता है। किसी साहित्य को पढ़कर उसके रस का अनुभव एक अच्छा पाठक ही कर सकता है और उसके उपरांत वह प्रतिक्रिया भी अवश्य देगा । प्रतिक्रिया से पता चलता है कि पाठक द्वारा किस स्तर तक अर्थ ग्रहण किया गया है। पढ़ने के बाद बच्चों को किसी कहानी को संक्षेप पर सुनाने या कहानी की घटनाओं के बारे में प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए प्रेरित करने पर उनमें अर्थ ग्रहण एवं चिंतन-मनन द्वारा प्रतिक्रिया व्यक्त करने की क्षमता विकसित होती है।

छ. पढ़कर सार प्रस्तुत करना –
जब किसी मुद्रित सामग्री के पठन के फलस्वरुप उसमें निहित जिस भाव आदर्श अथवा मूल्य से हम सहमत हो उसे आत्मसात कर लें, पठन का उद्देश्य तभी पूरा माना जाता है। एक पाठक की किसी मुद्रित सामग्री को पढ़कर उसकी विषय वस्तु को लेखक की भावना के अनुरूप ग्रहण कर लेता है एवं उसकी अभिव्यक्ति संक्षिप्त रूप से कर सकने में समर्थ होता है तो पठन को सफल समझा जाता है। बच्चों को पढ़ी गई कविता एवं कहानियों को संक्षिप्त रूप में अपनी भाषा में अभिव्यक्त करने के लिए प्रेरित करने से बच्चों के गहन पठन की क्षमता का विकास होता है।

प्रश्न(11) पढ़ने का अर्थ स्पष्ट करें। शुरुआती पढ़ना क्या है? शुरुआती पढ़ने की चरणबद्ध प्रक्रिया की समझ विकसित करें।
उत्तर –

पढना लिखित / छपे चिह्नों को पढने और उनसे अर्थ गढ़ने की प्रक्रिया है । पठन प्रक्रिया के दौरान पाठक लिखित चिह्नों (अक्षरों, विरामचिह्नों, शब्दों के बीच में दिया गया स्थान, हाव-भाव) को देखकर शब्दों और वाक्यों के रूप में उनसे अर्थ ग्रहण करते हैं। पढ़ना एक विस्तृत प्रक्रिया है। इसके केवल अक्षरों व मात्राओं को पढ़ पाना ही नहीं बल्कि लिखी हुई पूरी सामग्री से अर्थ समझना भी शामिल है। पठन प्रक्रिया को तभी पूर्ण माना जाता है जब पाठक लिखित सामग्री का अर्थ समझ सके ।

पढ़ना एक समेकित प्रक्रिया है। इसमें अक्षरों की आकृतियां, उनसे जुड़ी ध्वनियाँ, वाक्य विन्यास, शब्दों और वाक्यों के अर्थ तथा अनुमान लगाने का कौशल शामिल है। पढ़ने का अर्थ है लिखित सामग्री से धारणाओं को गढ़ना, विचारों को आपस में जोड़ पाना और उन्हें अपनी स्मृति में रखना। अर्थात स्पष्ट है कि पढ़ना अनेक कुशलताओं का एक समूह है जो लिखी या छपी भाषिक सामग्री को अर्थ से जोड़ने में हमारी मदद करता है। पढ़ना कौशल की सभी परिभाषा में जिस बिंदु पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया है वह है – ‘अर्थ’ । अर्थात पढ़ने का लक्ष्य ही पढ़कर अर्थ समझने से है ।

शुरुआती पढ़ना –
शुरुआती पढ़ना, पढ़ना सीखने की शुरुआत है जो बच्चे स्मृति चिन्ह बना कर करते हैं। पढ़ना सीखने की शुरुआत सार्थक शब्दों और रुचिकर संदर्भों से होती है। उदाहरण के लिए यदि बच्चों को ‘घर’ का चित्र और चित्र के नीचे लिखा ‘घर’ शब्द दिखाते हैं तो बच्चा चित्र के बिना पर लिखा गया ‘घर’ शब्द पहचान जाता है। भले ही वह ‘घ’ व ‘र’ जैसे अक्षर नहीं पहचानता हो। एक बार जब बच्चे साथ में दिए गए चित्रों या शिक्षक के साथ बातचीत के सहारे कई शब्द पहचानने लगते हैं तब उन शब्दों में आए अक्षरों की ओर ध्यान दिलाया जाता है। मात्राओं को भी बच्चे स्वयं पहचानने लगते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि अक्सर पढ़ना सीखने की शुरुआत में अक्षर बच्चों के लिए सार्थक नहीं होते। हर अक्षर की आकृति और ध्वनि को बच्चे की स्मृति में बिठाने के लिए काफी समय और श्रम लगता है। वर्णमाला और बारह खड़ी को पूरा करते-करते महीनों बीत जाते हैं।

शुरुआती ‘पढ़ना’ की चरणबद्ध प्रक्रिया –

क. शुरुआती पढ़ना किताबों से करना कहीं अच्छा होता है। अक्षरों या रेखा चित्रों या तस्वीरों से सजाई गई कोई कहानी संग्रह, पढ़ना सीखने की शुरुआत में मददगार हो सकती है। जिसमें कविताएं, गीत, बच्चों के लिए खेल-गीतों का संग्रह हो ।

ख. चित्रों के द्वारा बातचीत के सहारे शब्दों को पहचानने और शब्दों में अक्षरों की ओर ध्यान दिलाना ।

ग. तरह-तरह के फ्लैश कार्ड, चार्ट रबर के अक्षरों जैसी प्रचलित सामग्री का उपयोग करना ।

घ. कहानी तथा कविताओं को बार-बार सुनाने से बच्चे पहले से सुनी कविता, कहानी अनुमान लगाते-लगाते पढ़ना सीख जाते हैं। वे जल्दी पढ़ भी लेते हैं। अक्षर, शब्द एवं वाक्य की पहचान भी सहज हो जाती है।

ड. अनुमान लगाते हुए पढ़ने से बच्चे लिपि पहचानने, वाक्यों में निहित अर्थ समझने एवं कहानी, कविता के प्रसंगों पर प्रतिक्रिया देने, कहानी को पढ़कर उसका सार प्रस्तुत करने की चरणबद्ध प्रक्रिया से बच्चे शुरुआत में पढ़ना सीखते हैं।

 

 

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